नवादा : नगर के अंसार नगर में रमज़ान की शाम का अपना ही रंग होता है। अज़ान होते ही हर घर में इफ्तार की रौनक, खजूर, फल, पकौड़ी… और रोज़ा खुलते ही सबका पहला जुमला — “भाई पानी दो!”
लेकिन असली कहानी तो इफ्तार के बाद शुरू होती है…
इफ्तार के तत्काल बाद हर कोई टहलने के बहाने अपने दोस्तों से कहता है:-
“भाई, आज हलीम खाया जाए?”
पहले तो लोग कहते हैं “अरे रोज़ा तो अभी खुला है, पेट भरा है।”
दूसरा कहता है “भरा है तो क्या हुआ… हलीम के लिए दिल खाली होना चाहिए!”
बस फिर क्या , दोस्तों के साथ पहुँच जाते हैं अंसार नगर की उस मशहूर दुकान पर जहाँ रमज़ान में हलीम की खुशबू आधे मोहल्ले को खींच लाती है।
वहां लाइन इतनी लंबी कि जैसे सबको आज ही हलीम खाने की कसम खा रखी हो। दोस्त बोलता है,
“भाई जल्दी करो, वरना हलीम खत्म हो जाएगा।”
दूसरा कहता है “इतना बड़ा देग है, कैसे खत्म होगा?”
तभी पीछे लाइन में खड़े एक अंकल बोले,
“बेटा, रमज़ान में हलीम का भरोसा नहीं… पल में देग खाली!”
आख़िरकार हलीम मिलता है। ऊपर से नींबू, अदरक, हरी धनिया… और पहली ही चम्मच मुँह में जाते ही दोस्त बोलता है,
“भाई, रोज़ा रखने का असली मकसद यही है!”
दूसरा कहता है
“अगर रोज़ा सिर्फ हलीम के लिए रख रहे हो, तो अल्लाह से माफी मांग लो!”
दोनों हँसते हुए हलीम खाते रहते… और वापस आते वक्त दोस्त बोला,
“कल फिर चलते हैं।”
दूसरा कहता है
“भाई, रोज़ा इबादत के लिए होता है… लेकिन हलीम के लिए थोड़ा एक्स्ट्रा भी रख लेते हैं!”
नतीजा
नवादा के अंसार नगर में रमज़ान की रात, दोस्त और गरमा-गरम हलीम ये कॉम्बिनेशन हो जाए तो समझिए इफ्तार के बाद की असली खुशी मिल गई!