-सुप्रसिद्ध क़व्वाल स्व. इम्तियाज़ भारती की मौत से शोक
नवादा : मगध की सरज़मीं ने एक और अज़ीम फ़नकार को खो दिया। इम्तियाज़ भारती साहब के जाने से क़व्वाली की दुनिया का एक मज़बूत स्तम्भ ढह गया है। वे सिर्फ़ एक गायक नहीं ,बल्कि सूफ़ी तहज़ीब की वह रौशन शमा थे,जिनकी लौ से मोहब्बत,भाईचारा और इंसानियत रोशन होती रही। उन्हें सुनने के लिए जहाँ-जहाँ महफ़िल सजी,वहाँ-वहाँ दिलों का हुजूम उमड़ पड़ा।
‘चलो अजमेर चलें’ और ‘ख़्वाजा मोइनुद्दीन दुलारे’ जैसी अमर क़व्वालियों के ज़रिये उन्होंने सूफ़ी परम्परा को जन-जन तक पहुँचाया। यह महज़ इत्तेफ़ाक़ नहीं,बल्कि एक आशिक के इश्क का कमाल है कि ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के 813वें उर्स मुबारक के दिन,85 वर्ष की उम्र में,यह सूफ़ी-ए-इश्क़ अपने मालिक-ए-हक़ीक़ी से जा मिला। ख्वाजा साहब का विसाल 6 रज्जब 633 हिजरी को हुआ था और उनका यह दीवाना भी उसी 6 रज्जब को रुख़्सत हो गया। आज जब दुनिया नफ़रत, हिंसा और भेदभाव से कराह रही है, तब ख्वाजा साहब के वे पैग़ाम और भी ज़्यादा मौज़ूँ लगते हैं— “मोहब्बत सबसे बड़ी ताक़त है, किसी का दिल दुखाना काबा गिराने से बड़ा गुनाह है और जो इंसानों से मोहब्बत नहीं करता, वह ख़ुदा से भी मोहब्बत नहीं कर सकता।”
इन उपदेशों को इम्तियाज़ भारती ने अपनी क़व्वाली के ज़रिये ज़बान दी। उनकी आवाज़ सिर्फ़ सुरों का संगम नहीं , बल्कि वह एक दावत थी—इंसान से इंसान को जोड़ने की। सद्भाव, प्रेम और देश की एकता अखंडता के लिए वे आजीवन समर्पित रहे।विडंबना देखिए कि आज उनके बेटे उमर की शादी की तारीख़ थी—पटना बारात जाने की तैयारियाँ थीं, मगर ज़िन्दगी ने वफ़ा न की। खुशी की उस घड़ी को क़ुदरत ने ग़म की चादर ओढ़ा दी।
अपने फ़न के इस जादूगर का रिश्ता सूफ़ी सिलसिलों से गहराई से जुड़ा था। वे अमझर शरीफ़ की ख़ानक़ाह में हज़रत शाह जलालुद्दीन अब्दु रज़्ज़ाक़ क़ादरी साहब के मुरीद थे। पीर की दुआओं ने उन्हें शोहरत की बुलंदियाँ बख़्शीं। उनके ख़ानदान के कई लोग गया की मशहूर ख़ानक़ाह मुनअमिया से भी जुड़े रहे। इसी सूफ़ी परम्परा ने उन्हें पारम्परिक गरिमा, शालीनता और पुरानी तहज़ीब का सच्चा वाहक बनाया।
उनकी गायकी में शास्त्रीय सुरों की पुख़्ता समझ, साफ़ उच्चारण और भावपूर्ण अदायगी थी। उर्स समारोह हों, दरगाहों की महफ़िलें हों या सांस्कृतिक मंच—हर जगह उनकी क़व्वाली ने श्रोताओं से सीधा आत्मिक संवाद किया। ईश्वरीय प्रेम, सूफ़ी दर्शन और रूहानियत उनकी हर पेशकश की आत्मा रही। इसी लिए उनकी आवाज़ आज भी जीवित है और सदियों तक याद रखी जाएगी।1990 के दशक में, जब देश में नफ़रत का ज़हर फैल रहा था, उनकी यह क़व्वाली ज़मीर की आवाज़ बन गई—
“जिस सिम्त नज़र उठती है शोला है, धुआँ है,
मैं ढूंढ रहा हूँ कि मेरा मुल्क कहाँ है । ।”
-कोई कह रहा है कि मस्जिद ढहा दो,
कोई कह रहा है कि मंदिर गिरा दो।
अब दुश्मनी को दिलों से मिटा दो,
कि इस दुश्मनी में वतन जल रहा है।
जनसुराज के प्रवक्ता सैय्यद मसीहउद्दीन कहते हैं
मेरे लिए इम्तियाज़ भारती सिर्फ़ एक महान फ़नकार नहीं,बल्कि बचपन की यादों का हिस्सा हैं। अपने शुरुआती दौर में वे ज़िले के छोटे शेख़पुरा में हर साल लगने वाले चिराग़ाँ-मेला (उर्स मुबारक) में क़व्वाली के लिए आते थे। मैं उन्हें बचपन से सुनता रहा।
1990 के दशक में,जब वे शोहरत की बुलंदियों पर थे,पटना में पूर्व मंत्री स्व. शकील अहमद ख़ान साहब के आवास पर उनसे अक्सर मुलाक़ात होती रहीं—रिश्ते आत्मीय रहे। आज सद्भाव और रूह को सुकून देने वाली क़व्वाली परम्परा का यह शहंशाह गया जी की पावन धरती,कर्बला कब्रिस्तान में आख़िरी नींद सो गया मगर मगध के इस सपूत ने क़व्वाली के मशाल को जिस ऊँचाई पर रौशन किया,उसकी रौशनी से इंसानियत हमेशा आलोकित होती रहेगी।
भईया जी की रिपोर्ट