नवादा : पत्रकारिता का मूल स्वभाव हमेशा से जिम्मेदारी, संयम और सामाजिक मर्यादा से जुड़ा रहा है। सच कहना उसका धर्म है, लेकिन सच कहने का तरीका भी उतना ही महत्वपूर्ण माना गया है। बचपन में मां अक्सर समझाती थी-“बेटा, हर काम करना, लेकिन ऐसा काम कभी मत करना जिससे लोग तुम्हें गाली दें।” उस समय यह सीख उतनी गहरी नहीं लगती थी। बचपन की शरारतों में कई बार गांव के बड़े-बुजुर्ग डांट देते थे, कभी कान उमेठ देते थे और कभी पिताजी की पिटाई-कुटाई भी झेलनी पड़ती थी। उस डांट या पिटाई में अपनापन और सुधार की भावना होती थी, लेकिन जब किसी से गाली सुननी पड़ती थी तो उसमें अपमान और दुश्मनी का भाव महसूस होता था। धीरे-धीरे समझ में आने लगा कि मां की नसीहत दरअसल सम्मानजनक जीवन जीने का सरल सूत्र थी।
बड़ा होने पर यह सीख और स्पष्ट होती चली गई। पत्रकारिता के दौरान संपादकों ने भी लगभग इसी बात को दूसरे ढंग से समझाया। उन्होंने बताया कि कड़वे सच को भी सलीके और संयम के साथ कहा जा सकता है। बात पूरी स्पष्ट हो और सामने वाले की गरिमा भी बनी रहे-यही पत्रकारिता की असली कसौटी है। स्कूल के दिनों में संस्कृत के एक श्लोक को भी कई बार याद कराया गया था-“सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात्, न ब्रूयात् सत्यम् अप्रियम्।” यानी सत्य बोलो, प्रिय बोलो, लेकिन ऐसा सत्य मत बोलो जो अनावश्यक रूप से अप्रिय हो। साथ ही प्रिय बोलो, पर असत्य नहीं। यही संतुलन भारतीय जीवन-दर्शन और सनातन नैतिकता की बुनियाद माना गया है।
पत्रकारिता की आत्मा में भी ऐसा ही सत्य रचा-बसा है। करीब चार दशक से मीडिया में काम करते हुए कई अनुभव हुए हैं। कई बड़ी खबरें ब्रेक कीं। ऐसी खबरें भी सामने आईं जिसने प्रशासन के गलियारों में हलचल मचा दी। घर में रहते हुए एक बार ऐसी खबर सामने आई थी जिसके असर से कई थानेदारों की कुर्सी चली गई। उस समय थानेदारों ने गुस्से में गाली भी दी और धमकी भी। लेकिन उस गाली से व्यक्तिगत पीड़ा नहीं हुई, क्योंकि खबर पूरी तरह सच पर आधारित थी। सच कभी-कभी असुविधाजनक होता है और उसे मीठे शब्दों में हमेशा नहीं कहा जा सकता। पत्रकारिता में यह अपवाद हो सकता है, लेकिन सामान्य तौर पर कोशिश यही रही कि आलोचना हो, सवाल उठें, मगर भाषा मर्यादित रहे।
इधर कुछ वर्षों में मीडिया के एक हिस्से में अजीब प्रवृत्ति आ गई है। खबरों की जगह गॉसिप और सनसनी को प्राथमिकता मिलने लगी है। कुछ तथाकथित धुरंधर और स्वयंभू पत्रकार ऐसी-ऐसी बातें “खबर” के नाम पर परोस रहे हैं जिनका तथ्य से कोई गंभीर रिश्ता नहीं होता। उनका उद्देश्य सूचना देना कम और उत्तेजना पैदा करना ज्यादा होता है। स्वाभाविक है कि ऐसी सामग्री पर लोगों की तीखी प्रतिक्रियाएं आती हैं। कमेंट बॉक्स गालियों से भर जाते हैं। सामान्य दृष्टि से देखें तो यह किसी भी पत्रकार के लिए शर्म की बात होनी चाहिए, लेकिन हैरानी की बात यह है कि इन लोगों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।
दरअसल इसके पीछे एक नया आर्थिक गणित काम कर रहा है। डिजिटल प्लेटफॉर्म की दुनिया में जितनी ज्यादा प्रतिक्रिया, उतनी ज्यादा पहुंच। जितनी ज्यादा बहस और विवाद, उतने ज्यादा व्यू और फॉलोवर। और जितने ज्यादा व्यू, उतनी ही अधिक कमाई। इसलिए कुछ लोगों ने यह रास्ता चुन लिया है कि विवाद पैदा करो, लोगों को भड़काओ और फिर उनकी गालियों को भी अपने लिए “ट्रैफिक” में बदल दो। नतीजा है कि गालियों की संख्या बढ़ती जाती है और उसी अनुपात में उनके व्यू और कमाई भी। ऐसे में गाली उनके लिए अपमान नहीं, बल्कि कमाई का साधन बन जाती है।
स्थिति यहां तक पहुंच गई है कि कुछ यूट्यूबर और डिजिटल कंटेंट निर्माता अब लोगों की गालियों को लगभग आशीर्वाद की तरह लेने लगे हैं। उन्हें इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि लोग उन्हें किस भाषा में कोस रहे हैं। उनके लिए महत्वपूर्ण सिर्फ यह है कि लोग प्रतिक्रिया दे रहे हैं, समय खर्च कर रहे हैं और उनके वीडियो या पोस्ट को वायरल कर रहे हैं। जाहिर है गाली, गुस्सा और नाराजगी भी उनके बैंक खाते को समृद्ध करने का जरिया बन गया है।
यहीं से पत्रकारिता की मूल आत्मा पर सवाल खड़े होने लगते हैं। पत्रकारिता कभी समाज को दिशा देने का माध्यम मानी जाती थी। उसका उद्देश्य जनमत को जागरूक करना और सत्ता से सवाल पूछना था, लेकिन अगर गालियां ही कमाई का जरिया बन जाएं और विवाद ही सफलता का पैमाना बन जाए तो यह प्रवृत्ति पत्रकारिता के नैतिक आधार को कमजोर करती है। सच कहने का साहस जरूरी है, लेकिन सच को सनसनी में बदल देना और जानबूझकर अपमान कमाने की होड़ लगाना उस पत्रकारिता से बिल्कुल अलग है, जो समाज में सम्मान और विश्वास पर टिकी रही है।
भईया जी की रिपोर्ट