यूं तो प्रशासनिक जीवन के लगभग 23 साल गुजर गए थे। इस क्रम में मैं बिहार के कई महत्वपूर्ण जिलों में अपनी सेवाएं दे चुका था। परंतु, सारण जिले में मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार की विकास यात्रा के क्रम में एक प्रशासनिक अधिकारी के रूप में चिरांद से रू-ब-रू होने का गौरव प्राप्त हुआ। मैं मुख्यमंत्री जी के भ्रमण के पूर्व जब स्थलीय निरीक्षण कर रहा था तब चिरांद ग्राम के ऊर्जावान युवक, प्रौढ़, स्वयंसेवी संस्थाओं के संचालक सहित समाचार पत्रों के कई वरिष्ठ पत्रकारों के साथ वार्ता करने का मौका मिला। चिरांद में डा. बी.एस. वर्मा द्वारा किया गया पुरातात्विक खुदाई का अवशेष उत्खनन स्थल पर मौजूद है परंतु वास्तव में खुदाई के दौरान जो सामग्री प्राप्त हुई, उसके रख-रखाव की व्यवस्था मैंने पूरे चिरांद में नहीं देखी।
गंगा की तलहटी में भ्रमण के दौरान श्री कृष्णकांत ओझा, ब्यूरोचीफ दैनिक जागरण द्वारा किनारे पर भिंड के रूप में खड़े अवशेषों को हाथ की अंगुलियों से हल्का दबाव बनाकर खोदने का प्रयास किया गया जिसमें कई विचित्र सामग्रियॉं प्राप्त हुईं। जिनका हमारी पूरी टीम ने अवलोकन किया। उन्हें देखकर हम सब काफी उत्साहित हुए। हमारे साथ चल रहे टोली से चर्चा करने पर एक तथ्य उभरकर आया कि स्थानीय स्तर पर इस चिरांद के महागौरवपूर्ण इतिहास को कुरेदने के लिए केवल एक मि. वर्मा की आवश्यकता नहीं है, बल्कि इसमें कई हाथों की आवश्यकता प्रतीत होती है।
मुख्यमंत्री जी का दिनांक 12 फरवरी 2010 को वहां भ्रमण हुआ था। चिरांद के विकास के लिए कार्य करने वाली संस्था चिरांद विकास परिषद द्वारा उत्खनन के दौरान पायी गयी सामग्रियों की चित्र माला बनाकर मुख्यमंत्री जी को दिखाने एवं समझाने का प्रयास किया गया। इसके बाद वे गंगा किनारें तलहटियों में भ्रमण के लिए चल दिए थे। उनके पीछे-पीछे मुख्यसचिव, कलासंस्कृति विभाग के प्रधान सचिव, जिलाधिकारी, एसपी सहित पूरा प्रशासनिक महकमा था। उपविकास आयुक्त होने के कारण मुझे स्थल की जानकारी देते रहने की जिम्मेदारी दी गयी थी।
मैं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के चेहरे पर उठ रहे भाव को समझ रहा था। अपने भ्रमण के दौरान वे चकित रह गए तथा इसकी विकास की संभावनाओं को तलाशने के लिए जिला प्रशासन सहित पुरातात्विक विभाग एवं बिहार सरकार के पर्यटन एवं कला संस्कृति विभाग को कई निर्देश दिए। यद्यपि इन निर्देशों पर सरकारी स्तर से पहल आरंभ किया गया था लेकिन उसे गति देने में कई कठिनाइयां महसूस की जा रही थी। उन कठिनाइयों का समाधान शायद अब भी नहीं हो सका है। उनमें प्रागैतिहासिक पार्क के निर्माण के लिए स्थल के पास पर्याप्त जमीन उपलब्ध नहीं होना, उत्खनित सामग्रियों को रखने के लिए उच्च कोटि के म्यूजियम का अभाव, चिरांद से संबंधित शोध पत्रों का अभाव, भौगोलिक सीमाओं का स्पष्ट निर्धारण नहीं होना और चिरांद के विकास के लिए समर्पित सरकारी नुमाइंदगी का अभाव होना।

चिरांद विकास परिषद वर्णित कमियों को दूर करने में अपनी सार्थक भूमिका निभा सकती है बशर्तें कि इसे उचित प्लेटफार्म एवं सरकारी एवं गैर सरकारी स्तर से इसे सहयोग प्राप्त हो। वस्तुतः चिरांद के विकास के लिए सर्वप्रथम इस पर व्यापक शोध की आवश्यकता है, जिसके लिए इसका निरंतर प्रचार-प्रसार कराना ही होगा।
शोधार्थियों द्वारा इसकी भौगोलिक सीमा आंककर विस्तृत शोध किए जाएं तो कई आश्चर्यजनक चीजें प्रकाश में आ सकती हैं। चिरांद की धरती के गर्भ में छुपे हुए कई पौराणिक अवशेषों के उपर आसपास में कई गांव बस चुके हैं, तथा गंगा का कटाव भी जारी है। खाली स्थानों को चिन्हित कर इसमें बसावट का विस्तार रोकने का प्रयास अति आवश्यक है तथा गंगा का कटाव नहीं हो, इसके लिए संभव निरोधात्मक कार्रवाई की आवश्यकता है। यद्यपि बिहार सरकार द्वारा संगम पर पुल बनाकर आरा-छपरा को जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। परंतु इन्हीं तलहटियों में छुपी हुई चिरांद की पुरातात्विक गहराई एवं पौराणिक गौरवमयी सभ्यता के परिचायक चिरांद को राष्ट्रीय एवं वैश्विक स्तर पर लाने के प्रयास में अभी बहुत कमी है। चिरांद विकास परिषद के ऊर्जावान सदस्यों से अपेक्षा है कि क्रमवार अपने प्रयासों को जीवंत करें इसके लिए देश के बड़े विश्वविद्यालयों के पुरातात्विक शोधार्थियों सहित पर्यटन क्षेत्र के रूप में विकसित करने से संबंधित कार्य कर रहे निकायों से सम्पर्क कर अपनी विस्तृत कार्य योजना तैयार कर राज्य व देश की केन्द्र सरकारों के समक्ष रखने का प्रयास करे जिससे कि चिरांद का मान वैश्विक एवं राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित हो।
मेरा मानना है कि चिरांद जैसे स्थानों का विकास करना किसी सरकार के वश की बात नहीं है। ऐसे स्थान आम आदमी के लिए होते है। सरकार या कोई संस्था की भूमिका वहां संयोजक और व्यवस्थापक तक ही रहती है। जब आम आदमी किसी स्थान से जुड़ जाता है तब उसमें परिवर्तन लाने की क्षमता आने लगती है।
चिरांद विश्व के प्रमुख पुरातात्विक स्थलों मंे से एक है, इसके बावजूद इस स्थान में वह बात नहीं जो नालंदा, राजगीर, बोध गया जैसे स्थानों में है। इसका एक ही कारण हे कि उन स्थानों से एक बहुत बड़ा समुह भावनात्मक रूप से जुड़ा है। जहां तक मैने देखा-समझा है। इससे संबंधित प्राचीन ग्रंथों में सदर्भ उपलब्ध है। उससे प्रतीत होता है कि यह स्थान पूर्व में एक प्रमुख धार्मिक-सांस्कृतिक केंद्र रहा होगा। पुरातात्विक स्थल के विकास के साथ ही इसके धार्मिक महत्व को भी पुनर्स्थापित करना होगा।
अयोध्या में श्रीराम लला के जन्म स्थान पर भव्य मंदिर निर्माण और प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी द्वारा उसके उद्घाटन के बाद जो वातावरण तैयार हुए है उसमें चिरांद के प्रति लोगों में सहज जिज्ञासा होगा। लेकिन, यह तभी संभव है जब लोग इसके धामिक और सांस्कृतिक महत्व से अवगत होंगे। हां, इस स्थान पर मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराना होगा, नहीं तो काफी प्रयास के बाद भी लोग यहां आना नहीं चाहंगे। वैसे एकबार जब स्थिति अनुकूल हो जाती है तब वीरान स्थान भी आबाद हो जाता है। ऐसे स्थानों पर व्यवसाय की पूरी संभावना होती है जिससे विकास की यात्रा तेज हो जाती है।
मुझे उम्मीद है कि चिरांद विकास परिषद का संपूर्ण प्रयास एक दिन रंग लाएगा तथा इतिहास के गर्भ में खोया हुआ चिरांद अपनी पूरे जोश-खरोस के साथ विश्व के मानचित्र पर अपना स्थान बनाएगा।
(लेखक भारतीय प्रशासनिक सेवा से अवकाश प्राप्त अधिकारी है। सारण जिले के उपविकास आयुक्त के रूप में चिरांद को नजदीक से देखा हैं।)