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बुद्धों का गयाजी

ऐतिहासिक प्रमाणों की उपेक्षा कर समाज में यह अवधारणा बना दिया गया है कि बोध गया गौतमबुद्ध का और गया

गया श्राद्ध : एक नहीं, तीन पितृपक्ष

आश्विन कृष्णपक्ष जिसे पितृपक्ष कहते है। इसी पितृपक्ष के अवसर पर गयाजी में श्राद्ध को लोग महत्वपूर्ण मानते हैं। लेकिन,

सर्वव्यापी गयाजी

इतिहास की आड़ में गयाजी के माथे पर सनातन और बौद्ध संघर्ष के कलंक का गढ़ा गया आख्यान प्रमाण की

गयातीर्थ का मनोविज्ञान

भारतीय चिंतन दर्शन में शरीर, मन, बुद्धि, प्राण और आत्म के अस्तित्व को अलग-अलग माना गया है। इन पांचों के

नैरेटिव भ्रमजाल में ‘गयाजी’

हिन्दू धर्म के अनुयायी मानते है कि बिहार का मगध पुण्य रहित क्षेत्र है लेकिन उसी भूभाग में स्थित गयाजी

प्रासंगिक है गयाजी की सामाजिक समरसता

गयाजी कई मामलों में अन्य तीर्थों से निराला हैं। मुसलमानों के आक्रमण के बाद हिंदू समाज में तेजी से विघटन

सांस्कृतिक एकात्मता के सूत्र गया-तीर्थ की वेदियां

गया तीर्थ की वेदियां भारत की सांस्कृतिक इतिहास की साक्षी हैं। इन वेदियों के आविर्भाव और इतिहास में अखंड भारत

गयाजी यानी भारत बोध की भूमि

              गयाजी की सांस्कृतिक यात्रा कब और कैसे शुरू हुई, गयाजी का महात्म्य क्या

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