– पारिवारिक मूल्य, पिता-बच्चों का रिश्ता, अकाउंटेबिलिटी और जीवन की यथार्थपरक भावनाएं
Patna : जब भी भोजपुरी सिनेमा का जिक्र होता है, तो अक्सर हमारे जेहन में फूहड़ता, दो-अर्थी संवाद और अश्लील गानों की तस्वीर उभरती है। लेकिन इस रूढ़िवादी छवि को तोड़ने और भोजपुरी माटी को एक नया गौरव दिलाने का बीड़ा उठाया है, पटना के युवा फिल्मकार, लेखक, निर्माता और निर्देशक प्रशांत रंजन ने। कोरोनाकाल की पृष्ठभूमि पर बानी उनकी फिल्म “बोध” सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि सिनेमाई अनुशासन और संवेदनशीलता का एक अनूठा दस्तावेज है, जो आज बिहार और भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में सराही जा रही है। फिल्में एक साथ बिहार के शहरी परिवेश, गांव का माहौल, खानपान, कॉलेज कैंपस, मीडिया की स्थिति आदि की झलक भी मिलती है। जागरण फिल्म महोत्सव के अंतर्गत पटना के सिने पोलिस में फिल्म दिखाई गई तो सीट से अधिक संख्या में दर्शक सीढ़ियों पर बैठकर और कुछ दर्शक तो खड़े होकर पूरे 2 घंटे तक जमे रहे।
बिना अश्लीलता के बांधे रखने का हुनर
लगभग दो घंटे लंबी इस फिल्म की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसमें न तो कोई फूहड़ गाना है और न ही दर्शकों को लुभाने के नाम पर कोई अश्लीलता का सहारा लिया गया है। आमतौर पर माना जाता है कि बिना मसालों के दर्शक सिनेमाघरों में नहीं टिकते, लेकिन “बोध” इस धारणा को पूरी तरह खारिज करती है। जैसे ही परदा उठता है, दर्शक अपनी कुर्सी से चिपक जाते हैं। कहानी इतनी जीवंत और अपने आस-पास की लगती है कि आप फिल्म देखते-देखते खुद को या अपने किसी अपने को उन किरदारों के बीच ढूंढने लगते हैं।
अभिनय और सहजता, चमक-दमक से परे सशक्त किरदार
प्रशांत रंजन ने इस फिल्म के लिए किसी बड़े बैनर, भारी-भरकम बजट या किसी ख्यातिप्राप्त और चर्चित स्टार-कास्ट का सहारा नहीं लिया है। फिल्म में कोई महंगे सितारे या सिंगर-से-एक्टर बने चेहरे नहीं हैं। इसके बावजूद, फिल्म देखने के बाद आप ग्लैमर और स्टारडम की सारी परिभाषाएं भूल जाएंगे। इस फिल्म के लेखक, निर्माता और निर्देशक प्रशांत रंजन ने पूरी फिल्म शूटिंग बिहार के स्थानीय कलाकारों को लेकर बिहार में ही किया, जिसका नब्बे प्रतिशत हिस्सा राजधानी पटना में शूट हुआ।
अनुशासन की सख्ती, अकाउंटेबिलिटी से लबरेज, बरगद के पेड़ की तरह अडिग और मजबूत व्यक्तित्व वाले प्रोफेसर कैलाश के सामने बड़े-बड़े स्टार्स फीके पड़ जाते हैं। एक पिता का अपने पुत्र और पुत्री के प्रति अगाध प्रेम, उनकी जिम्मेदारियां, विवशताएं और अपनों से दूर होने का दर्द इस किरदार में गहराई से झलकता है। रोहित-1 और रोहित-2 की मासूमियत, बच्चों का नटखटपन, आजाद पंछियों की तरह जीने की चाह और पिंजड़े में कैद होने के बाद भी पंख टकराकर उड़ने, चहकने और छोटी-छोटी खुशियों को बटोरने की उनकी जुगत दर्शकों का दिल जीत लेती है।
बिटिया रानी और पारिवारिक ताना-बाना
एक तरफ बिटिया रानी की हनक और दूसरी तरफ उस हनक के सामने एक पिता की कैद मासूमियत को उड़ान देने के लिए पंख लगाने की छटपटाहट बेजोड़ है। पिता और पुत्र के बीच खड़ी खामोशी की दीवार को मां के माध्यम से संवाद और चिंता में बदलना कहानी को और मजबूत करता है। साथ ही, दाम्पत्य जीवन की खट्टी-मीठी नोक-झोंक फिल्म में ताजगी और मसालेदार यथार्थ का अहसास कराती है।
“बोध” यह साबित करती है कि अगर नीयत साफ हो और कहानी में दम हो, तो बिना किसी फूहड़ता और बड़े तामझाम के भी एक उत्कृष्ट सिनेमा का निर्माण किया जा सकता है। यह फिल्म हर उस व्यक्ति को देखनी चाहिए जो परिवार, रिश्तों और अपनेपन की अहमियत को समझता है। प्रशांत रंजन ने भोजपुरी सिनेमा को जो “बोध” (समझ) दिया है, वह मील का पत्थर साबित होगा। जागरण फिल्म महोत्सव के अंतर्गत पटना के सिने पोलिस में फिल्म दिखाई गई तो सीट से अधिक संख्या में दर्शक सीढ़ियों पर बैठे रहे और कुछ दर्शक तो खड़े होकर पूरे 2 घंटे की फिल्म देखते रहे। फिलहाल पटना के दर्शकों ने भोजपुरी फीचर फिल्म बोध पर अपनी मोहर लगा दी है।
गीत: डॉ. प्रणव पराग
संगीत: सीताराम सिंह
कैमरा और एडिटिंग: पृथ्वी राज
कलाकार: गरिमा मिश्रा, नीरज कृष्ण, रचना सिंह, कुणाल रंजन, शुभम दुबे, अभिषेक तिवारी, सुभाष कृष्णा, आदर्श कुमार प्रमुख हैं।
रेटिंग : 5/5 (सार्थक और पारिवारिक सिनेमा के लिए)