उत्थान-पतन, विचित्रता व रोमांच की अनगिनत कथाएं गढ़ते हुए मानव की विकास यात्रा गंगा-सरयू व सोन नदियों के संगम स्थल पर समृद्धि का साक्ष्य छोड़ते हुए आगे बढ गय़ी थी। ये साक्ष्य हमारे गौरवशाली भारत का इतिहास हैं जो हमें फिर से उठ खड़ा होने की प्रेरणा देने में समर्थ है। यह सतत् साभ्यतिक साक्ष्य से युक्त विकास का प्राचीन मॉडल है। वर्तमान में यह स्थल चिरांद नाम से जाना जाता है। यहां काल के कपाल पर पुरुषार्थ ने जो लिखा था वह सीता की तरह पृथ्वी के गर्भ में समा गया परन्तु उसकी कीर्ति किसी न किसी रूप में स्मृतियों व संस्कारों में कायम रही। तभी लोकनायक गोस्वामी तुलसी दास ने इस महान धरती के प्रताप का उल्लेख अपनी अमर कृति रामचरितमानस के बाल कांड में कर दिया। लेकिन सीता की तरह इस दुलर्भ पुरातात्विक स्थल और महान विरासत को भी उपेक्षा और अग्नि परीक्षा के दौर से गुजरना पड़ रहा है।
रामचरितमानस के बाल कांड के 39वें दोहे के बाद गोस्वामीजी अयोध्या से बक्सर और बक्सर से मिथिला की ओर जाने वाले मार्ग की चर्चा आध्यात्मिक संकेतों के साथ करते हैं। चिरांद ही वह स्थान है जहां भारत के समृद्ध इतिहास व ज्ञान परंपरा के साक्षी तीनों बड़ी नदियों का जल मिलकर समुद्र की ओर प्रवाहित होने लगता है। इसमें वे चिरांद के आध्यात्मिक प्रताप के साथ ही इसकी भौगोलिक संरचना का अत्यंत रोचक वर्णन करते हैं। गंगा को भक्ति, अमरकंटक से निकलने वाले नद सोन को ज्ञान व सरयू को वैराग्य का प्रतीक बता गोस्वामीजी ने इन नदियों के संगम स्थल को संस्कृति, परंपरा व विद्या की भूमि के रूप में इंगित किया है। संगम पर ऋषि संयम करहीं, शुध बुध बल आतम धरहीं…।
आज का पुरातात्विक स्थल चिरांद लोक मान्यता व विश्वास में दानी राजा मौर्यध्वज की राजधानी, धर्म नगरी, तीर्थ राज की तरह पवित्र संगम स्थल रहा है। यह प्राचीन स्थल गुमनामी के अंधेरे में इस कदर समा गया था कि इसकी पहचान करीब डेढ़ सौ वर्ष पुराने डोरीगंज बाजार के समीप स्थित एक गांव के रूप में बन गयी। वहां जंगल-झाड़ लगे मिट्टी के टीले के सिवा कुछ भी नहीं बचे थे।
लोक मान्यताओं व प्राचीन पुस्तकों में वर्णित बातों के आधार पर यहां के टीलों की खुदाई के बाद इसके गर्भ से असाधारण ऐतिहासिक महत्व वाले पुरावशेष निकलने लगे, तब गुमनाम हो चुके इस स्थल की कीर्ति अचानक पूरे विश्व में फैल गयी। इसने औपनिवेशिक काल में लिखे गए इतिहास की मान्यताओं को बदल दिया।
तीन प्रमुख नदियों के संगम पर स्थित चिरांद नवपाषाणकाल से लेकर पूर्व मध्यकालीन संस्कृतियों को एक सूत्र में पिरोने वाला बिहार का ही नहीं, बल्कि भारत का एकमात्र महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल है। चिरांद ही वह स्थल है जो अतीत के उस युग पर प्रकाश डालता है जिसके बारे में इतिहास के पन्ने भी मौन हो जाते हैं।

इतिहासकार यह मानते रहे हैं कि मैदानी क्षेत्र में नवपाषाणकालीन सभ्यता नहीं थी। लेकिन, चिरांद से उपलब्ध पुरावशेषों ने इस मान्यता को भी बदल दिया। यहां की सबसे प्रारंभिक संस्कृति नवपाषाण युग से संबंधित है। यह मानव की विकास यात्रा का वह महत्वपूर्ण पड़ाव है जहां से घुमंतु प्रवृति को छोड़कर वह एक स्थान पर रहने लगा और कृषि कार्य करने लगा था।
उत्खनन में यहां से एक ऐसे भवन का अवशेष मिला था जिसमें आधुनिक शैली का स्नान घर व शौचालय बना था। यहां से भारी मात्रा में केस सज्जा, सुरमा लगाने वाले एंटीमनी राड, मनके व हार जैसे सामान मिले हैं। यह उस समय के श्रेष्ठ नगरीय जीवन व व्यवस्था की ओर संकेत करता है।
इस मामले में इस स्थल का महत्व हड़प्पा और मोहनजोदड़ो जैसा हो जाता है। स्थल से कुछ ही मीटर की दूरी पर नदी किनारे मिला प्राचीन प्लेटफार्म बताता है कि यह स्थान महत्वपूर्ण व्यापारिक केन्द्र भी रहा होगा।
वहीं गंगा-सरयू से निकलने वाले प्राचीन खनुआ नाले यहां के जल प्रबंधन की श्रेष्ठता को उजागर करता है। खनुआ नाला यानी खोन कर मानव द्वारा बनाया गया नाला। मौर्य कालीन इन नालों का जीर्णोद्धार अकबर के समय राजा टोडरमल ने कराया था। 19वीं शताब्दी के अंतिम दशक में प्रकाशित सारण गजेटियर में भी इन प्राचीन नालों का जिक्र मिलता है।
विश्व के प्रमुख पुरातात्विक स्थलों में से एक चिरांद के बारे में विदेश के पुरातत्वविद भी दिलचस्पी रखते हैं। वर्ष 2009 में ब्रिटेन के पुरातत्वविद डा. मैन्डयू चिरांद के पुरातात्विक स्थल देखने पहुंचे थे। यहां आगे खुदाई होने पर और अवशेष निकलने की संभावना है। यह स्थल नालंदा और बोधगया की तरह पूरी दुनियां में बिहार के नाम में चार चांद लगाएगा।
सारण-प्रमंडल के मुख्यालय छपरा से मात्र 12 किमी. दक्षिण-पूर्व में गंगा-सरयू और सोन के पवित्र संगम पर स्थित है ऐतिहासिक नगरी चिरांद। अब चिरांद एक छोटा-सा गांव है जो गंगा और सरयू मिलन स्थल यानी उनकी गोद में ऊंचे भिंड (टिले)पर बसा है। इससे थोड़ी दूरी पर ही पूरब में सोन नद की धारा आकर मिलती है। यहां से कुछ कि.मी. की दूरी पर ही गंडक नदी बहती है, जो आगे जाकर हरिहर क्षेत्र यानी सोनपुर के पास गंगा में जाकर मिलती है।
चिरांद के भिंड (टिले) के महत्व की जानकारी विद्वानों को सन् 1885 के आसपास ही हो गई थी। कारलाइल और नंदलाल डे जैसे विद्वान् इस स्थल का निरीक्षण कर चुके थे। इस संबन्ध में यहां खुदाई कराने वाले डा. बीएस वर्मा अपनी रिपोर्ट में लिखते हैं कि भारत के इतिहास और पुरातत्व पर गहन कार्य करने वाले ब्रिटिश अधिकारी हंटर ने पहली बार 1871 में चिरांद का संज्ञान लिया था। चिरांद के भिंड यानी टिले पर स्थित एक मस्जिद के होने का विशेष रूप से उल्लेख भी किया था। उन्होंने अपनी डायरी में लिखा था कि ऐसा अनुमान है कि इस मस्जिद को बंगाल के सुल्तान अबुल मुजफ्फर हुसैन शाह ने सन् 1508 में बनवाया था। कारलाइल ने ऐसी संभावना व्यक्त की थी कि भिंड के नीचे किसी प्राचीन नगर के अवशेष दबे हुए हो सकते हैं, जिनकी खुदाई से इस स्थान की प्राचीन सभ्यता पर प्रकाश पड़ सकता है। लेकिन उस समय बात केवल संभावनाओं तक ही सीमित रह गई।
इसमें संदेह नहीं कि चिरांद प्राचीन काल में भी एक अति महत्वपूर्ण स्थान था और हाल तक छपरा को चिरांद-छपरा कहकर पुकारते थे। इस्ट इंडिया कंपनी के दस्तावेज में छपरा शहर को चिरांद परगना का एक भाग बताया गया है।
वस्तुतः चिरांद में उत्खनन-कार्य विधिवत रूप से सन् 1954 के बाद ही प्रारंभ हो सका। छपरा शहर के कुछ संभ्रांत बुद्धिजीवियों ने छपरा आर्केलाजिकल सोसायटी के नाम से सन् 1954 में एक संस्था की स्थापना की और पटना कालेज के प्राध्यापक डा. अल्टेकर को चिरांद आने का आमंत्रण दिया। 14 जुलाई सन् 1954 को डा. अल्टेकर चिरांद आये और भिंड का गहन निरीक्षण किया। उन्होंने अनुमान लगाया कि चिरांद का भिंड कम-से-कम 2600 साल पुराना हो सकता है अर्थात् इसका काल 600 ई. पूर्व होना चाहिए। उन्होंने कहा था-कि यदि इस स्थल पर खुदाई की गयी तो बिहार के प्राचीन इतिहास में निश्चित तौर पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय जुड़ेगा, मोहनजोदाड़ो और हडप्पा की तरह।
इस भिंड के ऊपर स्थित मस्जिद को भी उन्होंने एक पुरातत्वविद की नजर से देखा। वहां की भूमि में थोड़ी ही दूर नीचे राख की मोटी परत देखकर उन्होंने कहा कि इस स्थान पर पहले जो भी निर्माण था उसे जला डाला गया और उसी के ऊपर इस मस्जिद का निर्माण कराया गया। मस्जिद में लगे कुछ स्तंभों के विषय में उन्होंने कहा कि उन स्तंभों को देखने से लगता है कि वे किसी मंदिर में लगे स्तंभ होंगे। मंदिर को ध्वस्त करने के बाद इन स्तंभों का उपयोग मस्जिद के निर्माण में किया गया मालूम होता है।
इस दिशा में बात कुछ आगे बढ़ती इसके पूर्व ही स्थानीय मुसलिम समुदाय के बीच यह अफवाह फैला दी गई कि भिंड की खुदाई के सिलसिले में मस्जिद को तोड़ दिया जायेगा। मराठी होने के कारण कुछ लोगों ने उनका नाम आरएसएस से जोड़ दिया। इस संवेदनशील मुद्दे पर डा. अल्टेकर ने मौन धारण कर लिया और खुदाई का कार्य आने वाले कुछ वर्षों के लिए स्थगित हो गया। लेकिन, उन्होंने मन ही मन संकल्प ले लिया था कि यहां खुदाई तो होकर रहेगी।

पुरातत्व की दृष्टि से अति महत्वपूर्ण इस स्थल की खुदाई के लिए सर्वप्रथम जून 1960 में पुरातत्व निदेशालय की एक टीम ने इस स्थान का निरीक्षण किया। इसकी अनुशंसा पर बिहार सरकार के पुरातत्व निदेशालय की पहल पर डा. बी.एस. वर्मा के नेतृत्व में सन् 1962-63 में उत्खनन का कार्य विधिवत आरंभ हुआ। उत्खनन का कार्य कुछ-कुछ अंतराल पर 5 सत्रों में संपन्न हुआ और दुनिया को एक नये चिरांद के दर्शन हुए।
उत्खनन की उपलब्धियां
चिरांद में उत्खनन कार्य 1962-63 के सत्र में ही आरंभ हो गया था लेकिन उत्खनन के इतिहास में 1969-70 के सत्र में यहां की गई खुदाई सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है। इसी सत्र में चिरांद की भूमि पर पूर्ण विकसित नवपाषाणकालीन अवशेष प्राप्त हुए। जिसके कारण चिरांद रातो-रात पुरातत्व के क्षेत्र में दुनिया के मानचित्र पर स्थापित हो गया। इस महत्वपूर्ण उपलब्धि से चिरांद दुनिया का अति महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल बन गया। यहां नवपाषाणकालीन अवशेषों की प्राप्ति ने दुनिया के पुरातत्ववेत्ताओं की इस धारणा को गलत साबित कर दिया कि नवपाषाणकालीन सभ्यता केवल पर्वतीय क्षेत्रों में ही मिलती है, जहां भोजन, पानी के साथ-साथ पत्थर के औजार बनाने के लिये कच्चा माल उपलब्ध हो। अब चूंकि चिरांद में नवपाषाणकालीन सभ्यता के प्रमाण मिल गए इसलिए विद्वानों को मानना पड़ा कि नवपाषाणकालीन सभ्यता मैदानी क्षेत्रों में भी मिल सकती हैं।
चिरांद में हुई खुदाई से प्राप्त उपलब्धियों से पुरातत्वविदों का उत्साह बढ़ा। मैदानी इलाकों में इस तरह के स्थल अन्य क्षेत्रों में भी होने की संभावना दिखी। इसी उम्मीद से बिहार में सासाराम के सेनुआर, हाजीपुर के चेचर और बोधगया के ताराडीह में नवपाषाण युग की सभ्यता के होने के प्रमाणों की तलाश शुरू हो गई। उन स्थलों पर सफलता भी मिली थी। चिरांद एक समृद्ध केंद्र था जिसकी समृद्धि में सारण जिले के गांवों की भी भूमिका रही होगी। इस प्रकार चिरांद के साथ-साथ सारण के विभिन्न गांवों में भी विरासत के प्रमाण मिलने की संभावना है।
उत्खनन में एक ऐसे भवन के अवशेष प्राप्त हुए हैं जिसमें आधुनिक शैली के स्नानघर और शौचालय बने हुए हैं। केश-सज्जा और अन्य प्रसाधन सामग्रियां जैसे आंखों में लगाने वाले एंटीमनी राड, बाल के जूड़े में लगाने वाले हाथी दांत के हेयरपीन, गले में पहने जाने वाले हार, हाथी दांत से बनी अन्य सामग्रियां, मनके, मोहरें, मूर्तियां, सोने के सिक्के आदि उपलब्ध हुए हैं, जिनमें कुछ तो खंडित हैं, लेकिन अधिकांश अखंडित हैं।
चिरांद उत्खनन के प्रभारी डा. बी.एस. वर्मा इस बात को सहर्ष स्वीकार करते थे कि यह उनका सौभाग्य ही था जिसके कारण बहुत कम खुदाई करने के बाद ही उन्हें बहुत बड़ी उपलब्धि हासिल हो गई। सामान्यतः लोग कहीं-कहीं खुदाई में सारी जिन्दगी लगा देते हैं, फिर भी वांछित सफलता प्राप्त नहीं होती। दुनियाभर के विद्वानों ने डा. वर्मा की अभूतपूर्व सफलता पर हर्ष व्यक्त किया था।
सन् 1967 में डा. बी.पी. सिन्हा ने आस्ट्रेलिया के एडिलेड में चिरांद उत्खनन से संबंधित एक रिपोर्ट पढ़ी थी। दुनिया भर के पुरातत्व विज्ञानियों ने उस रिपोर्ट को सुना। आइलसीन नाम के एक विद्वान ने कहा था- चिरांद भारत में नवपाषाण सभ्यता और संस्कृति का उदीयमान सूर्य हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के डा. आर.एन. बनर्जी ने चिरांद उत्खनन के प्रभारी डा. बी.एस. वर्मा की प्रशंसा करते हुए कहा था कि तुमने एक नए संसार की खोज कर दी है। उसी प्रकार भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पूर्व निदशक डा. बी.बी. लाल ने डा. बी.एस. वर्मा के भाग्य की सराहना करते हुए कहा था कि तुम बहुत भाग्यशाली हो कि इतनी बड़ी मात्रा में अखंडित पुरावशेषों और हड़्ड़ी के निर्मित औजारों को निकालने में सफल रहे।
किसी भी सभ्यता के विकास में वहां की नदियों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। नदियों के कारण ही आदि मानव अपनी घुमंतु-प्रवृत्ति छोड़कर एक स्थान पर स्थायी रूप से रहने लगा। जिन नदियों में सालोभर पानी उपलब्ध होता था उनके आसपास लोग स्थायी रूप से रहने लगे थे।
चिरांद की यह विशेषता रही है कि यह चार ऐसी नदियों की गोद में बसा है जिनमें सालोभर पानी रहता है। इसी के फलस्वरूप चिरांद के आसपास के क्षेत्रों में लोग स्थायी रूप से रहने लगे। जब वे स्थायी रूप से रहने लगे तो जीवनयापन के लिए खेतीबारी और व्यवसाय से भी जुड़े। यहां खेतीबारी इसलिए भी महत्वपूर्ण हो गयी क्योंकि यह क्षेत्र गंगा के मैदान का एक भाग है जहां उपजाऊं केवाल मिट्टी उपलब्ध है।
खुदाई से प्राप्त अवशेषों को देखने से पता चलता है कि नवपाषाण युग में यहां के लोगों को उन्नत कृषि की जानकारी थी। वे जौ, गेहूं, चावल, तीसी, सफेद मटर आदि पैदा करते थे। आज उन्नत बीजों के संरक्षण के लिए अनेक वैज्ञानिक तरीके अपनाए जा रहे हैं फिर भी शत-प्रतिशत सफलता नहीं मिल पा रही है। नवपाषाण युग के अन्न के कुछ ऐसे दाने भी यहां प्राप्त हुए हैं जो काफी लंबे अरसे से संरक्षित प्रतीत होते हैं। अतः दावे के साथ कहा जा सकता है कि नवपाषाण युग में यहां के वासियों को अन्न के उत्पादन, भंडारण और संरक्षण की उन्नत विधियों का ज्ञान था। इसके साथ ही यहां हुए अंतिम उत्खनन में हवन कुंड भी मिले है। इस प्रकार इस स्थल को भारत की ऋषि और कृषि संस्कृति का समृद्ध केंद्र माना जाता है।

चूंकि उन्नत कृषि की पर्याप्त संभावनाएं यहां थीं, इसीलिए वाणिज्य के विकास की संभावनाएं भी थीं। जल मार्ग से व्यापार करना अपेक्षाकृत सुगम और कम खर्चीला होता है। स्पष्ट है कि इन चारों नदियों के रास्ते यहां का वाणिज्य काफी फूला-फला। अच्छा भोजन और अच्छी आय अगर उपलब्ध हो तो अच्छे आवास की आवश्यकता सहज ही में महसूस की जाती है। यहां खुदाई से इस बात को बल मिलता है कि नवपाषाण युग में यहां स्थापत्यकला भी काफी विकसित अवस्था में थी।
सन् 1962-63 से 1970-71 तक लगभग 5 सत्रों में खुदाई कराने का श्रेय मुख्य रूप से डा. बी.एस. वर्मा को है जिन्होंने लगभग 10 वर्षों तक जी-जान से इस ऐतिहासिक कार्य को संपन्न कराया। खुदाई से पूर्व का एक छोटा-सा गांव खुदाई के बाद पुरातत्व के इतिहास में अतिविशिष्ट बन गया। इस कार्य से डा. वर्मा खुद तो अमर हो ही गये साथ ही साथ उन्होंने चिरांद की इस भूमि को भी इतिहास के पन्नों पर अमिट रूप से अंकित करा दिया है।
डा. वर्मा ने लंबा समय चिरांद में व्यतीत किया। इसीलिए वे चिरांद की भूमि और चिरांद के लोगों के साथ भावनात्मक रूप से जुड़ गए। वर्ष 2010 में सारण सामाहरणालय के सभागार में ‘चिरांद विकास परिषद’ ने एक सेमिनार का आयोजन कराया था। सेमिनार को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था कि उत्खनन के समय जो लोग बच्चे थे, आज बूढ़े हो गये हैं और अब उनको उनके पिता के नाम से पहचान रहा हूं। उन्होंने बड़े भावुक अन्दाज में बताया था कि जब वे इंग्लैंड में एक सम्मेलन में भाग लेने गये थे तो दुनियाभर के वैज्ञानिक चिरांद के विषय में जानने के लिए अत्यंत उत्सुक थे। चिरांद के विषय में वे अधिक से अधिक जानना चाहते थे लेकिन अफसोस की बात है कि खुद चिरांद के लोग चिरांद के विषय में जानने के लिए उत्सुक नहीं हैं।
सन् 1975 में आयी भीषण बाढ़ ने भी इस अभियान को बुरी तरह प्रभावित किया। बाढ़ के कारण चिरांद उत्खनन से प्राप्त बहुत सारी बहुमूल्य वस्तुएं नष्ट हो गयीं और कुछ को यत्र-तत्र स्थानांतरित करना पड़ा। यही नहीं, उत्खनन से संबंधित बहुत सारे रिकार्ड भी बाढ़ में नष्ट हो गये थे। दुख की बात यह है कि उन बहुमूल्य दस्तावेजों को बचाने का भी कोई सार्थक प्रयास नहीं किया गया।
जब लोगों की ओर से दबाव बनाए जाने लगे। मामला कोर्ट तक पहुंचने की बात हुई तब बिहार सरकार ने डा. वर्मा से चिरांद की खुदाई से संबंधित एक रिपोर्ट तैयार करने का आग्रह किया। चूंकि खुदाई में प्राप्त बहुत सी चीजें नष्ट हो चुकी थीं और उनसे संबंधित दस्तावेज भी सहेज कर एक स्थान पर नहीं रखे गए थे। इसलिए उत्खनन से संबंधित रिपोर्ट तैयार करना आसान नहीं था।
डा. वर्मा ने इस स्थिति पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा था कि उत्खनन के समय से ही मैं अत्यंत भावनात्मक रूप से इस स्थल से जुड़ गया था। अतः लगभग 35 वर्षों बाद जब मुझ से वह रिपोर्ट तैयार करने के लिए कहा गया तब मैं तैयार हो गया। यह जानते हुए कि इससे संबंधित महत्वपूर्ण दस्तावेज नष्ट हो चुके हैं। मैंने अपनी स्मृति और व्यक्तिगत डायरी के आधार पर काम शुरू किया। बाद में कहीं-कहीं टुकड़ों में उपलब्ध रिपोर्ट भी मिलते गए। इस प्रकार लगभग पांच सौ पृष्ठों का चिरांद उत्खनन रिपोर्ट तैयार हो गया। अब यह एक सरकारी गजट है। अतः पुरातात्विक स्थल चिरांद से संबंधित तथ्यों की प्रामाणिकता पर कोई संदेह नहीं कर सकता।

चिरांद के उत्खनन के बाद उसके रिपोर्ट प्रकाशित नहीं होना एक बड़े षड्यंत्र या राजनीति की ओर संकेत करता है। चिरांद से न केवल पुरातत्व व इतिहास में स्थापित मान्यताएं बदल रही थीं बल्कि भारत की सांस्कृतिक यात्रा में रामायण और महाभारत कालीन कथाओं को भी एक प्रामाणिक आधार मिला है।
संयोग से अवकाश ग्रहण करने के बाद लगभग 45 वर्षों तक डा.बीएस वर्मा जीवित थे और पूर्णतः स्वस्थ थे। उनकी स्मरण शक्ति भी वृद्धावस्था तक अद्भुत थी। सारण क्षेत्र के मूल निवासी होने के कारण उनका इस स्थल से लगाव था। इसीलिए अवकाश ग्रहण करने के बाद भी कठिन परिश्रम करके उन्होंने इस कार्य को दक्षता के साथ पूर्ण किया था। यदि वह रिपोर्ट प्रकाशित नहीं होती तो हजारों वर्षों का भारत का इतिहास केवल लोक कथा बनकर रह जाती। रामायण की कथा का एक बहुत बड़ा पुरातात्विक आधार मिट जाता क्योंकि इस क्षेत्र का संबंध ऋषि श्रृंगी से है जिन्हांेने पुत्रेष्टि यज्ञ कराया था जिससे श्रीराम, भरत, लक्ष्मण एवं शत्रुघ्न का जन्म हुआ था। अपने गुरु विश्वामित्र के साथ नदी मार्ग से श्रीराम और लक्ष्मण के सिद्धाश्रम बक्सर और मिथिला जाने के क्रम में इस स्थल पर रात्रि विश्राम करने का वर्णन वाल्मीकि रामायण में है। विश्वमित्र ने राम को इस महानभूमि का इतिहास बताया था।
डा. वर्मा ने चिरांद और बिहार ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए वह कार्य किया जिसकी प्रशंसा शब्दों में नहीं की जा सकती। चिरांद में और कई टिले थे जो गंगा के कटाव के कारण समाप्त होते चले गए। उन टिलों से मूर्ति, वर्तन जैसे प्राचीन अवशेष मिलते थे। अब भी कुछ टिले बचे हुए हैं लेकिन चिरांद में उत्खनन कार्य लंबे समय से बंद है। इस क्षेत्र में लगभग प्रतिवर्ष बाढ़़ आ जाती है जिसमें चिरांद के भिंड का दक्षिणी भाग कट कर क्रमशः नदी के गर्भ में समाता जा रहा है। अगर समय रहते इस क्षेत्र की सुरक्षा का कोई ठोस एवं कारगर उपाय नहीं हो पाता है तो बहुमूल्य धरोहर को नदी में विलीन होने से कोई नहीं बचा सकता। चिरांद से दुनिया को अभी बहुत कुछ पाना है, इसलिए चिरांद की सुरक्षा सर्वोपरि है।
चिरांद प्रामाणिकता की अग्नि परीक्षा में तो पास होता रहा है लेकिन सर्वनाशी राजनीति और नैरेटिव युद्ध का शिकार भी होता रहा है। संभावनाओं के बावजूद इसकी उपेक्षा वास्तव में बिहार के हितों की उपेक्षा है। यहां लोक तो जागृत हो रहा है लेकिन तंत्र की जकड़न के कारण लोक की शक्ति शिथिल पड़ती जा रही है।
चिरांद को वैश्विक मानचित्र पर लाने के लिए चिरांद विकास परिषद पिछले 19 वर्षों से चिरांद चेतना महोत्सव का आयोजन करता आ रहा है। इसे गिलहरी प्रयास ही माना जा सकता है। बिहार सरकार ने यहां प्रतिवर्ष ‘चिरांद महोत्सव’ का आयोजन कराने का नीतिगत निर्णय लिया है। लेकिन, इस निर्णय के दस वर्ष बाद भी चिरांद में वह आयोजन अब तक नहीं हो सका। यह तंत्र की मानसिकता का परिचय है।