चिरान्द संत, साधकों और तपस्वियों की भूमि रही है। यहां आदि काल से ही अनेक ऋषि-मुनियों का वास होता आया है। इसके कारण यहां प्राचीन काल से मंदिरों की बड़ी श्रृंखला रही है। मुगलकाल में मंदिरों के तोड़े जाने के बाद भक्तों ने अपनी-अपनी परंपरा के अनुकूल नये मंदिरों का निर्माण कराया था। अब वे मंदिर भी सैकड़ांे वर्ष पुराने हो गए है। इन मंदिरों का इतिहास गौरवशाली रहा है। अध्योध्या स्थित प्रसिद्ध लक्ष्मण किला मंदिर की गुरु गद्दी चिरांद में ही है।

पुरातात्विक स्थल चिरांद के ठीक दक्षिण-पश्चिम की ओर ऊंचाई पर स्थित राधे-कृष्ण का मंदिर है। अंदर जाने पर मंदिर के प्रांगण में एक चबुतरा बना है जिसपर भगवान के पांव के निशान हैं। आगे बरामदा है और ठीक सामने के कमरे में राधे-कृष्ण की मूर्ति स्थापित है। यह स्थान काफी शांत व स्वच्छ है। इस प्राचीन मंदिर का जीर्णोद्धार जैतपुर स्टेट के राजा ने करवाया था।
पुरातात्विक स्थल से पश्चिम लगभग डेढ़ सौ मीटर की दूरी पर एक मंदिर का भव्य गुंबद दिखता है। पश्चिम की ओर जाने पर उस मंदिर का भव्य और सुंदर द्वार दिखता है। इस मंदिर का द्वार काफी बड़ा है और उसके ऊपर हनुमानजी विराजमान है। अंदर प्रवेश करने पर दो हाथियों की आकृति दिखते है जो एक कलश को अपनी सूंढ़ से पकड़े हुए हैं। वहीं पर बायीं ओर राजा मौरध्वज की मूर्ति है। इस मूर्ति में राजा और रानी अपने पुत्र को आरे से चीर रहे हैं और बगल में एक शेर और ब्राहाम्ण है। ठीक सामने मंदिर में श्रीरामजानकी की मूर्ति है।


यह मंदिर सारण क्षेत्र में अयोध्या मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है। इस मंदिर की स्थापना 17वीं शताब्दी में हुई थी। मंदिर का संचालन अयोध्या नगरी के प्रसिद्ध लक्ष्मणकिला द्वारा होता है। अब प्रश्न उठता है कि यह मंदिर अयोध्या के एक बड़े मंदिर की गुरु गद्दी कैसे हुआ?
वस्तुतः अयोध्या के लक्ष्मण किला की स्थापना 18वीं शताब्दी में आचार्य युगलानन्य शरण जी महाराज ने की थी। वे स्वामी युगलप्रिया शरण ‘जीवाराम’ जी महाराज के शिष्य थे। चिरांद स्थित संगम स्थल पर ही जीवारामजी कठोर तपस्या में रत थे। वहीं उन्हें आध्यात्मिक अनुभव हुए और सिद्धियां मिली थी। अपने गुरु से दीक्षा लेने के बाद आचार्य युगलानन्य जी महाराज ने भी चिरांद में ही निवास कर साधना की। इसके बाद उन्हें प्रेरणा मिली कि वे अध्योध्या जायें और वहीं सरयू के तट पर तपस्या करें।

अंतर की प्रेरणा से सरयूजी के तट पर चलते हुए वे अध्योध्या पहुंच गए और सरयू के तट पर ही तप करने लगे। उनके तप और ज्ञान से प्रभावित होकर रीवा के महाराजा विश्वनाथ प्रताप सिंह और उनके पुत्र रघुराज प्रताप सिंह स्वामी श्रीयुगलानन्य शरण के भक्त बन गए। एक दिन महाराजा रीवा ने अपने गुरु श्रीयुगलानन्य शरणजी महाराज से प्रार्थना की कि उसी स्थान पर मंदिर और आश्रम का निर्माण करा दिया जाए। एकान्तिक साधना में रत रहने वाले स्वामी जी महाराज ने मंदिर निर्माण की उनकी प्रार्थना स्वीकार नहीं की। बाद में उनके राज्य के दीवान दीनबंधु पाण्डेय ने अपने विशेष आग्रह कर महाराजजी से इसकी अनुमति प्राप्त की। उनकी तपस्थली पर रीवा के दीवान दीनबंधु पाण्डेय द्वारा 1865-1868 ईस्वी के बीच भव्य मंदिर व आवासीय परिसर का निर्माण कराया गया। वह सरयू तट पर स्थित है और भगवान राम-सीता-हनुमान को समर्पित एक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक केंद्र है। वहां रसिक उपासना होती है और यह स्थान अपनी ऐतिहासिक व धार्मिक मान्यताओं के लिए प्रसिद्ध है।
मंदिर बनाने के उपरान्त दीनबन्धु पाण्डेय ने विराजमान सरकार के भोग राग के निमित्त अपनी जागीर से दो हजार बीघे की जमींदारी श्री लक्ष्मण किला को दान की। कुछ भौगोलिक परिवर्तनों के बावजूद रीवा जनपद में मनगवां के समीप रामपुर मौजे में आज भी ठाकुर जी की भूमि पर आश्रम के द्वारा कृषि-कार्य होता है।
इस प्रकार श्री लक्ष्मण किला के संस्थापक रसिकोपासना के महान आचार्य युगलानन्य शरण जी है। स्वामी जी महाराज का जन्म 1818 ई. में बिहार प्रांत के नालन्दा के पास स्थित ईसराम पुर (इस्लामपुर) ग्राम में हुआ। सारस्वत ब्राह्मण परिवार में जन्मे स्वामी जी का जीवन भगवदीय अलौकिकताओं से परिपूर्ण रहा। काशी में विद्याध्ययन के उपरान्त आपने श्री चित्रकूट धाम में निवास किया। आपने रसिकोपासना में तत्सुख सुखित्व के प्रवर्तक स्वामी श्री युगलप्रिया शरण जी महाराज ‘जीवाराम जी’ से उपासना की दीक्षा प्राप्त की। इस प्रकार चिरांद स्थित प्राचीन स्थान ही लक्ष्मणकिला की गुरु गद्दी हुई।

यहां के तपस्वी यह मानते हैं कि गंगा, सरयू और सोन के संगम पर ही श्रीराम और लक्ष्मण ने समर में विजय का प्रताप ग्रहण किया था। युगलानन्य जी महाराज के शिष्य पं॰ जानकीवर शरण जी महाराज से मिलकर स्वामी विवेकानन्द बहुत प्रभावित हुए थे। विवेकानंद के प्रमुख गुरुभाई लाटू महाराज का जन्म चिरांद के पास ही स्थित किसी टोले में हुआ था। पूर्व में यह मंदिर छोटा था। इसे विकसित करने और भव्य बनाने में संत शिरोमणी युगलकिशोर जी महाराज का विशेष योगदान रहा। उन्होने इस मंदिर के निर्माण के लिए अथक प्रयास किया। वर्तमान महंत स्वामी मैथलीरमण शरणजी महाराज के संरक्षण व मार्गदर्शन में यह मंदिर आध्यात्मिक पुनर्जारण का केंद्र बन रहा है। इस मंदिर का इतिहास कम से कम आठ सौ वर्षों की परंपरा का इतिहास है। मुगलकाल में भी यहां अनाम संतों ने तप किया था। उनकी कथाएं लोक में आज भी व्याप्त है। वैसे यह मठ रामानंद संप्रदाय का है।
इस मंदिर के ठीक पीछे एक मठ है जो बंगाली बाबा का मठ नाम से प्रसिद्ध है। आज बंगाली बाबा का मठ सारण ही नहीं, पूरे बिहार में प्रसिद्ध है। यहीं बंगाली बाबा घाट पर ज्येष्ठ पूर्णिमा को चिरांद विकास परिषद् द्वारा गंगा महाआरती का आयोजन कराया जाता था।
बंगाली बाबा मठ के बारे में श्रुति आधारित बातें यह है कि यह मठ स्थाणु भगवान शिव की तपोभूमि है। यहां मुखकृतियुक्त शिवलिंग स्थापित हैं। बहुत पहले लखी बाबा नामक संत यहां आए। प्राचीन शिवलिंग के समक्ष पूजा करते-करते ध्यानस्थ हो जाते थे। कई दिनों तक एक ही आसन से बैठे रह जाते थे।

भगवद्भक्ति में उन्हें कुछ होश नहीं रहता था। जब ध्यान टूटता था तब भोजन के लिए वे भिक्षाटन करते थे। भिक्षाटन का उनका तरीका भी अजीब था। वे मात्र तीन घर ही भिक्षा के लिए जाते थे। यदि तीनों जगह निराशा हाथ लगी तो वे चौथे घर कभी नहीं गए। उपवास ही सो जाते थे। गर्मी के दिनों में भगवान की तस्वीर को पंखा झेला करते थे। वे सदैव इस बात की कोशिश करते कि उनके प्रभु को कोई कष्ट न हो। कालांतर में उन्होंने देह त्याग दिया लेकिन उनकी तपस्या का फल आज सबके सामने है। उनके देहावसान के बाद रामकृष्ण दास ने काफी दिनों तक मंदिर में अपनी सेवा दी। तब चिरांद निवासी शीतल पांडेय व्यवसाय के सिलसिले में बंगाल रहते थे। वहां उनका परिचय एक युवक से था, जिसे वे अपने साथ चिरांद लाए और वह युवक मंदिर में रहकर भगवान की सेवा करने लगा। धीरे-धीरे युवक की ख्याति फैलने लगी और वे बंगाली बाबा के नाम से जाने जाने लगे। 1973 में रसलपुरा के रामजन्म सिंह ने सबसे पहले इस घाट पर सीढ़ी का निर्माण करवाया, जो बंगाली बाबा घाट के नाम से जाना जाता है। लेकिन, यह सीढ़ी 1973 में ही आयी बाढ़ में बह गयी। जिसके बाद बंगाली बाबा के शिष्यों ने यहां घाट का निर्माण कराया। अब यह स्थल काफी प्रसिद्ध हो गया है।
पुरातात्विक स्थल चिरांद के उत्तर दिशा में एक टीला है जिसके नीचे राख की मोटी परत है जो दिखाई भी पड़ती है। यही एक मस्जिद का निर्माण कराया गया है। बताया जाता है कि बंगाल के नवाब ने एक मंदिर के मलवे से इस मस्जिद का निर्माण कराया था। इसके प्रत्यक्ष प्रमाण भी हैं। मस्जिद निर्माण में जिन स्तंभों को उपयोग किया गया है उस पर हिंदु या बौद्ध मंदिरों के चिह्न स्पष्ट दिखते हैं। कमल पुष्प्प जैसी आकृतियां आज भी देखी जा सकती हैं।
चिरांद में कबीर साहब का भी आगमन हुआ था। यहां बहुत बड़ा कबीर मठ भी है। चिरांद के पश्चिम माझी और पूरब में सोनपुर तक सरयू और गंगा के किनारे आठ सौ से अधिक छोटे-बड़े मठ और मंदिर हैं। कुछ तो हजार वर्ष पुराने बताए जाते हैं। संरक्षण व देखरेख के अभाव में वे नष्ट हो रहे हैं। पूर्व मेे ये मंदिर और मठ सांस्कृतिक, आध्यात्मिक व सामाजिक गतिविधियों के बड़े केंद्र थे। बड़े मठों पर भू-माफियाओं की नजर है। मठ के महंतों को मिलाकर मठ की जमीन पर कब्जा करने के खेल के कारण इस क्षेत्र की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक गतिविधि को भारी क्षति पहुंची है।
