प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि को गारंटी मानकर बिहार के मतदाताओं ने नीतीश के नेतृत्व में फिर से सरकार बनाने की अनुमति तो दे दी है। लेकिन, यह असाधारण अनुमति बिहार को स्वावलंबी बनाने के सपने को साकार करने के लिए है। प्रबल जनमत से बनी बिहार सरकार के समक्ष जनआकांक्षा यक्ष प्रश्न बन विराट हिमालय की तरह सीना तानकर खड़ी हो गयी है। इस यक्ष प्रश्न का संतोषजनक उत्तर ही एनडीए का भविष्य तय करेगा।
अराजक व्यवस्था से त्राण मिलने के बाद बिहार के मतदाताओं को जब लगा कि नीतीश सरकार ही उनकी आकांक्षाओं को पूरी कर सकती है तब 2010 के चुनाव में उन्हें 2043 में 206 सीटों पर विजयी बनाकर उन्हें प्रचंड जनादेश दिया था। बीच में नीतीश कुमार राजद के साथ चले गए थे। चुनावी समीकरणों के कारण वे सरकार बनाने में सफल रहे लेकिन, सुशासन बाबू की उनकी छवि धूमिल होने लगी थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की घोषणाओं पर विश्वास करते हुए बिहार के मतदाताआंे ने 2010 की ही तरह 243 सीटों में 202 सीटों पर एनडीए को विजयी बना दिया। अब एनडीए की सरकार के सामने जनआकांक्षा की कसौटी चुनौति बनकर खड़ी है। जनाकांक्षा पूरी करने की जिम्मेदारी पीएम मोदी के साथ-साथ नीतीश कुमार, उनके दोनों उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और विजय कुमार सिन्हा की भी है। यह अग्नि परीक्षा से कम नहीं है।
बिहार के चुनावी इतिहास में 2005 का विशेष स्थान है। इस वर्ष बिहार विधानसभा के गठन के लिए दो-दो चुनाव हुए थे। पहला चुनाव फरवरी माह में हुआ था जिसमें किसी भी गठबंधन को इतनी सीटें नहीं मिली थीं कि वह सरकार बना सकें। विजयी विधायक शपथ भी नहीं ले सके थे कि बिहार विधानसभा की अकाल मृत्यु हो गयी थी। उस चुनाव में पहली बार जीतने वाले कई प्रत्याशी बिहार विधानसभा में प्रवेश किए बिना ही पूर्व विधायक की श्रेणी में आ गए थे। उनमें वर्तमान उपमुख्यमंत्री विजय सिन्हा का नाम भी शामिल है। यह भारत के लोकतांत्रिक इतिहास का काला अध्याय है।
इसके बाद अक्टूबर-नवंबर में फिर से बिहार विधान सभा का चुनाव हुआ जिसमें नीतीश कुमार के नेतृत्व में एनडीए की सरकार बनी थी। नीतीश सरकार ने पांच वर्षों में बिहार की जर्जर व्यवस्था को तेजी से पटरी पर ला दिया तो जनता ने 2010 के चुनाव में 2043 में 206 सीटों पर विजयी बना दिया। यह प्रचंड बहुमत विकास की गति और तेज करने की अनुमति थी।

बार-बार मुख्यमंत्री बदलने की परिपाटी स्थापित होने के बाद कांग्रेस का बिहार में पतन हो गया था। कांग्रेस के इस प्रवृत्ति के कारण बिहार का प्रशासनिक तंत्र चरमरा गया था। उसी समय बिहार एक अराजक राज्य के रूप में बदलने लगा था। जनआकांक्षा की उपेक्षा कर धनबल और बाहुबल के आधार पर सत्ता में बने रहने की राजनीतिक परिपाटी कायम होने लगी थी। 1989 के आम चुनाव में वीपी सिंह के कारण कांग्रेस की करारी हार हो गयी थी। इसके बाद भाजपा के सहयोग से लालू प्रसाद यादव बिहार के मुख्यमंत्री बने थे। जातिवाद और तुष्टिकरण के काग्रेस की नीतियों को उन्होंने पूरी तरह से आत्मसात कर लिया। किसी भी कीमत पर शासन में बने रहने की नीति पर लालू प्रसाद यादव कांग्रेस से भी तेज गति से चलने लगे। इसी नीति के बल पर लालू यादव बिहार पर ठोककर राज करने लगे। बाद मेें इसमंे कांग्रेस भी उनके साथ आ गयी। लेकिन, ठोक कर राज्य करने की उनकी नीति और स्वभाव के कारण बिहार एक अराजक और बीमारू राज्य बनकर रह गया।
लगभग 15 वर्षों बाद 2005 में पहली बार नीतीश कुमार के नेतृत्व में बिहार में एनडीए यानी भाजपा समर्थित सरकार बनी थी। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी के नेतृत्व में प्रशासनिक व्यवस्था को पटरी पर लाने और जनआकांक्षा की प्रतिपूर्ति के लिए प्रयास शुरू हुआ। नीतीश कुमार की सरकार को लोग सुशासन की सरकार कहने लगे। सामूहिक नरसंहार, अपहरण जैसी जघन्य घटनाओं पर रोक लगने लगी। बिहार की सड़कों की दशा बदलने लगी। बिजली की स्थिति सुधरने लगी। बिहार अपने पुराने गौरव को याद करने लगा। इसका परिणाम यह हुआ कि 2010 के चुनाव में बिहार में नीतीश के नेतृत्व वाली एनडीए को प्रचंड बहुमत मिला। बिहार विधानसभा के 243 सीटों में से 206 सीटों पर भाजपा और जदयू के प्रत्याशी जीते थे। वहीं लालू-राबड़ी के राष्ट्रीय जनता दल को मात्र 22 सीटों पर ही संतोष करना पड़ा था। इस चुनाव परणिाम में राजद अपने बल पर नेता प्रतिपक्ष बनाने की स्थिति में भी नहीं रहा।
इस पृष्ठभूमि के साथ यदि देखें तों वर्ष 2025 के चुनाव में भी 2010 जैसी ही स्थिति बन गयी है। इसबार के चुनाव में राजद की झोली में मात्र 25 सटें ही आयी है। इसबार राजद अपने बल पर नेता प्रतिपक्ष बनाने की हैसियत में है। लेकिन, पूर्व की तुलना में उसकी शक्ति का शर्मनाक क्षय हुआ है। वहीं पूरे इंडी गठबंधन को मात्र 35 सीटों पर ही संतोष करना पड़ा है। 2010 से भिन्न इस चुनाव में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बन गयी है।

चुनाव परिणाम की घोषणा के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भाजपा के केंद्रीय कायालय में आयोजित समारोह में कहा कि बिहार ने 2010 के बाद का सबसे बड़ा जनादेश एनडीए को दिया है। मैं बहुत विनम्रता से एनडीए के सभी दलों की ओर से बिहार की महान जनता का आभार व्यक्त करता हूं। मैं बिहार की महान जनता को आदरपूर्वक नमन करता हूं। पीएम मोदी ने कहा कि एक पुरानी कहावत है- लोहा लोहे को काटता है.. बिहार की इस जीत ने नया माई फॉर्मूला दिया, जिसका मतलब है- महिला और यूथ। आज एनडीए उन राज्यों में सत्ता में है, जहां युवाओं की संख्या ज्यादा है। इसके बाद जो उन्होंने कहा वह बिहार की नूतन आकांक्षा की ओर संकेत करता है। उस अत्यंत महत्वपूर्ण मोके पर पीएम मोदी ने कहा कि बिहार विधानसभा चुनावों में मिली जीत विकास की राजनीति के लिए एक जनादेश है। बिहार के लोगों ने भाई-भतीजावाद की राजनीति का बहिष्कार किया है।
बिहार विधानसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे को सामने रखकर राजग चुनाव लड़ रहा था। बिहार की जनता ने नीतीश कुमार से ज्यादा पीएम मोदी की बातों पर भरोसा किया। जिसे पीएम मोदी खूब समझ रहे है। बिहार उनकी ओर आशा भरी नजरों से देख रहा है। यदि आशा पूरी नहीं हुई तो वह अटूट विश्वास प्रतिघात में भी बदल सकता है।
नीतीश कुमार भी यह समझ रहे थे कि इस चुनाव में उनकी जगह पीएम मोदी का जादू मतदाताओं पर ज्यादा असर कर रहा है। इसीलिए वे चुनावी सभाओं में पीएम मोदी का जोरदार अभिनंदन करने की अपील करते थे। विधानसभा में भी उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम लेते हुए उनके प्रति आभार व्यक्त करने को कहा है।
बिहार में सड़क, बिजली जैसी मूलभूत सुविधाओं की स्थिति अच्छी हो गयी है। बिहार के लोगों में अब अपने जीवन स्तर को बेहतर करने एवं रोजगार के अवसर पैदा करने की आकांक्षा जगी है। अब प्रश्न उठता है कि लोक के इस आकांक्षा को पूर्ण करने के लिए सरकार चालने वालों में अपेक्षित राजनीतिक इच्छा शक्ति, योजना निर्माण एवं समयबद्ध कार्य कराने की क्षमता है? इस प्रश्न को लेकर प्रतिपक्ष की ओर से जो आशंकराएं व्यक्त की जाती रही है उसमें मुख्सयमंत्री नीतीश कुमार के स्वास्थ्य को लेकर चिंता प्रमुख है।
प्रतिपक्ष के नेता अक्सर आरोप लगाते हैं कि बिहार सरकार कुछ अफसरों की मुट्ठी में कैद हो गयी हैं। नीतीश कुमार अब उस स्थिति में नहीं हैं कि वे बिहार के विकास के रथ को तेजी से हांक सकें। उम्र के साथ-साथ किसी भी व्यक्ति के कार्य करने की क्षमता में हृास होता है। इस सच्चाई से कोई्र मुंह नहीं मोड़ सकता। नीतीश कुमार के नृतृत्व में बिहार अराजक स्थिति से निकल सका था। बिहार के लोग इसे याद रखते हैं। वे नीतिश के प्रति आज भी कृतज्ञता का भाव रखते हैं। इसीलिए राजनीतिक दृष्टि से नीतीश कुमार का महत्व आज भी बरकरार है।

इसका दूसरा पक्ष यह है कि बिहार के सरकारी कार्यालयों में भ्रष्टाचार के लाईलाज बीमारी के कारण शहर से लेकर गांव तक के लोग त्रस्त हैं। लाफिताशाही के कारण विकास परियोजनाएं समय पर पूरी नहीं हो रही है। केंद्र में अनुकूल सरकार होने बावजूद बिहार अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए तेजी से आगे नहीं बढ़ पा रहा है। नीतीश कुमार के स्वास्थ्य की बहुत लंबे समय तक अनदेखी का खामियाजा अंततः बिहार को भुगतना पड़ रहा है। दूसरी ओर सरकारी नौकरी के लिए विभिन्न परीक्षाओं मंे व्यापक स्तर पर धांधली के विरोध में आंदोलन होते रहे हैं। बिहार में रोजगार के नये अवसर नहीं पैदा हो रहे हैं। इसके कारण यहां के युवाओं को काम की खोज में दूसरे प्रदेशांे में जाना पड़ रहा है। दूसरे प्रदेशांे में उनके साथ अपमानजनक व्यवहार की खबरंे अक्सर वायरल होती रहती हैं। वहीं बिहार के कई विश्वविद्यालयों में परीक्षा व रिजल्ट समय पर नहीं होने के कारण छात्रों का तीन-तीन वर्ष यूं ही बर्बाद हो जा रहा है। ये सारी बातें मिलकर बिहार में सरकार के विरूद्ध असंतोष का माहौल बना रहा है।
कमजोर विपक्ष के कारण सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के समक्ष कोई राजनीतिक चुनौति नहीं है। लेकिन, विकास की गति तो धीमी हो ही गयी है। यदि ऐसा ही जारी रहा तो बिहार की लोकआकांक्षा फिर से आहत होगी। यह सपने टूटने जैसी बात होगी।