चिरांद बिहार का एक दुर्लभ पुरातात्विक केंद्र है, जहाँ नवपाषाण सभ्यता के प्रमाण मिलते हैं और जिसे रामायणकालीन यात्रा-मार्ग से भी जोड़ा जाता है। संरक्षण, शोध और पर्यटन विकास के माध्यम से यह स्थल बिहार की पहचान को राष्ट्रीय स्तर पर नई ऊँचाई दे सकता है।
वाल्मीकि कृत रामायण केवल धार्मिक आस्था का ग्रंथ नहीं है, बल्कि भारत की प्राचीन सभ्यता, संस्कृति और भूगोल को समझने का एक महत्वपूर्ण साहित्यिक स्रोत भी है। रामायण में अनेक ऐसे स्थल आते हैं जिनका संबंध हमारी सांस्कृतिक स्मृति से तो है ही, साथ ही वे ऐतिहासिक और भौगोलिक अध्ययन के लिए भी संकेत प्रदान करते हैं। इसी संदर्भ में बिहार के सारण जिले में स्थित चिरांद का स्थान अत्यंत विशिष्ट है।
चिरांद को सामान्यतः नवपाषाण युगीन सभ्यता के अवशेषों के लिए जाना जाता है, लेकिन यह तथ्य भी कम महत्वपूर्ण नहीं है कि इस स्थल को भगवान श्रीराम की अभ्युदय यात्रा के प्रथम पड़ाव के रूप में भी देखा जा सकता है। यही विशेषता चिरांद को धार्मिक, ऐतिहासिक और पुरातात्विक दृष्टि से एक दुर्लभ तथा बहुआयामी केंद्र बनाती है।
रामायण में चिरांद का संकेत
वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड के 23वें सर्ग में वर्णन मिलता है कि महर्षि विश्वामित्र के संरक्षण में भगवान श्रीराम और लक्ष्मण, अवधपुरी से निकलकर सरयू के किनारे-किनारे यात्रा करते हुए त्रिपथगा गंगा और सरयू के संगम स्थल पर पहुँचते हैं और वहाँ रात्रि विश्राम करते हैं। परंपरा और स्थानीय भूगोल के आधार पर यह माना जाता है कि यह वही भू-भाग है जिसे वर्तमान में हम पुरातात्विक स्थल चिरांद के रूप में जानते हैं।
इस प्रकार चिरांद केवल पुरातत्व का विषय नहीं रह जाता, बल्कि वह रामायणकालीन भारत की सांस्कृतिक चेतना से जुड़कर हमारे इतिहास-बोध का भी महत्वपूर्ण आधार बन जाता है। रामायण जैसे ग्रंथ में किसी स्थल का उल्लेख केवल कथा-विस्तार नहीं, बल्कि भारत की नदी-संस्कृति और ज्ञान-परंपरा की व्यापक संरचना का संकेत भी है। अतः चिरांद का अध्ययन रामायण के संदर्भ में भी गंभीरता से किया जाना चाहिए।
बिहार की त्रिवेणी: संभावना अपार, पहचान सीमित
यह भी तथ्य है कि बिहार में महान नदियों का संगम क्षेत्र मौजूद है, जिसे धार्मिक दृष्टि से प्रयागराज की भांति त्रिवेणी क्षेत्र के रूप में समझा जा सकता है। इसके बावजूद चिरांद जैसे महत्वपूर्ण स्थल को वह व्यापक पहचान नहीं मिल सकी जिसकी वह वास्तविकता में अपेक्षा करता है। इस उपेक्षा का प्रमुख कारण यह प्रतीत होता है कि यहाँ जिस प्रकार का संगठित शोध, संरक्षण और योजनाबद्ध विकास होना चाहिए था, वह पर्याप्त रूप में नहीं हो सका।
1961 से उत्खनन और 1972-73 की उपलब्धि
काफी विघ्न-बाधाओं के बाद वर्ष 1961 में बिहार पुरातत्व निदेशालय द्वारा चिरांद में उत्खनन कार्य आरंभ कराया गया। इसके निष्कर्ष 1972-73 तक स्पष्ट होने लगे और यह प्रमाणित हुआ कि चिरांद के गर्भ में एक सुविकसित एवं समृद्ध नवपाषाण युगीन सभ्यता के अवशेष मौजूद हैं।
यह खोज इसलिए भी महत्वपूर्ण सिद्ध हुई क्योंकि उस समय तक यह धारणा प्रचलित थी कि गंगा-तटीय क्षेत्र में अत्यंत प्राचीन सभ्यताओं के प्रमाण सीमित हैं। चिरांद की खुदाई ने इस मान्यता को बदलते हुए यह स्थापित किया कि भारत की प्राचीन सभ्यता एवं संस्कृति गंगा के तट पर भी अत्यंत विकसित अवस्था में विद्यमान थी। इस प्रकार चिरांद ने इतिहास-लेखन की दिशा में भी उल्लेखनीय योगदान दिया।
कृषि-संस्कृति, जल-प्रबंधन और सतत विकास का प्राचीन मॉडल
चिरांद से प्राप्त पुरातात्विक अवशेष यह दर्शाते हैं कि यहाँ के लोगों को कृषि, जीवन-व्यवस्था और संसाधन प्रबंधन की समृद्ध समझ थी। सात-आठ हजार वर्षों तक किसी क्षेत्र में मानव-बसावट का निरंतर बने रहना इस बात का संकेत है कि यहाँ के लोगों को नदी जल के संरक्षण और प्रबंधन की कला भी ज्ञात थी।
आज जब पूरी दुनिया “सतत विकास” और “जल-संकट” जैसी चुनौतियों का सामना कर रही है, तब चिरांद का अध्ययन यह समझने में सहायता करता है कि हमारे समाज में प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जीवन जीने की परंपरा हजारों वर्षों से रही है।
संरक्षण और विकास: आवश्यकता अब भी शेष
चिरांद विकास परिषद जैसे प्रयासों के माध्यम से इस स्थल के गौरवशाली अतीत को सामने लाने का कार्य जारी रहा है। समय-समय पर कुछ कार्य भी हुए हैं, लेकिन चिरांद की महत्ता के अनुपात में यह प्रयास अभी भी अपर्याप्त प्रतीत होते हैं।
यह हर्ष का विषय है कि जयप्रकाश विश्वविद्यालय ने इस महत्वपूर्ण पुरातात्विक केंद्र को लेकर अकादमिक विमर्श आरंभ किया है। किंतु चिरांद के विविध पक्षों पर गहन शोध, दस्तावेजीकरण और वैज्ञानिक अध्ययन तभी संभव है जब सरकार, विश्वविद्यालय और समाज एक समन्वित और दीर्घकालिक योजना के साथ आगे बढ़ें।
चिरांद एक ऐसी धरोहर है जो भारत की प्राचीन सभ्यता, गंगा-तटीय संस्कृति, नवपाषाण जीवन और रामायणकालीन संकेतों को अपने भीतर समेटे हुए है। यह स्थल केवल अतीत का प्रमाण नहीं, बल्कि बिहार की सांस्कृतिक पहचान और भविष्य की संभावनाओं का केंद्र भी है। अब आवश्यकता है कि चिरांद को संरक्षण, शोध और विकास के माध्यम से राष्ट्रीय स्तर पर वह स्थान दिलाया जाए जिसका वह वास्तविक रूप से अधिकारी है।
इसके लिए मैंने सरकार के समक्ष पांच ठोस प्रस्ताव रखे हैं। इसे मैं मांग के तौर पर प्रस्तुत कर रहा हूं।
1. चिरांद को राज्य एवं राष्ट्रीय महत्व की धरोहर के रूप में विकसित करने हेतु विशेष योजना बने।
2. स्थल पर स्थायी पुरातात्विक संग्रहालय एवं “इंटरप्रिटेशन सेंटर” की स्थापना हो।
3. सुरक्षा, सीमा-चिह्नांकन, सूचना-पट्ट, प्रकाश व्यवस्था, स्वच्छता और पर्यटक सुविधाएँ सुनिश्चित हों।
4. विश्वविद्यालयों के सहयोग से बहुविषयक शोध परियोजनाएँ, सेमिनार और प्रकाशन नियमित हों।
5. चिरांद को रामायण-सांस्कृतिक पर्यटन सर्किट से जोड़कर स्थानीय रोजगार और अर्थव्यवस्था को बल दिया जाए।
