सामान्यतः लोग यही मानते ही कि भारत में तीन नदियों का संगम उतर प्रदेश के प्रयागराज में है जहां विशाल रेत के मैदान पर विश्व प्रसिद्ध कुम्भ मेले का आयोजन होता है। बिहार में भी तीन पवित्र नदियों का संगम है जहां प्रकृति के सान्निध्य में अद्भुत आनंद का वातावरण होता है।

प्रयागराज में गंगा, यमुना और सरस्वती इन तीन नदियों का संगम है। इन तीनों में गंगा और यमुना की धारा तो प्रत्यक्ष है। लेकिन, सरस्वती की धारा गुप्त हो गयी है, जबकि बिहार के छपरा शहर से पूरब चिरांद नामक स्थान पर गंगा, सरयू और सोन नदियों की प्रत्यक्ष धाराएं उमड़-घुमड़ कर संगम का निर्माण करती हैं। यह स्थान प्रयागराज जैसा ही प्राचीन रहा है। इसीलिए इस स्थान पर नवपाषाण युग से ही समृद्ध सभ्यता के अवशेष मिले हैं।
इसके साथ ही इन तीनों नदियों के संगम के कारण विशाल रेत का मैदान भी बना है। बीच-बीच मंे टापू जैसे स्थान हरे-भरे हैं जहां हिरण को कुलाचें मारते देखा जा सकता है। इस अद्भुत व मनोरम स्थान पर प्रचीन काल से संत-ऋषियों की कुटी व आश्रम रहे हैं। इस स्थान पर गोस्वामी तुलसीदास भी कभी पधारे थे। भगवान श्रीराम व लक्ष्मण जी के पुरुषार्थ का वर्णन करते हुए उन्होंने यहां की भौगोलिक व प्राकृतिक दृश्यों का जो भाव चित्र अपने अमर सतग्रंथ रामचरित मानस के बाल कांड में प्रस्तुत किया है उससे इस पुण्यभूमि की महिमा उजागर होती है। गोस्वामी जी ने रामचरितमानस के बाल कांड में लिखा है-
राम भगति सुर सरित ही जाई, मिली सुकीरति सरजू सुहाई।

सानुज राम समर जसु पावन, मिलेउ महानदु सोन सुहावन।
जुग बीच भगति देव धुनिधारा सोहत सहित सुविरति विचार, त्रिविध ताप त्रासक तिमुहानी।

मानस की इन पंक्तियों को कोई आंख बंदकर सुने, तो इस स्थल की सुरम्यता एवं इस भूमि के महत्व का सहज अहसास हो जाएगा। तत्काल उस स्थान के लिए चल पड़ने की मनःस्थिति बन सकती है। चिरांद स्थित गंगा तट पर खड़ा होकर देखते ही उस स्थल की मनोरमता का बोध होने लगता है। मन करने लगता है कि गंगा की धारा के साथ चलते हुए सरयू और सोन नदियों से निर्मित उस प्राकृतिक स्थल तक पहुंच जाएं।
चिरांद स्थित पुरातात्विक स्थल व मठों से पश्चिम में थोड़ी दूरी पर गंगा व सरयू की धाराएं मिलती हैं। वहीं थोड़ा और आगे पूरब दिशा में दक्षिण से आ रहे सोननद की धारा गंगा-सरयू से मिलती हैं। दिन के उजाले में इन धाराओं को मिलते देख अद्भुत आनंद की अनुभूति होती है। तीन रंगांे के जल आपस में उमड़-घुमड़ कर मिलते है। यह स्थान सहज ही आकर्षित करता है।
प्राचीन काल में यह स्थल पर्यटन के साथ ही एक सांस्कृतिक व धार्मिक केन्द्र के रूप में प्रतिष्ठा थी, लेकिन कालक्रम में यह केन्द्र हमारी आंखों से ओझल हो गया। ऋषि श्रृंगी से लेकर बुद्ध के शिष्य आनंद तक की कथाएं इस स्थल से जुड़ी हुई हैं। अयोध्या से महर्षि विश्वामित्र श्रीराम और लक्ष्मण को लेकर इसी रास्ते से बक्सर गए थे। वाल्मीकि रामायण में भी इस स्थल की सुरम्यता और दिव्यता का अद्भुत वर्णन मिलता है। यहां तीन पवित्र नदियों के संगम पर राम-लक्ष्मण और विश्वामित्र ऋषि के विश्राम करने का वर्णन रामायण में मिलता हैै।
इसके साथ ही यह स्थान सामाजिक-सांस्कृतिक केन्द्र के रूप में भी विकसित हो सकता है जहां से समाज के निचले पायदान पर खड़े बंधुओं को आगे बढ़ाने का कार्य चले। इस क्षेत्र के धार्मिक केन्द्रों व संत-महात्माओं के सहयोग से सेवा कार्य भी चलाये जा रहे हैं, ताकि भारत की सनातन परंपरा एक बार फिर इस संगम पर साकार हो उठे। अपने देश में नदियों के तटों पर ही अधिकतर तीर्थ स्थल हैं। भारत का सांस्कृतिक व धार्मिक जीवन प्रवाह नदियों के साथ चलता रहा है। हमारी नदियां आज संकट में है।
माता गंगा आज संकट में है। मां गंगा के तट पर ही इस चिरांद का उद्भव व विकास हुआ। चिरांद का मुख्य महोत्सव ज्येष्ठ पूर्णिमा को होने वाला चिरांद चेतना महोत्सव, गंगा महाआरती व गंगा बचाओ संकल्प समारोह है। यह आयोजन पिछले 19 वर्षों से निर्बाध रूप से जारी है। इस आयोजन के बहाने सारण के इस महत्वपूर्ण सांस्कृतिक व पुरातात्विक स्थल की चर्चा तो होती है। इससे इस स्थल के विकास के लिए चल रहे प्रयास को शक्ति मिली है। लेकिन, इससे होने वाले जनजागरण का सुपरिणाम तभी संभव है जब कुछ स्थायी काम हो।
ऐसे तीर्थ स्थल जन समूह को सहज ही आकर्षित करते हैं क्योंकि वहां वे अपने पूर्वजों की कीर्ति देख रोमांच व हर्ष का अनुभव करते हैं। ऐसे स्थान मानव को संकट से उबरने, फिर से उठ खड़े होने व इतिहास रचने की प्रेरणा देते हैं। गंगा-सरयू व सोन के संगम पर स्थित पुरातात्विक व ऐतिहासिक स्थल चिरांद भी एक ऐसा ही परम तीर्थ है जो धीरे-धीरे जागृत हो रहा है।

यह विश्व के दुर्लभ पुरातात्विक स्थलों में से एक है क्योंकि इसने इतिहास की स्थापित मान्यताओं को बदला है। ऐसे महत्वपूर्ण स्थल को एक प्रसिद्ध सांस्कृतिक केन्द्र के रूप में प्रतिष्ठित होना चाहिए था। परंतु पुरातात्विक, ऐतिहासिक व धार्मिक दृष्टिकोण से अतिमहत्वपूर्ण यह स्थल हाल तक गुमनाम रहा।
वहीं सनातन परंपरा को मानने वाले कहते हैं कि तीन पवित्र नदियों के संगम पर बसे होने के कारण चिरांद तीर्थराज प्रयाग की तरह ही श्रेष्ठ तीर्थ स्थल है। नदियों के संगम पर सत्संग व शास्त्रार्थ की प्राचीन परंपरा रही है। अतः चिरांद में भी कुम्भ जैसा आयोजन किया जाना चाहिए। यहां के लोक में यह विश्वास है कि इस त्रिवेणी मंे स्नान करने वालों की अकाल मृत्यु नहीं होती है। इसके साथ ही श्रीकृष्ण की कृपा से उसे धन यश का भी लाभ होता है। प्राचीन काल से यहां एक जीयछ कंुड था जिसमें संतानहीन महिलाओं के स्नान करने पर संतान की प्राप्ति होती थी।
बहुत पहले यहां कार्तिक मास में कल्पवास की परंपरा थी जिसके विधि व संकल्प का वर्णन चिरांद महात्म्य नामक एक प्राचीन गंथ में है। यहां के ब्राह्मण उस ग्रंथ को संभाल कर नहीं रख सके इसके कारण उसकी प्रसिद्धि नहीं है। वह ग्रंथ सहजता से उपलब्ध भी नहीं है। पर काशी व हरिद्वार जैसे तीर्थ स्थलों की तरह पूर्णिमा, अमावश्या, गंगा दशहरा जैसे अवसरों पर पर गंगा पूजन व स्नान करने वालों की भारी भीड़ लगती है।
इन सबके अलावा चिरांद मंे उपलब्ध जल प्रबंधन के प्राचीन संरचनाएं व उपक्रम वर्तमान विश्व को जल संकट से उबरने का संदेश देने में समर्थ है। गंगा तटीय क्षेत्रों में भी शुद्ध पेयजल व सिंचाई के लिए जल का अभाव है। तीन नदियों के संगम पर बसा चिरांद परगना व उसके आसपास के क्षेत्रों में मानव निर्मित प्राचीन खनुआ नाले प्राचीन काल में श्रेष्ठ जल प्रबंधन के अद्भुत मॉडल थे।
सोन को नद कहा गया है। सोन नद की तीव्र धारा के प्रभाव के कारण इस क्षेत्र में गंगा व सरयू जी का धारा ठिठक जाती हैं। जब गंगा और सरयू की धारा सावन-भादो में यहां ठिठकती हैं तब वहां अद्भुत दृश्य होता है। दूर-दूर से लोग उफनते जल राशि के दर्शन व पूजन करने आते हैं।
ऐसी लोक मान्यता है कि सावन मास के शुक्ल सप्तमी तिथि को गंगा और सोन नद के मिलन के उस मनोरम दृश्य को देखने नर्मदा आती है। इस तिथि को यहां बाढ़ के बीच नदी की धारा में पूजन करने वालों के कारण मेला जैसा दृश्य होता है। इन तीन नदियों की गोद में नाचते, घुमते नौकाओं को देख रोमांच पैदा होता है।
ऊपर तट को लांघने को बेताब गंगा-सरयू व सोन के जल को खनुआ नालों के माध्यम से सारण में दूर-दूर तक खेतों में पहुंचाने की प्राचीन व्यवस्था थी। बाढ़ का पानी जब इन नालों से खेतों में पहुंचता था तब गांव के लोग दीप जलाकर उनका स्वागत करते थे। कहते थे कि गंगाजी की कृपा से खूब फसल होगी। इस जल से सारण के सैकड़ों एकड़ में फैले चंवर अघा जाते थे। इसमें मछली पाली जाती थी। पक्षी कलरव करते थे।
वहीं कुआर के बाद जब खेतों में पानी की कमी होती थी तब चंवर का यह जल किसानों के काम आता था। चिरांद का वह खनुआ नाला और पुराने फाटक का प्रमाण आज भी है। लेकिन इन खनुआ नालें से होकर गंगा व सरयू के प्रसाद के रूप में मिलने वाला जल खेतों तक नहीं पहुंच रहा है क्योंकि अंध स्वार्थ में लोगों ने इन नालों पर अतिक्रमण कर घर बना लिया है। ऐसे प्राचीन उपक्रमों को फिर से पुराने रूप में लाने का प्रयास हो तो जीविकोपार्जन के साथ ही पर्यटन का विकास होगा। तीन नदियों का संगम होने के कारण यह क्षेत्र जैव विविधता की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
इस क्षेत्र की भौगोलिक संरचना भी अध्ययन व शोध की दृष्टि से अतिमहत्वपूर्ण है। इस प्रकार चिरांद जैव-भौगोलिक अध्ययन केन्द्र के रूप में भी विकसित हो सकता है। गंगा व नारायणी के संगम पर स्थित हरिहर क्षेत्र और सरयू के तट पर स्थित गौतम क्षेत्र के मध्य मंे स्थित चिरांद में वह सब कुछ उपलब्ध है जिसके सहारे इसे प्रमुख धार्मिक पर्यटन केन्द्र के रूप में विकसित किया जा सकता है। धार्मिक मान्यता है कि गंगा-सरयू व सोन के संगम के जल से अरेराज स्थित सोमेश्वर महादेव का अभिषेक किया जाए तो शनिदेव की कुदृष्टि से बचा जा सकता है। सैकड़ों वर्षों से लोग चिरांद से जल लेकर अरेराज जाते रहे हैं।
