त्रिदंडी स्वामी जी महाराज और मामाजी जैसे संतों के सानिध्य में बैठने पर आत्मा में यह सहज विश्वास हो जाता था कि हमारा यह सिद्धाश्रम बक्सर त्रिलोक में न्यारा तीर्थ है। इसकी तुलना किसी अन्य तीर्थ से नहीं हो सकती क्योंकि इसी तीर्थ ने श्रीराम को पृथ्वी को निशाचर विहीन कर देने का सामर्थ्य दिया था।
हमारे मन में यह भाव रहता था कि यह तीर्थ एक दिन अवश्य जाग उठेगा। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने वामन भगवान की जन्मभूमि को घेरने वाली जेल की चहारदीवारी को हटाने का निर्णय कर हम बक्सर के लोगों के पुराने सपने को साकार कर दिया है। अब वामन भगवान तक पहुंचने में जेल का दिवार बाधक नहीं होगा। इसके लिए हम सभी मुख्यमंत्री श्री सम्राट चौधरी के आभारी हैं और जीवन पर्यंत रहेंगे।
वामन भगवान की जन्मभूमि जब जेल की चहारदीवारी से बाहर आ गयी तब मुझे पूर्ण विश्वास हो गया कि हमारा सिद्धाश्रम अब जाग उठा है। कोई भी महातीर्थ परमात्मा की इच्छा व योजना से ही सुषुप्त व जागृत होता है। जब यह तीर्थ जाग रहा है तो हम सभी का कर्तव्य है कि इसमें हम पूर्ण समर्पण के साथ बिना किसी व्यक्तिगत आकांक्ष, राग-द्वेष के अपने सामर्थ्य के अनुसार सहभागी बनें।
हमारे लोग अक्सर कहते है कि बक्सर एक छोटा सा स्थान है। इसका विकास कितना होगा? ऐसे प्रश्नों पर जब मैं विचार करता हूं तो पाता हूं कि सिद्धाश्रम बक्सर एक महातीर्थ है। हमारे ग्रंथों में तीर्थ उस विशेष स्थान को कहा गया है जहां मानव अपनी समस्याओं का समाधान पाता है या उससे पार उतरता है। मानव की समस्याओं का समाधान का मार्ग चतुष्टय पुरूषार्थ कहा गया है। यानी ऋषियों के तप से परिपूर्ण वह स्थल जहां धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति का सामर्थ्य मिले। तीर्थ का अर्थ केवल पूजा-पाठ करने का स्थान नहीं बल्कि मानव के संपूर्ण विकास का प्रेरणा स्थल भी होता है।
सिद्धाश्रम की परंपरा भगवान विष्णु के हजारों वर्षों की तपस्या से शुरू हुई है जिसे महर्षि विश्वामित्र ने जग कल्याण के लिए लोक व्यापक बनाया। हमारे पूर्वज यह बताते रहे हैं कि महर्षि विश्वामित्र ने अपने तपबल से लोक के उपयोग के लिए गेहूं, मसूर, खजूर जैसे कई अन्न व फल का बीज उत्पन्न किया था। सृष्टि के ऐसे नवीन अन्न को विश्वामित्र अन्न कहने की परंपरा रही है।
महाबली मारीच ने श्रीराम को पहचान लिया था। उसने रावण से श्रीराम का परिचय देते हुए कहा था कि रामो विग्रहवान धर्मः। यानी श्रीराम साक्षात जीवंत धर्म है। महर्षि विश्वमित्र के आदेश पर भगवान श्रीराम और श्रीलक्ष्मण सिद्धाश्रम स्थिति भारत की दर्शन परंपरा के प्रणेता ऋषियों के आश्रमों में रात्रि निवास कर उनसे धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष के लिए आवश्यक ज्ञान व तत्व को ग्रहण किया।
भगवान श्रीराम का ऋषियों के आश्रम में जाना व वहां रात्रि विश्राम करने की स्मृति को जीवंत बनाए रखने के लिए बक्सर के लोगों ने पंचकोसी परिक्रम को अपना लोक उत्सव बना लिया। ज्ञान के आलोक मंे उत्सव की यह परंपरा संरक्षण के अभाव में उस ख्याति को प्राप्त नहीं कर सकी जिसका वह हकदार है। इसके बाद बक्सर का वामन द्वादशी मेला भी प्रधान उत्सव है। प्राचीन काल से यह परंपरा बिना किसी सरकारी संरक्षण व योजना के लगातार चल रही है। इसका जड़ लोक में इतना व्याप्त है कि बिना किसी सूचना के वामन द्वादशी के अवसर पर गांव-गांव से हजारों लोग एकत्रित हो जाते हैं। अब यह लोक उत्सव निखरने वाला है।