रायल कॉलेज आफ सर्जन्स आफ लंदन के हंटेरियन लेक्चरर नियुक्त होने वाले पहले भारतीय डॉ. बी.मुखोपाध्याय ने अपनी विलक्षण प्रतिभा और अतुलनीय योग्यता से पटना मेडिकल कॉलेज की ख्याति सात समुदर पार तक पहुंचायी थी। मेडिकल शिक्षा व शोध के साथ ही सेवा के क्षेत्र में उनका कार्य एक मानक है। डॉ. बी. मुखोपाध्याय का जन्म 1 जनवरी 1916 को पटना के कुनकुन सिंह लेन में हुआ था। उनके पिता बिपिन चंद्र मुखर्जी पटना के पी.एन.एंग्लो हाई स्कूल के हेडमास्टर थे। प्रथम श्रेणी में प्रथम श्रेणी में मैट्रिकुलेशन की परीक्षा पास की। सायंस कालेज से आईएससी पास करने के बाद उन्होंने पटना मेडिकल कॉलेज से एनाटॉमी, फिजियोलॉजी, पैथोलॉजी, फार्माकोलॉजी, मेडिसिन और ओटो रहिनोलैनीनोगोलॉजी में सम्मान के साथ एमबीबीएस की परीक्षा पास किया।
इसके बाद वे उच्च शिक्षा के लिए लंदन चले गए। वहां से उन्होंने सितंबर 1947 में एफआरसीएस और दिसंबर 1948 में एमसीएच (ऑर्थ) एलश्पूल पास किया। उन्होंने पल्मोनरी ट्यूबरकुलोसिस पर विशेष प्रतियोगी परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त करने के साथ लिनलिथगो गोल्ड मेडल जीता। उन्होंने वर्ष 1943 से 1946 तक ग्रेडेड सर्जन के रूप में भारतीय सेना में सेवा की। वर्ष 1949 में डॉ. मुखोपाध्याय ने पटना मेडिकल कॉलेज में ऑर्थोपेडिक सर्जरी विभाग में लेक्चरर के रूप में काम करना शुरू किया और 1961 तक इसी पद पर सेवा देते रहे। इसके बाद वर्ष 1961 से 72 तक वे पटना विश्वविद्यालय में ऑर्थोपेडिक सर्जरी के प्रोफेसर के रूप में अपनी सेवाएं दी। इसके बाद वे फरवरी 1973 तक बिहार सरकार के निदेशक-सह-अतिरिक्त सचिव के रूप में कार्य किया।
उन्होंने 1955 में भारतीय आर्थोपेडिक एसोसिएशन की शुरुआत की और छह साल तक इसके संस्थापक सचिव के रूप में कार्य किया और बाद में एसोसिएशन के अध्यक्ष बने। उन्हें 1970 में सर्वसम्मति से एसोसिएशन आफ सर्जन्स ऑफ इंडिया का अध्यक्ष चुना गया। उन्हें विकलांगों के पुनर्वास के लिए भारतीय सोसायटी का अध्यक्ष चुना गया। वे वेस्टर्न पैसिफिक ऑर्थोपेडिक एसोसिएशन के मानद फेलो थे। इस पद पर चुने जाने वाले एकमात्र भारतीय थे। उन्होंने वर्ष 1958 में ही बिहार ऑर्थोपेडिक एसोसिएशन की शुरुआत की, जिसकी अब पूरे राज्य में जिला शाखाएं हैं। वर्तमान में बिहार और झारखंड राज्य में भी उसकी शाखायें हैैं।
वर्ष 1955 में वे रायल कालेज आफ सर्जन्स आफ लंदन के हंटेरियन लेक्चरर नियुक्त होने वाले पहले भारतीय थे। चिकित्सा शोध एवं सेवा के क्षेत्र में वर्ष 1970 में भारत के राष्ट्रपति ने उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया था। इसके बाद वर्ष 1989 में उन्हें बीसी राय नेशनल अवार्ड इन द एमिनेंट मेडिकल मैन दिया गया।, वे राकफेलर फेलोशिप से भी सम्मानित किए गए, ताकि वे संयुक्त राज्य अमेरिका के महत्वपूर्ण ऑर्थोपेडिक केंद्रों का दौरा और स्मिथ एंड नेफ्यू फेलोशिप से ब्रिटेन के महत्वपूर्ण केंद्रों का भ्रमण कर सकें।
उन्होंने इंडियन रेड क्रॉस सोसाइटी, बिहार राज्य शाखा के तहत 1965 में पटना के कंकड़बाग में विकलांग बच्चों के लिए एक अस्पताल शुरू किया। वे इस अस्पताल के एक मानद निदेशक के रूप में 1975 तक काम करते रहे। वे एक ऐसे शिक्षक के रूप में जाने जाते हैं जिन्होंने न केवल बिहार बल्कि असम, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, संयुक्त प्रांत, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, जम्मू और कश्मीर, दक्षिण के राज्यों, रेलवे, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों तथा देश के अन्य संगठित क्षेत्रों के स्नातकोत्तर छात्रों को आर्थोपेडिक सर्जरी पढ़ाने और प्रशिक्षण देने का एक रिकार्ड कायम किया। उनके अधीन प्रशिक्षित स्नातकोत्तर देश के कई कालेजों में प्रोफेसर और आर्थोपेडिक विभागों के प्रमुख के पदों पर रहे हैं तथा अभी भी पूरे भारत में आर्थोपेडिक विशेषज्ञ के रूप में काम कर रहे हैं। यह स्पष्ट है कि वे देश के अपेक्षाकृत गरीब और कम विकसित राज्य बिहार में शल्य चिकित्सा विशेषज्ञता की शाखा को विकसित करने के लिए अपनी शुरुआत से ही प्रयत्नशील रहे तथा उनके प्रयासों के कारण बिहार में शल्य चिकित्सा की यह शाखा न केवल अन्य राज्यों के बराबर पहुंची बल्कि उनसे बेहतर बनी,जहां बाहर से छात्र शल्य विशेषज्ञता की कला और शिल्प सीखने यहां आते हैं।
इस विशेषज्ञता के सभी पहलुओं को उन्होंने अपने ज्ञान, कौशल और प्रतिस्पर्धा में खुद को हमेशा अद्यतन रखा।
डॉ. मुखोपाध्याय के दूसरे बेटे डॉ. जॉन मुखोपाध्याय अपने पिता की तरह ही शल्य विशेषज्ञता में उनसे प्रशिक्षित व माहिर हैं। 50 वर्ष की आयु प्राप्त करने से पहले ही उन्होंने पूरे देश में सबसे प्रतिष्ठित आर्थोपेडिक सर्जनों में से एक के रूप में अपनी पहचान बनाई हैं और उन्हें न केवल भारत में बल्कि विदेशों में भी व्याख्यान और प्रजेंटेशन के लिए बुलाया जाता है। उन्होंने कर्नल संगम लाल और प्रो. मेनन के संपादन में सर्जरी की पाठ्यपुस्तक में आर्थोपेडिक्स के अध्यायों का सृजन किया था। डॉ. मुखोपाध्याय ने डॉ. लाला सूरजनंदन प्रसाद द्वारा संपादित ऑर्थोपेडिक्स और बाल चिकित्सा पर लेखन कर चिकित्सा विज्ञान की श्रीवृद्धि में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया था। सर्जन्स एसोसिएशन द्वारा प्रकाशित होने वाली स्नातक और स्नातकोत्तर के लिए सर्जरी की अकादमिक पाठ्यपुस्तक के लिए ट्रॉमेटोलॉजी में भी उनका योग्यदान काफी महत्वपूर्ण है।
उन्होंने अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय पत्रिकाओं में लगभग 100 शोधपत्र प्रकाशित किए थे, जैसे कि जर्नल ऑफ बोन एंड जॉइंट सर्जरी, लंदन के रॉयल कॉलेज ऑफ सर्जन्स की कार्यवाही, वेस्टर्न पैसिफिक ऑर्थोपेडिक जर्नल, इंडियन जर्नल ऑफ सर्जरी, इंडियन जर्नल ऑफ ऑर्थोपेडिक्स और भारत में प्रकाशित कई पत्रिकाएं शामिल हैं। वे भारत में आर्थो के जटिल ऑपरेशन शुरू करने वाले पहले सर्जन थे। वर्ष 1953 में ही उन्होंने लंबी हड्डियों के फ्रैक्चर के लिए इंट्रा-मेडुलरी नेलिंग का सफल प्रयोग किया था। इसके दो वर्ष बाद ही उन्होंने हड्डी और जोड़ के तपेदिक(टीबी) के उपचार में एक्सिसनल सर्जरी के तकनीक का उपयोग शुरू कर दिया था। बचपन और बचपन में जन्मजात क्लबफुट के लिए संशोधित पोस्टीरियर रिलीज ऑपरेशन, पॉट्स पैराप्लेजिया का ऑपरेटिव उपचार आदि में भी अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया।
डॉ. मुखोपाध्याय ने कई व्याख्यान दिए हैं जैसे- बॉम्बे में डॉ. कटराक का व्याख्यान, लुधियाना में प्रो. लोबो का व्याख्यान, नंगल में प्रो. दोराईस्वामी का स्मारक व्याख्यान, 1.0.ए. में डॉ. किनी का स्मारक व्याख्यान, एम्स में कर्नल अमीर चंद का स्मारक व्याख्यान आदि काफी चर्चित रहा है। वे लिवरपूल, हांगकांग, सिंगापुर, डिब्रूगढ़, मणिपाल और भारत के कई अन्य मेडिकल कॉलेजों में विजिटिंग प्रोफेसर रह चुके हैं।
मार्च 2001 में दिल्ली में आयोजित सार्क देशों की एक विशेष बैठक में उन्हें प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया गया, जिसमें उल्लेख किया गया था कि वे 20वीं सदी के सार्क देशों के सबसे प्रतिष्ठित आर्थोपेडिक सर्जन थे। उनकी सामाजिक सेवाओं में रेड क्रॉस आंदोलन के प्रति उनकी गहरी प्रतिबद्धता शामिल है और वे कई वर्षों तक बिहार रेड क्रॉस सोसाइटी के उपाध्यक्ष भी रहे थे। 2003 में उनके निधन से ऑर्थोपेडिक सर्जरी के पितामह के एक लंबे युग का अवसान हुआ।