नवादा : जिले की मेसकौर प्रखंड क्षेत्र में भीषण गर्मी और बारिश की कमी ने गंभीर जल संकट पैदा कर दिया है। कभी तीन प्रमुख नदियों से समृद्ध माने जाने वाले इस इलाके में अब हालात ऐसे हैं कि जीवनदायिनी तिलैया और ढाढर सहित सभी छोटी-बड़ी बरसाती नदियां समय से पहले पूरी तरह सूख चुकी हैं। नदी के स्थान पर अब केवल सूखी रेत, धूल और दरारों वाली जमीन दिखाई दे रही है। स्थानीय लोगों के अनुसार स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही है और इसका सीधा असर खेती, पशुपालन और भू-जल स्तर पर पड़ रहा है।
सिंचाई सबमर्सिबल पर निर्भर, खेती पर संकट
किसानों का कहना है कि पहले जून-जुलाई में अच्छी बारिश के बाद नदियां भर जाती थीं और खरीफ फसलों की सिंचाई आसान हो जाती थी। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से बारिश का चक्र बदल गया है। अब सिंचाई पूरी तरह सबमर्सिबल मोटर और बिजली पर निर्भर हो गई है। क्षेत्र का औसत भू-जल स्तर भी लगातार नीचे जा रहा है और अब यह 46 फीट से भी अधिक गहराई तक पहुंच चुका है।
गाद और अतिक्रमण से बिगड़ी स्थिति
किसानों के अनुसार नदियों की सतह पर जमी गाद और अतिक्रमण के कारण जल प्रवाह बाधित हो गया है। बारिश होने पर भी पानी रुक नहीं पाता और तेजी से बह जाता है, जिससे नदी में ठहराव नहीं हो पाता। नतीजतन दिसंबर-जनवरी तक ही नदियां पूरी तरह सूख जा रही हैं।
पशुपालन और ग्रामीण जीवन प्रभावित
नदी किनारे बसे गांवों में पशुओं के लिए पानी का गंभीर संकट उत्पन्न हो गया है। पहले सूखी नदी में बने गड्ढों से भी पानी मिल जाता था, जिससे मवेशियों की प्यास बुझाई जाती थी और घरेलू उपयोग होता था। लेकिन अब हालात ऐसे हैं कि ऐसे स्रोत भी पूरी तरह खत्म हो चुके हैं।
लोगों की जुबानी
लखौरा गांव सहित आसपास के ग्रामीणों ने बताया कि पहले आठ महीने तक नदियों में पानी रहता था, लेकिन अब यह अवधि घटकर मुश्किल से चार महीने रह गई है। कई जगह तो नदी में कुंड खोदने पर भी पानी नहीं निकल रहा है।
झारखंड से जुड़ा जल स्रोत, लेकिन जंगलों पर संकट
विशेषज्ञों के अनुसार मेसकौर क्षेत्र की नदियां वर्षा आधारित हैं और इनका जल स्रोत झारखंड के कोडरमा के जंगलों से जुड़ा है। वनों की कटाई और पर्यावरणीय असंतुलन के कारण वर्षा चक्र प्रभावित हुआ है, जिसका सीधा असर इन नदियों पर पड़ रहा है।
भईया जी की रिपोर्ट