राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबाले 21 जनवरी 2026 को एक दिवसीय प्रवास पर चिरांद आए थे। करीब 20 वर्ष पूर्व चिरांद जैसे विश्व के दुर्लभ पुरातात्विक तीर्थ को गुमनामी के अंधेरे से निकालने के लिए अभियान का सूत्रपात हुआ था। श्री होसबाले इस अभियान के प्रेरणा स्रोत है। इनके चिरांद प्रवास से इस कार्य में लगे कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों का मनोबल बढ़ा है। काम की गति बढ़ी है।
भारत के इतिहास के संबंध में कई प्रकार की भ्रांतियों को दूर करने में चिरांद जैसे पुरातात्विक स्थलों की महत्वपूर्ण भूमिका है। चिरांद उत्खनन से प्राप्त पुरावशेषों ने गंगा तटीय क्षेत्र में एक ऐसी सभ्यता का प्रमाण प्रस्तुत कर दिया था जिससे पूरे विश्व के पुरातत्वविद् आश्चर्य चकित थे। वर्ष 1961 से 1972 के बीच यहां उत्खनन हुआ था, देश-विदेश में यहां के उत्खनन पर शोधपत्र प्रस्तुत किए गए थे। लेकिन, इतने महत्वपूर्ण उत्खनन का रिपोर्ट प्रकाशित नहीं हो सका था। चिरांद फिर से गुमनामी के गर्त में समाता जा रहा था। इसी बीच राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबाले को इस स्थल के बारे में जानकारी मिली। उन्होंने सहज भाव से प्रश्न किया कि उत्खनन हुआ है तो उसका रिपोर्ट कहां है? इस प्रश्न का उत्तर जब ढूंढा जाने लगा तब 2007 के बाद सरकार ने चिरांद उत्खनन रिपोर्ट प्रकाशित कर दिया।
बिहार श्री दत्तात्रेय होसबाले जी का बहुत दिनों तक कर्मक्षेत्र रहा है। चिरांद के उत्थान व इसके महत्व को पुनर्स्थापित करने को लेकर वे बिहार के बुद्धिजीवियों को हमेशा प्रेरित करते रहे हैं। वर्तमान में आरएसएस के सरकार्यवाह का दायित्व होने के कारण इनके पास समय का अभाव रहता है। इसके बावजूद वे 21 जनवरी 2026 चिरांद आए थे। वहां की स्थिति, विकास की संभावनाओं का जायजा लिया।
गंगा, सरयू और सोन नद के संगम पर स्थित विश्व के इस दुर्लभ पुरातात्विक स्थल से संबंधित एक-एक बिंदु पर वहां उपस्थित बुद्धिजीवियों, पुरातत्वविदों व स्थानीय लोगों से उन्होंने जानकारी ली। जहां-जहां उत्खनन हुआ है वहां वे गए और उनका निरीक्षण किया। उत्खनन स्थल पर निर्मित भवन में बिहार सरकार के पुरातत्व निदेशालय के अधिकारियों, जयप्रकाश विश्वविद्यालय छपरा के कुलपति प्रो. परमेंद्र कुमार वाजपेयी, पुरातत्वविद् डा. अनंत आशुतोष द्विवेदी, आईआईटी खड़गपुर के पूर्ववर्ती छात्र व बिहार विधान परिषद के सदस्य सच्चिदानंद राय से इस स्थल के विकास पर चर्चा की। वहां उपस्थित विद्वानों ने बताया कि पुरातत्व, इतिहास और भारत की संस्कृति से जुड़े विविध पक्षों पर अध्ययन एवं शोध की दृष्टि से यह स्थल अत्यंत महत्वपूर्ण है। लेकिन, इसके महत्व के अनुरूप इस स्थल को लेकर अब तक अपेक्षित शोध व अध्ययन की कमी रही है। जेपी विश्वविद्यालय के कुलपति ने इस पुरातात्विक स्थल को लेकर उनके विश्वविद्यालय द्वारा शुरू कराए गए अध्ययन व शोध की जानकारी दी।
पुरातात्विक स्थल के बाद वे चिरांद में गंगा तट पर स्थित प्राचीन मठ-मंदिरों में गए। अध्योध्या मंदिर नाम से प्रसिद्ध मंदिर में वे गए। यह स्थान अयोध्या स्थित लक्ष्मण किला की गुरुगद्दी माना जाता है। यह मंदिर उस स्थान पर बना है जहां सैकड़ों वर्ष पूर्व एक अनाम संत तपस्या रत थे। उन्हीं की परंपरा के संत व गुहस्थों ने मिलकर इस त्रिवेणी क्षेत्र में मंदिर का निर्माण कराया था। इस दौरान मंदिर के महंत लक्ष्मण किलाधीश स्वामी श्री मैथिली रमण शरण जी महाराज ने श्री दत्तात्रेय होसबालेजी का अभिनंदन व मंगलाशासन किया। मंदिर परिसर में उपस्थित संतों व विद्वानों ने उन्हें चिरांद के आध्यात्मिक व सांस्कृतिक महत्व की जानकारी दी।
महंत श्री मैथिलीरमण शरणजी महाराज ने कहाकि मूल रामकथा यानी महर्षि वाल्मीकि रचित रामायण में गंगा, सरयू और सोन नद की त्रिवेणी क्षेत्र के इतिहास का वर्णन मिलता है। यह महानतीर्थ है जिसकी गौरव गाथा श्रीराम के जन्म के बहुत पहले यानी सतयुग से प्रारंभ होता है। महंतजी ने बताया कि यह क्षेत्र स्थाणु यानी तपस्वी शिव का है। उन्होंने खुद तपस्या करके ज्ञान की धारा प्रवाहित की थी। यह भूमि महर्षि गौतम, महर्षि विभांड, श्रृंगी, च्यवन की तपोभूमि रही है। गंगा, सरयू, सोन, नारायणी जैसी नदियों से प्लावित और पोषित इस पुण्य क्षेत्र में उच्च मानव जीवन के लिए सभी प्रकार की अनुकूलता थी। यहां ऋषियों के तप से भारत की ज्ञान परंपरा अपने उच्च अवस्था में थी।
यह क्षेत्र भारत की संस्कृतिक समृद्धि का प्रतीक था क्योंकि यहां ऋषि परंपरा के साथ ही उत्तम कृषि की भी परंपरा थी। इस प्रकार विश्व की प्राचीन सभ्यता वाला यह भूभाग भारत की ऋषि व कृषि संस्कृति का क्षेत्र है। यही कारण है कि इसके गर्भ से कम से कम दस हजार वर्ष पुराने अन्न के दाने मिले हैं। यह स्थान कभी निर्जन नहीं हुआ क्योंकि यहां मानव जीवन के लिए अनुकूलता रही है। यह अनुकूलता गंगा, सरयू, सोन और नारायणी यानी गंडक जैसी सदानीरा नदियों के कारण रही है। यहां के लोगों ने नदी के साथ अनुकूलता की जीवन पद्धति विकसित की थी जिसे हम स्थायी विकास प्रतिमान मान सकते हैं। जिन विशेषताओं के कारण यह स्थान प्रकृति के सान्निध्य व अनुकूलता के साथ उत्तम मानव जीवन का प्रतिमान बना है, उन्हें वर्तमान युग के अनुकूल बनाकर मानव के समक्ष खड़े अस्तित्व संकट की समस्या का समाधान किया जा सकता है।
चिरांद एक ऐसा पुरातात्विक स्थल है जहां नदियों से प्रतिपल प्रवाहित होने वाले अपार जलराशि के संग्रहण, संरक्षण व उपयोग की लोकबुद्धि हजारों वर्षों तक लोक के व्यवहार में रचती-बसती थी। यह लोकबुद्धि बाढ़ जैसी समस्या का समाधान भी थी क्योंकि वर्षा काल में नदी के जलस्तर में वृद्धि के साथ ही उसे दूर-दूर तक पहुंचाने के लिए यहां खनुंआ नालों का जाल था। खनुआ नाला यानी समाज के संगठित शक्ति के प्रयोग से मिट्टी खान कर बनाया गया जलमार्ग जिससे गंगा, सरयू नारायणी जैसी नदियांे के पानी को सैकड़ों कोसों तक फैला दिया जाता था। उस पानी को चंवर, पोखर, आहर जैसे उपक्रमों में समेट लिया जाता था। गंगा का यह जल पाताल गंगा मेें जा मिलता था जिससे धरती तृप्त होती थी। पेड़-पौधे हरेभरे रहते थे। बाढ़ की तीव्रता भी कम हो जाती थी। वास्तव में यह प्राचीन व्यवस्था भारत का सस्टेनेबल डेवलप्मेंट माडल था। यह माडल भारत के चतुष्टय पुरूषार्थ का एक प्रतिमान था।
चिरांद का इतिहास व भूगोल चतुष्टय पुरूषार्थ यानी धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्रदान करने वाली विकास मॉडल के लिए एक प्रेरणा देने वाला है। विश्वामित्र मुनि के संरक्षण में यहां पहुंचे श्रीराम और लक्ष्मण ने इस तपोभूमि के प्रताप को जाना जहां धन व जीवनोपयोगी संसाधनों के अभाव व प्रभाव दोनों से मुक्त मानव परम संतोष व आनंद का जीवन जी रहा था। जीवन जीने का यही मॉडल विश्व का़े अस्तित्व संकट से उबार सकता है।