गोपालगंज/सासाराम। गोपाल नारायण सिंह विश्वविद्यालय के अंतर्गत संचालित नारायण कृषि विज्ञान संस्थान के मत्स्य विभाग की सहायक प्राचार्य श्रीमती रंजू कुमारी ने कहा कि भारत में मत्स्य पालन ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाने का एक प्रभावी माध्यम बन चुका है। विशेषकर कार्प प्रजाति की मछलियाँ—रोहू, कतला और मृगल—तेज़ वृद्धि, अधिक बाजार मांग और उच्च पोषण मूल्य के कारण किसानों की पहली पसंद हैं। उन्होंने बताया कि कार्प मछली पालन की सफलता काफी हद तक तालाब के वैज्ञानिक एवं उचित प्रबंधन पर निर्भर करती है।
उन्होंने बताया कि कार्प मछली पालन के लिए ऐसे तालाब का चयन किया जाना चाहिए जहाँ वर्ष भर पानी उपलब्ध रहे। तालाब की गहराई न तो बहुत कम हो और न ही बहुत अधिक, लगभग 5 से 8 फीट गहराई सबसे उपयुक्त मानी जाती है। तालाब की मेढ़ मजबूत होनी चाहिए ताकि पानी का रिसाव न हो।
मछली बीज डालने से पहले तालाब की समुचित सफाई, मेढ़ की मरम्मत तथा अवांछित जलीय पौधों और परभक्षी मछलियों का नाश आवश्यक है। तालाब के पानी की अम्लीयता और क्षारीयता को संतुलित रखने के लिए चूने का प्रयोग अत्यंत महत्वपूर्ण है। सामान्यतः प्रति एकड़ 80 से 120 किलोग्राम चूना उपयोग करने की सलाह दी जाती है। इसके बाद गोबर खाद या अन्य जैविक खाद डालकर तालाब में प्राकृतिक भोजन (प्लवक) की वृद्धि की जाती है, जो मछलियों के लिए उत्तम आहार का कार्य करता है।
श्रीमती रंजू कुमारी ने बताया कि हमेशा स्वस्थ, रोग-मुक्त और समान आकार के मछली बीज का ही उपयोग करना चाहिए। सामान्य रूप से कतला : रोहू : मृगल का अनुपात 30 : 40 : 30 लाभदायक माना जाता है। मछलियों की तेज़ और स्वस्थ वृद्धि के लिए संतुलित आहार आवश्यक है। इसके लिए चावल की भूसी और सरसों की खली को 1:1 के अनुपात में मिलाकर नियमित रूप से खिलाना चाहिए। आहार की मात्रा मछलियों के कुल भार का 3 से 5 प्रतिशत होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि तालाब के पानी में घुलित ऑक्सीजन, पारदर्शिता तथा अम्लीयता-क्षारीयता की नियमित निगरानी आवश्यक है। यदि मछलियाँ पानी की सतह पर आकर सांस लेने लगें तो यह ऑक्सीजन की कमी का संकेत है। ऐसी स्थिति में तुरंत ताज़ा पानी डालना या पानी बदलना चाहिए। मछलियों में किसी भी प्रकार के रोग के लक्षण दिखाई देने पर तुरंत मत्स्य विशेषज्ञ से परामर्श लेना चाहिए।
उन्होंने बताया कि समय-समय पर पानी बदलना, रोगों की समय पर पहचान और उचित उपचार मछली उत्पादन बढ़ाने में सहायक होता है। यदि तालाब का वैज्ञानिक ढंग से प्रबंधन किया जाए तो कार्प मछली पालन कम लागत में अधिक लाभ देने वाला व्यवसाय सिद्ध हो सकता है। सही तालाब प्रबंधन से न केवल मछली उत्पादन बढ़ता है, बल्कि किसानों की आय में भी उल्लेखनीय वृद्धि होती है। उन्होंने किसान भाइयों से अपील की कि यदि वे तालाब की सही तैयारी, उत्तम बीज, संतुलित आहार और स्वच्छ पानी पर ध्यान दें, तो कार्प मछली पालन खेती के साथ-साथ आय बढ़ाने का एक भरोसेमंद साधन बन सकता है।