By using this site, you agree to the Privacy Policy and Terms of Use.
Accept
Swatva Samachar
Notification
  • Home
  • देश-विदेश
  • राज्य
  • राजपाट
  • खेल-कूद
  • मनोरंजन
  • अपराध
  • अर्थ
  • अवसर
  • आप्रवासी मंच
    • बिहारी समाज
  • मंथन
  • वायरल
  • विचार
  • शिक्षा
  • संस्कृति
  • स्वास्थ्य
  • वीडियो
  • E-Magazine
Font ResizerAa
Swatva SamacharSwatva Samachar
  • देश-विदेश
  • राजपाट
  • खेल-कूद
  • मनोरंजन
  • अपराध
  • अर्थ
  • अवसर
  • आप्रवासी मंच
  • बिहारी समाज
  • मंथन
  • वायरल
  • विचार
  • शिक्षा
  • संस्कृति
  • स्वास्थ्य
Search
  • About us
  • Advertisement
  • Editorial Policy
  • Grievance Report
  • Privacy Policy
  • Terms of use
  • Feedback
  • Contact us
Follow US
मंथन

सतत् विकास माडल वाला तीर्थ

Swatva Desk
Last updated: October 13, 2026 5:34 pm
By Swatva Desk 1 View
Share
11 Min Read
SHARE

गंगा के मैदान में पहली बार नव पाषाण युग से लेकर बाद के कालों के पुरातात्विक अवशेष चिरांद की उत्खनन में मिले हैं। उन अवशेषों से पता चलता है कि इस स्थान पर सात हजार ें वर्षों से लोग निवास करते रहे हैं। प्राचीन काल में यहां एक समृद्ध सभ्यता व संस्कृति थी। वह संस्कृति बहुत दिनों तक जीवित थी। इसका अर्थ यह हुआ कि जिसे हम सतत विकास कहते हैं, उस प्रकार का विकास यहां था।

- Advertisement -

चिरांद से जुड़ी मान्यताएॅं इसे एक तीर्थ स्थल के रूप में स्थापित करती हैं। वहीं दस वर्षों की खुदाई से प्राप्त हजारों पुरावशेष इसकी प्राचीनता के गवाह हैं। ऐसे महत्वपूर्ण स्थल को एक प्रसिद्ध सांस्कृतिक केन्द्र के रूप में प्रतिष्ठित होना चाहिए था। परंतु पुरातात्विक, ऐतिहासिक व धार्मिक दृष्टिकोण से अतिमहत्वपूर्ण यह स्थल हाल तक गुमनाम रहा। लोकनायक गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस के बालकांड मे इस तीर्थ क्षेत्र का अत्यंत भावनापूर्ण व रोचक वर्णन किया है। गोस्वामी जी ने गंगा, सरयू व सोन के मिलन से बनने वाले इस तिमुहानी के पवित्र जल को त्रिविध तापों का नाश करने वाला बताया है। त्रिविध तापों में दैहिक, दैविक एवं भौतिक ताप शामिल है। इसमें संतुलित भोजन के अभाव में शरीर का रोगग्रस्त होना एवं धन की कमी के कारण होने वाली परेशानियां शामिल है। महर्षि बाल्मीकि रचित रामायण में भी इस तीर्थ का वर्णन लगभग इसी रूप में है। वाल्मीकि जी के रामायण में इस क्षेत्र को हराभरा बताया गया है साथ ही इसे ज्ञान से युक्त ऋषियांे का तप क्षेत्र भी बताया गया है। प्रकृति के सान्निध्य में आनंदपूर्ण जीवन की बातें कही गयी हैं। इस प्रकार प्राचीनकाल में यह क्षेत्र विकास की सभी मानकों पर सही था। रामायण की कथा के अनुसार यह स्थान रामसर्किट का महत्वपूर्ण बिन्दु है।

जिन्ह में रही भावना जैसी, प्रभु मूरति तिन्ह देखी तैसी की तरह चिरांद को भी विभिन्न रूपों में देखने-समझने वाले हैं। पुरातत्व व इतिहास में रूचि रखने वाले इसे महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल मानते हैं। उनके विचार में इस स्थान की अभी और खुदाई होनी चाहिए ताकि मानव के विकास की कहानी के कुछ और प्रसंग सामने आये। वहीं चिरांद को धर्म नगरी मानने वालों का विचार है कि राजगीर की तरह चिरांद भी योगेश्वर श्रीकृष्ण की प्रमुख लीला भूमि है। यहॉं भगवान श्रीकृष्ण अपने परम शिष्य अर्जुन के साथ आए थे। यहॉं उन्होंने दानी राजा मौरध्वज की कठिन परीक्षा ली थी। इस परीक्षा के माध्यम से उन्होंने अर्जुन का भ्रम दूर किया था। इस प्रकार यह मथुरा, वृंदावन व राजगीर की तरह एक परम तीर्थ स्थल है।

वहीं कुछ विद्वानों का मत है कि यह स्थान गौतम बुद्ध के सबसे प्रिय शिष्य आनंद से जुड़ा हुआ है। इस प्रकार यह बुद्ध सर्किट का एक महत्पूर्ण बिन्दु है। वहीं सनातन परंपरा को मानने वाले कहते हैं कि तीन पवित्र नदियों के संगम पर बसे होने के कारण चिरांद तीर्थराज प्रयाग की तरह ही श्रेष्ठ तीर्थ स्थल है। नदियों के संगम पर सत्संग व शास्त्रार्थ की प्राचीन परंपरा रही है। अतः चिरांद में भी कुम्भ जैसा आयोजन किया जाना चाहिए। वहीं काशी व हरिद्वार जैसे तीर्थ स्थलों पर गंगा पूजन की परंपरा से प्रेरणा लेकर चिरांद में भी माता गंगा की भव्य महाआरती का आयोजन शुरू किया गया। पहली बार गंगा दशहरा के अवसर पर यह आयोजन हुआ था। इस अवसर पर गंगा महाआरती व गंगा बचाओ संकल्प समारोह का आयोजन किया गया। अब यह आयोजन ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन होता है।

- Advertisement -

चिरांद को एक तीर्थ के रूप में सामने रख कर यदि विचार किया जाए तो इस स्थान पर रहने वालों के समक्ष भोजन, वस्त्र और आवास की समस्या नहीं रही होगी। खुदाई में यहां एक ऐसे भवन का ढांचा मिला है जिसमें स्नानागार और शौचालय भी था। मोहन जोदाड़ो और हड़प्पा की तरह यह स्थान भी आधुनिक नगरीय सुविधाओं से युक्त था।

- Advertisement -

इसके साथ ही खुदाई में नवपाषाण कालीन विभिन्न अनाजों के दाने मिले हैं जो इतने दिनों के बाद भी सुरक्षित थे। इसका अर्थ यह हुआ कि यहां के लोगों को नमी से अनाज को सुरक्षित करने का ज्ञान था। जब चावल, मसूर, जौ, तील जैसे सभी प्रकार के अनाज के दाने भरपूर मात्रा में जमीन के अंदर से मिले है तो यहां के लोग उन्नत कृषि की कला में भी दक्ष थे। कृषि का कार्य बिना जल के संभव नहीं। नदी के तट पर भरपूर जल का मिलना स्वाभाविक है। लेकिन, बरसात के समय बाढ़ की स्थिति में खेतों की फसलों के नष्ट हो जाने के भी खतरे रहे होंगे। नदी से दूर पानी उपलब्ध कराए बिना खेती नहीं हो सकती है। ऐसे में नदी के जल का उपयोग कृषि व अन्य कार्यों में करने का तकनीक यहां के लोगों ने विकसित कर लिया होगा।

चिरांद की खुदाई मंे कुछ ऐसे ढांचे मिले हैं जिससे जल प्रबंधन के प्राचीन तकनीक के बारे में एक दृष्टि मिलती है। ऐसे ढांचों का उपयोग वे उपकरण के रूप में जलसंचय व बाद में उसके उपयोग के लिए करते होंगे। वह प्राचीन उपक्रम वर्तमान विश्व को जल संकट से उबरने का संदेश देने में समर्थ है। गंगा तटीय क्षेत्रों में भी शुद्ध पेयजल व सिंचाई के लिए जल का अभाव है। तीन नदियों के संगम से निकला चिरांद का प्राचीन खनुआ नाला श्रेष्ठ जल प्रबंधन का ही अद्भुत माडल है।

यहां के स्थानीय लोग अपने बाप-दादा से सुनी गयी संस्मरणों के आधार पर कहते हैं कि सोन नद है। बरसात में इस नद का रौद्र रूप देख गंगा व सरयू जी ठिठक जाती हैं। जब वह ठिठकती हैं तो पानी तट के ऊपर तक पहुंच जाता है। उनकी धाराएं तट पर बने बड़े-बड़े नालों में समाने लगती है। गंगाजी में आने वाली बाढ़ को भी अपनी संस्कृति का अंग बना लेने वाले लोग यहां बने हजारों वर्ष पुराने खनुआ नालों का जिक्र करते हैं। इन्हीं नालों के माध्यम से सोन के रौद्र रूप से ठीठकने वाली गंगा-सरयू की जल धाराएं सारण में उत्तर की ओर दूर-दूर तक चली जाती थीं जिससे बड़े-बड़े चंवरों में सालो भर पानी रहता था। उससे खेती होती थी। पशुओं का प्यास बुझता था। धरती के अंदर पानी की कभी कमी नहीं रहती थी। इस जल से सारण के सैकड़ों एकड़ में फैले चंवर अघा जाते थे। इसमें मछली पाली जाती थी वहीं कुआर के बाद जब खेतों में पानी की कमी होती थी तब चंवर का यह जल किसानों के काम आता था।

चिरांद का वह खनुआ नाला और पुराने फाटक के अवशेष आज भी विद्यमान है। ये नाले कब बने? इनका निर्माण कराने वालो कौन था? इन प्रश्नों का ठीक-ठीक उत्तर ढूंढना आसान नहीं है। लेकिन, इसका उत्तर ढूंढना चिरांद के संपूर्ण इतिहास को सामने लाने के लिए अत्यंत आवश्यक है। उस इतिहास के माध्यम से चिराद में परंपरा से चलने वाली जल संस्कृृति का ज्ञान जल संकट से जूझने वाले समाज और देश के लिए उपयोगी होंगे। वैसे विकास के इस युग में खनुआ नाला से होकर गंगा व सरयू के प्रसाद के रूप में मिलने वाला जल खेतों तक नहीं पहुंच रहा है। चिरांद विकास परिषद् नामक संस्था जल प्रबंधन के ऐसे प्राचीन उपक्रमों को फिर से पुराने रूप में लाने के लिए प्रयासरत है ताकि इस स्थान को वर्तमान युग में विकास का माडल के रूप में प्रस्तुत किया जा सके।

तीन नदियों का संगम होने के कारण यह क्षेत्र जैव विविधता की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस क्षेत्र की भौगोलिक संरचना भी अध्ययन व शोध की दृष्टि से अतिमहत्वपूर्ण है। इस प्रकार चिरांद जैव-भौगोलिक अध्ययन केन्द्र के रूप में भी विकसित हो सकता है। गंगा व नारायणी के संगम पर स्थित हरिहर क्षेत्र और सरयू के तट पर स्थित गौतम क्षेत्र के मध्य मंे स्थित चिरांद में वह सब कुछ उपलब्ध है जिसके सहारे इसे प्रमुख धार्मिक पर्यटन केन्द्र के रूप में विकसित किया जा सकता है।

धार्मिक मान्यता है कि गंगा-सरयू व सोन के संगम के जल से अरेराज स्थित सोमेश्वर महादेव का अभिषेक किया जाए तो शनिदेव की कुदृष्टि से बचा जा सकता है। सैकड़ों वर्षों से लोग चिरांद से जल लेकर अरेराज जाते रहे हैं। वहीं चिरांद के जीयछ पोखर के बारे में कहा जाता है कि यहां स्नान करने वाली महिलाओं को संतान सुख की प्राप्ति होती है। भगवान श्रीकृष्ण की परीक्षा में सफल होने वाले दानी राजा मोरध्वज ने अपने पुत्र का कटा हुआ शरीर इसी स्थान पर फेंका था। बाद में श्रीकृष्ण की कृपा से राजा मोरध्वज के पुत्र ताम्रध्वज फिर से जीवित हो गये थे। इसके बाद से इस स्थान की महिमा अपार हो गयी। चिरांद का वह जीयछ पोखर आज भी है लेकिन अत्यंत दयनीय स्थिति में। चिरांद के तट पर विश्व प्रसिद्ध संतों ने तपस्या की थी। उनकी स्मृतियां आज भी जीवित हैं। चिरांद का गौरवशाली अतीत तभी फिर प्रकट होगा जब इस धरती के सपूतों की स्मृतियां संरक्षित व दर्शनीय होंगी। यह स्थानीय लोगों के सहयोग व प्रयास से ही संभव होगा। चिरांद विकास परिषद् इसके लिए प्रयासरत है। इन धरोहरों को संरक्षित करने के बाद दर्शनीय बना दिया जाए तो यह स्थान प्रकृति के सान्निध्य में एक तीर्थ पर्यटन केंद्र बन सकता है।

TAGGED: चिरांद, तीर्थ, विकास माडल
Share This Article
Facebook Twitter Whatsapp Whatsapp LinkedIn Telegram Copy Link
Did like the post ?
Love0
Sad0
Happy0
Sleepy0
Angry0
Dead0
Wink0
Leave a comment Leave a comment

Leave a Reply Cancel reply

You must be logged in to post a comment.

हमने पुरानी ख़बरों को आर्काइव में डाल दिया है, पुरानी खबरों को पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक कर। Read old news on Archive

Live News

- Advertisement -

Latest News

रामायण, त्रिवेणी और नवपाषाण सभ्यता का अद्भुत संगम
मंथन विचार
सवैयाटाड़ पंचायत की बहेरवातरी गांव में पहली बार सजेगा दुर्गापूजा का मेला
बिहारी समाज
विद्यालयों में कभी भी ठप हो सकता है एमडीएम
बिहारी समाज
आंगनबाड़ी केंद्र का नहीं खुलता ताला, निरीक्षण पर उठ रहा सवाल
बिहारी समाज
- Advertisement -

Like us on facebook

Subscribe our Channel

Popular Post

रामायण, त्रिवेणी और नवपाषाण सभ्यता का अद्भुत संगम
मंथन विचार
सवैयाटाड़ पंचायत की बहेरवातरी गांव में पहली बार सजेगा दुर्गापूजा का मेला
बिहारी समाज
विद्यालयों में कभी भी ठप हो सकता है एमडीएम
बिहारी समाज
आंगनबाड़ी केंद्र का नहीं खुलता ताला, निरीक्षण पर उठ रहा सवाल
बिहारी समाज
- Advertisement -
- Advertisement -

Related Stories

Uncover the stories that related to the post!
मंथन

रामायण, त्रिवेणी और नवपाषाण सभ्यता का अद्भुत संगम

चिरांद बिहार का एक दुर्लभ पुरातात्विक केंद्र है, जहाँ नवपाषाण सभ्यता के…

By Swatva Desk
मंथन

चिरांद विकास को गति

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबाले 21 जनवरी 2026 को…

By Swatva Desk
मंथन

घुप अंधेरे को चीर बाहर निकला चिरांद

मानव सभ्यता की उन्नति और अवनति के साक्षी पुरातात्विक स्थल चिरांद तो…

By Swatva Desk
मंथन

चिरांद : सतत् साभ्यतिक साक्ष्य

उत्थान-पतन, विचित्रता व रोमांच की अनगिनत कथाएं गढ़ते हुए मानव की विकास…

By Swatva Desk
Show More
- Advertisement -

About us

पत्रकारों द्वारा प्रामाणिक पत्रकारिता हमारा लक्ष्य | लोकचेतना जागरण से लोकसत्ता के सामर्थ्य को स्थापित करना हमारा ध्येय | सूचना के साथ, ज्ञान के लिए, गरिमा से युक्त |

Contact us: [email protected]

Facebook Twitter Youtube Whatsapp
Company
  • About us
  • Feedback
  • Advertisement
  • Contact us
More Info
  • Editorial Policy
  • Grievance Report
  • Privacy Policy
  • Terms of use

Sign Up For Free

Subscribe to our newsletter and don't miss out on our programs, webinars and trainings.

[mc4wp_form]

©. 2020-2024. Swatva Samachar. All Rights Reserved.

Website Designed by Cotlas.

adbanner
AdBlock Detected
Our site is an advertising supported site. Please whitelist to support our site.
Okay, I'll Whitelist
Welcome Back!

Sign in to your account

Lost your password?