भगवान वामन ने अपने तप से जिस समृद्ध ज्ञान परंपरा की नींव रखी थी उसे महर्षि विश्वामित्र ने श्रीराम और लक्ष्मण के माध्यम से विश्व में स्थापित कराया था। उस समय भगवान श्रीराम और लक्ष्मण की आयु 16 वर्ष से कम थी। महर्षि विश्वामित्र से प्राप्त दिव्यास्त्रों को उन्होंने अपने मन में धारण किया। उनके मन के संकल्प मात्र से लक्ष्य का भेदन कर देने वाले दिव्यास्त्र कृत्रिम बुद्धिमता यानी एआई के प्राचीनतम आदर्श उदाहरण हैं। वहीं तरूण श्रीराम और लक्ष्मण जेन जी के प्राचीन भारतीय प्रतिमान हैं।
वाल्मीकि रामायण में सिद्धाश्रम बक्सर में महर्षि विश्वामित्र द्वारा श्रीराम को सौंपे गए दिव्यास्त्रों का जो वर्णन मिलता है वह आज के लेजर गाइडेड मिसाइल से बहुत अधिक सटिक व स्वयं निर्णय लेने की क्षमता वाले है। विश्वामित्र के आदेश पर वे सभी दिव्यास्त्र उनके अधीन हो गए थे एवं उनके मन के संकल्प मात्र से क्रियाशील होने का उनमें समर्थ था।
बाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड के बीसवे सर्ग में महर्षि विश्वामित्र और महाराजा दशरथ के बीच संवाद में यह स्पष्ट हो जाता है कि ताड़का वध के लिए जब वे श्रीराम और लक्ष्मण को अपने संरक्षण में लेकर अयोध्या से सिद्धाश्रम बक्सर के लिए प्रस्थान करते हैं तब उनकी आयु 16 वर्ष नहीं हुई थी।
महर्षि विश्वामित्र से प्रार्थना करते हुए महाराज दशरथ कहते हैं कि
ऊनषोडशवर्षो मे रामो राजीवलोचनः ।
न युद्धयोग्यतामस्य पश्यामि सह राक्षसैः ।।2।।
इयमक्षौहिणी सेना यस्याहं पतिरीश्वरः।
अनया सहितो गत्वा योद्धाहं तैर्निशाचरैः ।। 3।।
इमे शूराश्च विक्रान्ता भृत्या मेऽस्त्रविशारदाः ।
योग्या रक्षोगणैर्योद्धं न रामं नेतुमर्हसि ।।4।। (बालकाण्ड, 20 वां सर्ग)
अर्थात महर्षे! मेरा कमलनयन राम अभी पूरे सोलह वर्ष का भी नहीं हुआ है। मैं इसमें राक्षसों के साथ युद्ध करने की योग्यता नहीं देखता। यह मेरी अक्षौहिणी सेना है, जिसका मैं पालक और स्वामी भी हूँ। इस सेना के साथ मैं स्वयं ही चलकर उन निशाचरों के साथ युद्ध करूंगा। ये मेरे शूरवीर सैनिक, जो अस्त्र विद्या में कुशल और पराक्रमी हैं, राक्षसोंके साथ जूझने की योग्यता रखते हैं। अतः इन्हें ही ले जाइयेय रामको ले जाना उचित नहीं होगा।
इस प्रकार जिस जेन जी की चर्चा आज पूरे विश्व में हो रही है उसका आदर्शतम उदाहरण भारत में रामायण काल में मिलता है। किशोर श्रीराम और लक्ष्मण को महर्षि ने अपने व अन्य ऋषियों द्वारा निर्मित दिव्यास्त्रों को सौंपकर उन्हें ब्रह्मांड का अजेय योद्धा बना दिया था। यह जेन जी और एआई के समन्वय से अत्याचार के समूल नाश एवं आनंदपूर्ण मानव जीवन के लिए उपयुक्त व्यवस्था निर्माण का उदाहरण है। यह सब वामन भगवान की तपोभूमि के प्रताप से संभव हुआ था।
वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड के ही 27 वें एवं 28 वें सर्ग में महर्षि विश्वामित्र द्वारा दिए गए दिव्यास्त्रों की विशेषताओं उनकी संहारक क्षमताओं एवं उनके प्रयोग के पूर्व धर्म का विचार आदि का वर्णन मिलता है। अनैतिक व धर्म विरूद्ध प्रयोग पर उन दिव्यास्त्रों के अपने मूल प्रणेता के पास लौट जाने की भी चर्चा है।
अथ तां रजनीमुष्य विश्वामित्रो महायशाः।
प्रहस्य राघवं वाक्यमुवाच मधुरस्वरम् 11 1 ।।
परितुष्टोऽस्मि भद्रं ते राजपुत्र महायशः।
प्रीत्या परमया युक्तो ददाम्यस्त्राणि सर्वशः ।। 2 ।।
देवासुरगणान् वापि सगन्धर्वोरगान् भुवि।
यैरमित्रान् प्रसह्याजौ वशीकृत्य जयिष्यसि ।। 3 ।।
ताटकावनमें वह रात बिताकर महायशस्वी विश्वामित्र हंसते हुए मीठे स्वर में श्रीरामचन्द्र जी से बोले-महायशस्वी राजकुमार! तुम्हारा कल्याण हो। ताटका वध के कारण मैं तुम पर बहुत संतुष्ट हूं। अतः बड़ी प्रसन्नता के साथ तुम्हें सब प्रकार के अस्त्र दे रहा हूं। इनके प्रभाव से तुम अपने शत्रुओं को चाहे वे देवता, असुर, गन्धर्व अथवा नाग ही क्यों न हों, रणभूमि में बलपूर्वक अपने अधीन करके उन पर विजय पा जाओगे

इसके बाद 4 से 22 श्लोक तक दिव्यास्त्रों का सूत्र रूप में जो वर्णन मिलता है। वह आज के आधुनिकतम विज्ञान व वैज्ञानिकों को भी दृष्टि देने वाले है।
तानि दिव्यानि भद्रं ते ददाम्यस्त्राणि सर्वशः।
दण्डचक्रं महद् दिव्यं तव दास्यामि राघव ।। 4।।
धर्मचक्रं ततो वीर कालचक्रं तथैव च।
विष्णुचक्रं तथात्युग्रमैन्द्रं चक्रं तथैव च ।।5।।
वज्रमस्त्रं नरश्रेष्ठ शैवं शूलवरं तथा।
अस्त्रं ब्रह्मशिरश्चौव ऐषीकमपि राघव ।।6।।
ददामि ते महाबाहो ब्राह्यमस्त्रमनुत्तमम् ।
गदे द्वे चौव काकुत्स्थ मोदकीशिखरी शुभे ।।7।।
प्रदीप्ते नरशार्दूल प्रयच्छामि नृपात्मज।
धर्मपाशमहं राम कालपाशं तथैव च ।।8।।
वारुणं पाशमस्त्रं च ददाम्यहमनुत्तमम् ।
अशनी द्वे प्रयच्छामि शुष्कार्डे रघुनन्दन ।। 9।।
ददामि चास्त्रं पैनाकमस्त्रं नारायणं तथा।
आग्नेयमस्त्रं दयितं शिखरं नाम नामतः ।।10।।
वायव्यं प्रथमं नाम ददामि तव चानघ।
अस्त्रं हयशिरो नाम क्रौञ्चमस्त्रं तथैव च ।।11।।
शक्तिद्वयं च काकुत्स्थ ददामि तव राधव।
कालं मुसलं घोरं कापालमथ किङ्किणीम् ।।12।।
वधार्थ रक्षसां यानि ददाम्येतानि सर्वशः ।
वैद्याधरं महास्त्रं च नन्दनं नाम नामतः ।।13।।
असिरत्नं महाबाहो ददामि नृवरात्मज ।
गान्धर्वमस्त्रं दयितं मोहनं नाम नामतः ।।14।।
प्रस्वापनं प्रशमनं दद्मि सौम्यं च राघव।
वर्षणं शोषणं चौव संतापनविलापने ।।15।।
मादनं चैव दुर्धर्ष कन्दर्पदयितं तथा।
गान्धर्वमस्त्रं दयितं मानवं नाम नामतः ।।16।।
पैशाचमस्त्रं दयितं मोहनं नाम नामतः ।
प्रतीच्छ नरशार्दूल राजपुत्र महायशः ।।17।।
तामसं नरशार्दूल सौमनं च महाबलम।
संवर्त चौव दुर्धर्ष मौसलं च नृपात्मज ।।18।।
सत्यमस्त्रं महाबाहो तथा मायामयं परम।
सौरं तेजःप्रभं नाम परतेजोऽपकर्षणम् ।।19।।
सोमास्त्रं शिशिरं नाम त्वाष्ट्रमस्त्रं सुदारुणम् ।
दारुणं च भगस्यापि शीतेषुमथ मानवम् ।।20।।
एतान् राम महाबाहो कामरूपान् महाबलान।
गृहाण परमोदारान् क्षिप्रमेव नृपात्मज ।।21।।
स्थितस्तु प्राङ्मुखो भूत्वा शुचिर्मुनिवरस्तदा।
ददौ रामाय सुप्रीतो मन्त्रग्राममनुत्तमम् ।।22।।
विश्वामित्र के मुख से निकले इन श्लोकांे का अर्थ व्यापक है। वे कहते हैं रघुनन्दन ! तुम्हारा कल्याण हो। आज मैं तुम्हें वे सभी दिव्यास्त्र दे रहा हूं क्योंकि तुमने धर्म को धारण किया है जिससे पृथ्वी पर निवास करने वाले सभी जीवों का कल्याण सुनिश्चित होगा।
वीर! मैं तुमको दिव्य एवं महान् दण्डचक्र, धर्मचक्र, कालचक्र, विष्णुचक्र तथा अत्यन्त भयंकर ऐन्द्रचक्र दे रहा हूं। नरश्रेष्ठ राघव। इन्द्र का वज्रास्त्र, शिव का श्रेष्ठ त्रिशूल तथा ब्रह्माजी का ब्रह्मशिर नामक अस्त्र भी दूँगा। महाबाहो। साथ ही तुम्हें ऐषीकास्त्र तथा परम उत्तम ब्रह्मास्त्र भी प्रदान करता हूं।
इनके सिवा दो अत्यन्त उज्ज्वल और सुन्दर गदाएं, जिनके नाम मोदकी और शिखरी हैं, मैं तुम्हें अर्पण करता हूं। पुरुषसिंह राजकुमार राम ! धर्मपाश, कालपाश और वरुणपाश भी बड़े उत्तम अस्त्र हैं। इन्हें भी आज तुम्हें अर्पित करता हूं। रघुनन्दन। सूखी और गीली दो प्रकारकी अशनि तथा पिनाक एवं नारायणास्त्र भी तुम्हें दे रहा हूं। अग्नि का प्रिय आग्नेय-अस्त्र, जो शिखरास्त्र के नाम से भी प्रसिद्ध है, तुम्हें अर्पण करता हूं। अनघ। अस्त्रों में प्रधान जो वायव्यास्त्र है, वह भी तुम्हें दे रहा हूं।
ककुत्स्थ कुलभूषण राघव ! हयशिरा नामक अस्त्र, क्रौञ्च-अस्त्र तथा दो शक्तियों को भी तुम्हें देता हूं। कङ्काल, घोर मूसल, कपाल तथा किङ्किणी आदि सब अस्त्र, जो राक्षसों के वध में उपयोगी होते हैं, तुम्हें दे रहा हूं। महाबाहु राजकुमार! नन्दन नाम से प्रसिद्ध विद्याधरों का महान् अस्त्र तथा उत्तम खड्ग भी तुम्हें अर्पित करता हूं।
रघुनन्दन। गन्धर्वों का प्रिय सम्मोहन नामक अस्त्र, प्रस्वापन, प्रशमन तथा सौम्य अस्त्र भी तुम्हें देता हूं। महायशस्वी पुरुषसिंह राजकुमार! वर्षण, शोषण, संतापन, विलापन तथा कामदेव का प्रिय दुर्जय अस्त्र मादन, गन्धर्वो का प्रिय मानवास्त्र तथा पिशाचों का प्रिय मोहनास्त्र भी मुझसे ग्रहण करो। नरश्रेष्ठ राजपुत्र महाबाहु राम! तामस, महाबली सौमन, संवर्त, दुर्जय, मौसल, सत्य और मायामय उत्तम अस्त्र भी तुम्हें अर्पण करता हूं। सूर्य देवता का तेजः प्रभ नामक अस्त्र, जो शत्रु के तेज का नाश करनेवाला है, तुम्हें अर्पित करता हूं।
सोम देवता का शिशिर नामक अस्त्र, त्वष्टा (विश्वकर्मा) का अत्यन्त दारुण अस्त्र, भग देवता का भी भयंकर अस्त्र तथा मनु का शीतेषु नामक अस्त्र भी तुम्हें देता हूं। महाबाहु राजकुमार श्रीराम ! ये सभी अस्त्र इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले, महान् बल से संपन्न तथा परम उदार हैं। तुम शीघ्र ही इन्हें ग्रहण करो।
ऐसा कहकर मुनिवर विश्वामित्र जी उस समय स्नान आदि से शुद्ध हो पूर्वाभिमुख होकर बैठ गये और अत्यन्त प्रसन्नता के साथ उन्होंने श्रीरामचन्द्र जी को उन सभी उत्तम अस्त्रों का उपदेश दिया।
सर्वसंग्रहणं येषां दैवतैरपि दुर्लभम् ।
तान्यस्त्राणि तदा विप्रो राघवाय न्यवेदयत् ।।23।।
जिन अस्त्रोंका पूर्णरूप से संग्रह करना देवताओंके लिये भी दुर्लभ है, उन सबको विप्रवर विश्वामित्रजी ने श्रीरामचन्द्रजी को समर्पित कर दिया।
जपतस्तु मुनेस्तस्य विश्वामित्रस्य धीमतः ।
उपतस्थुर्महार्हाणि सर्वाण्यस्त्राणि राघवम्।।24।।
ऊचुश्च मुदिता रामं सर्वे प्राञ्जलयस्तदा ।
इमे च परमोदार किंकरास्तव राघव ।।25।।
यद्यदिच्छसि भद्रं ते तत्सर्व करवाम वै।
ततो रामः प्रसन्नात्मा तैरित्युक्तो महाबलैः ।।26।।
प्रतिगृह्य च काकुत्स्थः समालभ्य च पाणिना।
मानसा मे भविष्यध्वमिति तान्यभ्यचोदयत् ।।27।।
बुद्धिमान् विश्वामित्र जी ने ज्यों ही जप आरम्भ किया त्यों ही वे सभी परम पूज्य दिव्यास्त्र स्वतः आकर श्रीरघुनाथ जी के पास उपस्थित हो गये और अत्यन्त हर्ष में भरकर उस समय श्रीरामचन्द्रजी से हाथ जोड़कर कहने लगे- परम उदार रघुनन्दन। आपका कल्याण हो। हम सब आपके किङ्कर हैं। आप हमसे जो-जो सेवा लेना चाहेंगे, वह सब हम करने को तैयार रहेंगे।
उन महान् प्रभावशाली अस्त्रों के इस प्रकार कहने पर श्रीरामचन्द्रजी मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुए और उन्हें ग्रहण करने के पश्चात् हाथ से उनका स्पर्श करके बोले-आप सब मेरे मन में निवास करें।
गम्यतामिति तानाह यथेष्टं रघुनन्दनः।
मानसाः कार्यकालेषु साहाय्यं में करिष्यथ
तब रघुकुलनन्दन राम ने उनसे कहा- इस समय तो आपलोग अपने अभीष्ट स्थान को जाएं परंतु आवश्यकता के समय मेरे मन में स्थित होकर सदा मेरी सहायता करते रहें।
अथ ते राममामर्न्त्य कृत्वा चापि प्रदक्षिणम।
एवमस्त्विति काकुत्स्थमुक्त्वा जग्मुर्यथागतम् ।।
तत्पश्चात् वे श्रीराम की परिक्रमा करके उनसे विदा ले उनकी आज्ञाके अनुसार कार्य करने की प्रतिज्ञा करके जैसे आये थे, वैसे चले गये। इसके बाद श्रीराम ने विश्वामित्र जी से पूछा सामने वह सघन वृक्ष से घिरा स्थान किसका है जहां मेघ आनंदपूर्वक उमड़-घुमड़ रहे हैं। श्रीराम के प्रश्नों का उत्तर देते हुए विश्वामित्र जी कहते हैं कि यह वामन देव की तपस्थली है जिनकी कृपा से आपका मन स्थिर हुआ और आपने इन दिव्यास्त्रों को ग्रहण किया।