प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संकल्प है कि आजादी के शताब्दी महोत्सव पर भारत विकसित और विश्वगुरु के रूप में विश्व में स्थापित दिखेगा। नरेंद्र मोदी के इस महान संकल्प का मार्ग भारत के प्राचीन सांस्कृतिक केंद्रों के गौरव की पुनर्स्थापना से होकर गुजरता है। भारत के पुरूषार्थ के प्रतीक श्रीराम की अयोध्या अब भव्य हो गयी है। भारत की सांस्कृतिक राजधानी काशी की दिव्यता विश्व को आकर्षित करने लगी है। लेकिन, भारत की पराशक्ति और पराविद्या का केंद्र गयाजी को लोकन्यारी नगर बनना अभी बाकी है।
भारत की ज्ञान परंपरा का केंद्र
अयोध्या की तरह गयाजी की महिमा को भी नकारात्मक और भ्रामक नैरेटिव से आहत करने के प्रयास होते रहे हैं। सैकड़ों वर्षों से चल रहे इस नकारात्मक अभियान के परिणामस्वरूप सिद्धार्थ को बुद्धत्व प्रदान करने में समर्थ तप और ज्ञान के इस भूमि का गौरव मंद पड़ गया है। यह सम्पूर्ण विश्व के मानवता के लिए भारी क्षति है। भारत के प्राचीन ग्रंथों में ऐसे प्रमाण भरे हुए हैं जिससे सिद्ध होता है कि गौतमबुद्ध से बहुत पहले से भारत की ज्ञान परंपरा वहां विकसित स्वरूप में थी। विष्णु के उस तपोभूमि पर भारत की संस्कृति की धारा का ओजस्व प्रवाह था। उस गौरवशाली गयाजी के दर्शन करके ज्ञान की खोज में आने वाले विदेशी यात्री धन्य हो जाते थे। पूरे विश्व में भारत की ख्याति इसके बाहुबल, धनबल या व्यापार के कारण नहीं रही है बल्कि इसकी समृद्ध संस्कृति और ज्ञान परंपरा से रही है। इसके पुनर्जारण से ही भारत का सामर्थ्य पूरे विश्व में स्थापित होगा।
प्राचीन और अनिवार्य तीर्थ
भारत के प्राचीन ग्रंथों तथा पुराणों में वर्णित ऐतिहासिक उल्लेखों से प्रमाणित होता है कि गयाधाम एक प्राचीन अनिवार्य तीर्थ रहा है। यहां सम्पन्न होनेवाला पितृयज्ञ, अन्य यज्ञ, पूजा-अर्चना आदि याज्ञिक कर्मकांड के विकसित रूप हैं जिसका स्रोत वैदिक प्रार्थनामय जीवन से स्रवित होता है। यहां का कर्मकांड एवं ज्ञान परंपरा भारत की वैदिक परंपरा का ही एक युगानुकूल प्रयोग है। गयाधाम में चारों ओर फैली वेदियां जहां सम्पूर्ण भारत तथा विदेश से आनेवाले भारतीय या भारतीय विचारधार को आत्मसात करने वाले लोग तीर्थाटन का सुफल पाते रहे हैं। लंबे ऐतिहासिक काला खंड में इसके साक्ष्य उपलब्ध हैं। इन वेदियों पर कर्मकांड का नेतृत्व देनेवाले गयाधाम में जन्मे, पले-बढ़े और अंततः यहीं अंतिम गति पानेवाले गयापाल तीर्थपुरोहित हैं।
पितृयज्ञ : बोधगया की पहचान
प्रस्थानत्रयी समर्थित गयाधाम का कर्मकांड पितृयज्ञ बोधगया से जुड़ा है। आधुनिक बोधगया में बौद्ध मत का प्रचार-प्रसार उत्तरोत्तर विदेशियों के सहयोग से हो रहा है। परिणाम स्वरूप कई आकर्षक बौद्ध विहार बने हैं। अत्याधुनिक सुविधाओं से पूर्ण नगरीय व्यवस्था अब आकार पाने लगा है। पिछले शताब्दी के पूर्वार्द्ध तक वह प्राचीन ज्ञान स्थली नालंदा के खंडहर की तरह वीरान था। पितृपक्ष के अवसर पर श्राद्ध और तर्पण के लिए आने वाले तीर्थ यात्रियों के कारण वर्ष में एक बार गूंजायमान होता था।
गया तीर्थ की वेदी—धर्मारण्य
बोधगया में गया-तीर्थ की प्राचीन वेदी धर्मारण्य है। धर्मारण्य क्षेत्र के उरुबेला में गौतम सिद्धार्थ को जब अश्वत्थ (पीपल) के नीचे उस अलौकिक ज्ञान की प्राप्ति हुई तो वही वृक्ष बोधितरु के नाम से जाना गया। इस युग की अनुकूलता के लिए अब यह वृक्ष मात्र एक दर्शनीय वेदी के रूप में स्वीकृत है। अब केवल यात्री वहां दर्शन करते हैं।
एकम् शत विप्राः बहुधा वदन्ति का उद्घोष करने वाले सनातन धर्म में अनेक मतवादों के पनप जाने के कारण मानव जीवन दिग्भ्रमित हो रहा था। उस समय भगवान बुद्ध के उपदेशों से यह क्षेत्र आप्यायित हुआं था। बाद में बुद्ध-वचन ने भी मतवाद का रूप ग्रहण कर लिया। इसी परा प्रवृति यानी तप-साधना के माध्यम से आत्मिक उत्थन की प्रवृति सांगठनिक जड़ता या मतवाद में सीमटने लगी।
भारतीय चिंतन में मन और शरीर
भारतीय चिंतन ने शरीर से मन के अलग होने का सत्त्व तथा मन से आत्मा के अलग होने का यथार्थ उद्घाटित किया है। इस उर्ध्वाकर्षण की गति पुरुषार्थ चतुष्टय से यानि धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष से सिद्ध हुआ। इस में ‘भव’ अर्थात् होने की प्रधानता लक्षित है। ‘होना’ आत्यंतिक सामीप्य से अदृश्य है। इस में यौगिक भावचक्रकों और कोशों की कल्पना पिण्ड के भीतर साकार होती है, जो संश्लेषण आश्रित है। इन में सात लोक हैं। इन लोकों में अनेक यौगिक सूक्ष्म, वृद्ध नाड़ियाँ हैं। जीवन की अवधि संस्कारों तथा आश्रमों की मार्यादाओं में पुरश्चरण से, दक्षिणा से, प्रदक्षिणा से तथा साष्टांग दंडवत् से, उपवास से, सत्संग से, उपासना-से, ज्ञान मीमांसा से तथा कर्म मीमांसा से सारगर्भित है।
अध्यात्म और आस्था का साक्षात्कार
तत्व-दर्शन अव्याकृत है, रहस्यमय है और परम गोपनीय है। भारतीय दर्शन ने सिद्ध किया कि अस्तित्व सतत् है, सनातन है। भारतीय चिंतन का मर्म अध्यात्म है तथा आस्था इसका साक्षात्कार। तत्त्व-दर्शन की स्वीकृति श्वांस-प्रष्वांस में अंतर्निहित है जो प्राणों का आधान है तथा यही मन का स्वामी है। मन पूर्वजन्मों से इंद्रियों एवं बहुविध बुद्धिजनित वासनात्मक द्वैत से आसक्ति ग्रसित है। यह वासना त्रिगुणात्मक है। गुरु-पुरोहित जो शिष्य-अनमा की तलाश में है- वह उपासना में साधक शिष्य के अंतस्तल में स्थित अंतेन्द्रिय को जगाता है। यह अंतस्तल जैव हृदय के विपरीत दायीं ओर है और अंतर्ध्यान अवस्था में स्वानुभूत है।
राजकुमार सिद्धार्थ की ध्यानस्थली
राजकुमार सिद्धार्थ जब इस भूमि पर ध्यानस्थ होते हैं तो ये सारी बातें उनके अनुभव के धरातल पर उतरती है। इस अनुभव का आधार आत्मा है। उसे ही बौद्ध पंथ में विपस्यना कहते हैं। यह भारत की परा विद्या है। यहां आने वाले विदेषी जिज्ञासुओं को यहीं विद्या आकर्षित करती है। यही भारत की सौम्य शक्ति है। इसी के आधार पर भारत कभी विश्व गुरु था ओर आगे भी बनेगा। यह विद्या समय-समय पर लुप्त होती है और फिर पीतर ऋषियों की कृपा से विश्व कल्याण के लिए प्रकट भी हो जाती है। इसके प्रकट होने के बाद जो होता है उसे समान्य बुद्धि वाले जन चमत्कार कहते हैं। लेकिन, वह तो विद्या का प्रभाव मात्र होता है। प्रकृति बदलने लगती है, अनुकूल होने लगती है। इसके साथ ही मनुष्य और समाज भी बदलने लगता है।
समाधि और पितरों का विज्ञान
पितरों के सान्निध्य में समाधि घटित होती है। समाधि में वृत्तियाँ आत्मरूप हैं। उपास्य पितर का साक्षात्कार होता है, अनुमान होता है। समाधि धर्ममेघ है जिससे वासनाएँ नष्ट होती हैं और ‘तत्त्वमसि’ का ज्ञान होता है। यही सघन समाधि में तलहत्थी पर स्थित आँवले की तरह अपरोक्ष ज्ञान सिद्ध है। भारतीय चिंतन की भूमिका में घ्यातव्य है कि जो है वह दिखता नहीं तथा जो दिखता है- वह है नहीं। भारतीय तत्त्व-दर्शन अध्यास के इस रहस्य को जानकर उस साक्षी को ढूंढ़ता है जो जैव हृदय से प्रति संवेदित हो आवेश में, उद्वेग में विक्षेपग्रस्त होता रहता है। यह साक्षी अंतस्तल स्थित अंतेन्द्रिय के गुरु उपदिष्ट होने पर वासना से छूटता है और मन उस अंतर्ध्यान अवस्थित साक्षी में विलीन हो जाता है। यह विलय ज्ञान, भक्ति, कर्म की त्रिवेणी है।
वेद का उद्घोष है नान्याःपंथा यानी साक्षी के इस दिव्य दर्शन के लिए एकाग्र अनन्य समर्पण ही केवल मार्ग है। इस तथ्य के आलोक में कहा जा सकता है कि जीवन के गहरे गम्भीर युक्तियुक्त संश्लेषण से भारतीय चिंतक आध्यात्मिक जगत् के शासक और निदेशक रहे। भारत का पारमार्थिक संधान गहन अंधकार में बिजली कौंधने से सर्वस्व का तत्काल उद्घाटन है, चमत्कार है। यहां बुद्धि को सापेक्ष देखा गया एवम् परमार्थ सत्ता को निरपेक्ष पाया गया। इसी कारण भारत की विशाल, वृहद्, विस्तृत परम्परा में भारतीय तत्त्व दर्शकों ने उस परम सत्ता को भांति-भांति की दार्शनिक पद्धतियों से ढूँढ़ा।
अध्ययनों से स्पष्ट हुआ है कि भारतीय उस चैतन्यता के दर्पण में जागतिक प्रतिबिम्बों के उभरने पर उसके प्रति मोहग्रस्त नहीं हुए और चित्त पर पड़ा आवरण साधना तथा उपासना के परिप्रेक्ष्य में तात्कालिक रहे। उस पर कोई दोष नहीं पड़ा, वह निर्दाेष रहा। यह उस सत्य की अनन्य पहचान है। चैतन्यता की झलक जितनी निकट लगी- उसे उतना ही दूर समझा गया। यहीं से पतन शुरू होता है।
चैतन्यता अति सूक्ष्मतम है। इस सूक्ष्मतम चैतन्य का परिदर्शन भारतीय तत्त्वद्रष्टाओं ने प्रबल ज्ञानाग्नि के प्रज्वलित होने पर किया। प्रबल ज्ञानाग्नि से प्रारब्ध तक नष्ट होते हैं। प्रारब्ध का ध्वंस भगवत्ता का एक विशिष्ट निदर्शन है। प्रबल ज्ञानाग्नि देहपात है जिसे अतिमृत्यु अवस्था कहते हैं। सिद्धार्थ जब बुद्ध के तप क्षेत्र मे आते हैं तब उनकी चेतना उर्ध्व हो जाती है। शरीर का आभाष नहीं रहता। कथित विद्वान कहते हैं कि सिद्धार्थ वहां अपने प्रष्नों का उत्तर ढूंढने की बेचैनी में घुमते-घुमते वहां पहुंच गए थे। सामान्य तर्क की कसौटी पर भी हम सोचें तो यह लगता है कि जहां कोई वस्तु हो ही नहीं वहां वह कैसे मिल सकती है। इसका ममतलब है कि सिद्धार्थ के बहुत पहले से उस भूमि पर बुद्धत्व के तत्व सूक्ष्म रूप से विद्यमान थे। उस सूक्ष्म तत्व के सम्पर्क से सिद्धार्थ के अंतर की ज्ञानाग्नि विष्व को आलोकित करने के लिए प्रज्ज्वलित हो गयी।
भारतीय तत्त्व-दर्शन का क्रमांकन
भारतीय चिंतन की विशाल, गम्भीर, गुह्य परम्परा का ऐतिहासिक क्रमांकन संभव नहीं है क्योंकि यह नित्य है और अनादि भी है। लेकिन, पाश्चात्य विद्वानों ने इस ओर श्रम किया है। उनके निष्कर्षों का भारतीय विद्वानों की गवेषणाओं में प्रतिफलन मिलता है। तर्कातीत तत्त्वदर्शन को जब तर्कों से सिद्ध करने की परम्परा चली तो तर्कों के न्यास, उपोद्घात से क्रम के संकेत निकले और उनपर इतिहास गढ़ा जाने लगा। जड़ बुद्धि से गढ़े जाने वाले उस इतिहास में तो बुद्ध के पूर्व की परम्पराओं के लिए कोई स्थान ही नहीं रहा। इसके साथ ही अपने जातीय समूह के अहंकार की तुष्टि के लिए गौतम बुद्ध से ही इतिहास की शुरूआत कर दी गयी। आपका इतिहास हमसे बहुत पुराना नहीं, हमसे ही आपने सम्पूर्ण ज्ञान-विज्ञान प्राप्त किया है। भारत के आत्मविष्वास को आहत करने वाले ऐसे नैरेटिव के कारणसम्पूर्ण विष्व को उस अमृत ज्ञानधारा से वंचित करने वाला कुकृत्य किए गए।
देश, काल, पात्र से बहुविध आवेष्टित भारतीय तत्त्व-दर्शन को 529 ई. पूर्व किसी हरिभद्र ने जनश्रुति के आधार पर षड़दर्शन समुच्चय में मत मतान्तरीय परिवेश सहित विश्लेषित कर भारतीय तत्त्वदर्शन की परम्परा को झलकाया है। इस संकलन में छः श्रौतदर्शन हैं। छठी शती के किसी दिगम्बर जैन समन्तभ्रद की आत्ममीमांसा में भी दार्शनिक पद्धतियों की समालोचना मिलती है। माध्यमिक बौद्ध भावविवेक की ‘तर्कज्वाला’ में मीमांसा, सांख्य, वैशेषिक, वेदान्त की समीक्षा है। तेरहवीं शती के अन्त में दिगम्बर जैन विद्यानन्द विरचित ‘अष्टसाहस्री’ तथा मेरूतंग, दिगम्बर जैन विरचित ‘षड्दर्शन विचार’ में हिन्दू दर्शनाशास्त्र की समीक्षा है। चौदहवीं शती, मध्वाचार्य के ‘सर्वदर्शन संग्रह’ एवम् मधुसूदन सरस्वती के ‘प्रस्थान भेद’ में भी दार्शनिक सिद्धान्तों का वर्णन है। वस्तुतः भारतीय तत्त्व-दर्शन की परम्परित टीका-टिप्पणी, भाष्य ईसा की दूसरी शती से देखे जा सकते हैं जिसमें आस्तिक दर्शन, नास्तिक दर्शन के समस्त दिग्गज तत्त्व-दर्शन पर संवाद करते दिखते हैं।
विष्णु का तपक्षेत्र गयाजी प्राचीनकाल से ज्ञान का केंद्र रहा है जहां षट्दर्षनों पर संवाद की दिव्य परपरा थी। यहां तक कि गयाजी में नास्तिक चिंतन की एक धारा भी थी जिसका हिंसक विरोध नहीं था। श्रुति स्मृति की परम्परा वाले भारत वर्ष में आस्तिक तथा नास्तिक वर्गों में विभाजित भारतीय दर्शन की सांख्य प्रतिष्ठा प्राचीन हो, वैशेषिक और न्याय तुलनात्मक विचार से अर्वाचीन और मीमांसा तथा वेदान्त माध्यमिक। ईसा की दूसरी शती में भारतीय दार्शनिक साहित्य सूत्रों में बँधने लगे थे। छठी शती ईसा पूर्व से ईसा की दूसरी शती तथा अनन्तर- एक दीर्घ अवधि में देखा जाता है कि चार्वाक् दर्शन बौद्ध पिटक, भगवद्गीता, जैनमत, शैवमत, वैष्णवमत, शाक्तमत एवं अन्य अमूर्त विचारों की वाहिका भारतीय दार्शनिक पद्धतियाँ मत मतान्तरों के साथ फूलीं-फर्ती। इससे पूर्व वैदिक दर्शन-मंत्रों, सूक्तों, ब्राह्मणों, उपनिषदों, पुराणों में जाज्वल्यमान है।
भारत में तत्त्वदर्शन की परम्परा अवश्य अत्यंत प्राचीन है परंतु उसकी समीक्षा आत्मानुभूति के बिना संभव नहीं है। इसके युगानुकूल प्रयोग के लिए भारत में भाष्यकारों की प्राचीनपरमपरा रही है। आदि शंकराचार्य से लेकर वैष्णव मत के प्रवर्तक रामानुजाचार्य तक सभी भाष्यकार ही है। आर्यों को द्रविड़ों से अलग बता कर इंतिहास के नाम पर कल्पना गढ़ने की भी परम्परा रही है। शिव आर्यो के नहीं बल्कि अनार्यों के देवता है इसी प्रकार की कल्पना वृक्ष का एक विषाक्त फल है। उत्तर भारत को दक्षिण भारत से अलग करने के लिए एक फर्जी सिद्धांत आधुनिक भारत के अकादमिक जगत में प्रचलित है। प्राकृतिक दैवी संरचनाओं में शिव-शक्तत्यात्मक कल्पना मिलती है। लेकिन साक्ष्यों के अभाव में उनकी आलोचना नहीं हो सकती। उस युग के पुरातात्विक अवशेषों से सिद्ध होता है कि द्रविड़ों की दैवी कल्पना पारमार्थिक थी जिसके आलोक में समाज अनुशासित था और जन-जीवन को स्वस्थ दिशा-निर्देश मिलता था।
अपौरुषेय वैदिक ऋचाएँ, जिसमें भारतीय तत्त्व-दर्शन की नींव है। इन्हें मानवता को आध्यात्मिक जीवन मर्म की आद्य देन माना गया है। वैदिक ऋचाओं के संकलन में एक दीर्घकाल घटित हुआ । मैक्समूलर जैसे पष्चिमी विद्वान शायद इसके मर्म को ग्रहण नहीं कर सके। इसीलिए उन्होंने पष्चिम की परंपरा के अनुसार इस काल को दो भागों में बांटने का प्रयास किया। छंदकाल तथा मंत्रकाल। उनके अनुसार छंदकाल में वैदिक सूक्तों की स्वाध्याय पूर्ण रचना हुई। यह रचना स्वतः स्फूर्त थी। यह नितान्त नैसर्गिक उद्रेक का प्रतिफलन था तथा तन्मयता के क्षणों में एकाग्र प्रार्थनामय अनन्य समर्पण था। मंत्रकाल में ये प्रार्थनाएं क्रमबद्ध हुईं और ज्ञानाश्रित कर्मयज्ञ का विकास हुआ। ऐसा सिद्धांत देने वाले मैक्समूलर देवस्य पष्य काव्यं न ममार न जीर्यते की वेद उद्घोष की उपेक्षा कर दी। वेद का मूल परा है जो नित्य और अनादि है। इसका प्रतिफल चतुष्टय पुरूषर्थ है जो अपरा है।
यज्ञ सम्पादन के लिए मंत्रों की संहिता यजुर्वेद है लेकिन उसका आधार परा की भाव भूमि पर मंत्रों के दर्षन का सामर्थ्य है। ऋचाओं को स्वरीतया देनेवाली संहिता सामवेद है लेकिन उसका आधार वह सार शब्द है जो ब्रह्म स्वरूप् है। अथर्ववेद यज्ञ के पूर्ण निरीक्षण का विधान देता है जिसका संचालन ऋत सम्पन्न महापुरूष से संभव है। संहिताओं के पश्चात् ब्राह्मण ग्रंथों की रचना हुई। प्रत्येक वेद की शाखा के अनुसार ब्राह्मण तथा आरण्यक भिन्न-भिन्न हैं। पष्चिम के विद्वानों ने अपनी बुद्धि के आधार पर कहा है कि ई० पू० पंद्रहवीं शती में यह वैधानिक कार्यक्रम चला होगा। लेकिन, जब उनकी परम्परा और उपकरणों के आधार पर ही शोध होने लगे तब वेद के आविर्भाव का काल बहुत पहले सिद्ध होने लगा। गौतम बुद्ध ईसा से पांच-छह सौ वर्ष पूर्व हुए थे। बौद्ध मत में ईसा से पाँच सौ वर्ष पूर्व समस्त वैदिक साहित्य में श्रौत-दर्शन का विद्यमान होना स्वीकृत है। वैदिक साहित्य का काल निर्धारण विद्वानों के बीच मतभेद का विषय है।