इस्लामिक आक्रांताओं ने भारत के मान बिंदु माने जाने वाले मंदिरों को तोड़ा। मंदिरों को तोड़कर उसपर मस्जिदों का निर्माण कराया। लेकिन, अंग्रेजों ने भारत के इतिहास, संस्कृति व ज्ञान परंपरा के प्रति अविश्वास व आत्महीनता का भाव पैदा कर भारत के मूल पर प्रहार किया। इसे प्रज्ञाघात कहा जाता है। प्रज्ञाघात का ही परिणाम है कि लोकतंत्र के आदि देव भगवान वामन की जन्मभूमि आजाद भारत में भी 80 वर्षों तक जेल की चहारदीवारी में कैद रही।
वेदों में वर्णित भारत राष्ट्र की चेतना जब सुषुप्तावस्था में चली गयी तब भारत कमजोर होता चला गया। ‘वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः’ का उद्घोष करने वाली सिद्धाश्रम बक्सर की दिव्य भूमि को मलेच्छों के आक्रमण व अत्याचार की पीड़ा भोगने के लिए विवश होना पड़ा। सिद्धाश्रम बक्सर भगवान वामन की जन्मभूमि है। जब भारत का पुरूषार्थ कमजोर हुआ तब भगवान विष्णु के प्रथम मनुज अवतार वामन भगवान की जन्मभूमि पर भी अमानवीय अत्याचार हुए। बक्सर जेल के पास गंगा तट से प्राप्त वामन भगवान की प्राचीन पाषाण मूर्ति ऐसे अत्याचारों का प्रमाण है। वह मूर्ति फिलहाल बक्सर स्थित सीता राम उपाध्याय संग्रहालय में रखी गयी है। पुरातत्वविदों का मानना है कि वह गुप्तकालीन है।
भारत में धर्मो रक्षति रक्षितः का उद्घोष अत्यंत प्राचीन काल से होता रहा है। भारत में धर्म का अर्थ पूजा पद्धति या विश्वास नहीं होता बल्कि इसका अर्थ वह व्यवहार होता है जिससे मानव शरीर धारी मनुष्य बन जाता है। भारत ऋषियों का देश है। किसी के व्यवहार व सेवा से प्रसन्न होने के बाद यहां के ऋषि मनुर्भव का आशीर्वाद देते थे, यानी मनुष्य बन जाओ। यही कारण है कि प्राचीन काल से यहां युद्ध के भी नियम होते रहे हैं। आक्रांताओं के कारण वे सारे मानव मूल्य व नियम टूट गए।
जब भारतीय अपने मूल संस्कृति व धर्म से अलग होकर क्षुद्र स्वार्थ के चक्कर में आत्मघाती होते चले गए तब भारत का सौभाग्य भी सोता चला गया। धर्म का लोप होते ही राजा लोक विमुख आचरण में लिप्त हो गए। वहीं धर्म की हानि होने के साथ ही प्रजा व्याभिचार और अनाचार के रोग से पीड़ित हो गयी। वहीं जिस समाज पर सत्य और तप पूर्ण जीवन व्यतीत करते हुए प्रजा एवं राजा को धर्म के मार्ग पर चलाने की जिम्मेदारी थी, वे स्वयं अज्ञानता और अहंकार के अंधेरे से इस तरह से आवृत हो गए कि वे लोक से दूर होते चले गए। ऐसे में विश्वगुरु भारत के लोक की शक्ति बिखरती चली गयी। ऐसी स्थिति में मुट्ठी भर विदेशी आक्रांता भारत को रौंदते हुए आगे बढ़ते चले गए।
समाज की मानसिकता व सामूहिक शक्ति के प्रयोग के लिए निर्मित प्राचीन व्यवस्था में स्खलन हुआ तो प्रतिरोधात्मक व रक्षात्मक क्षमता भी गिरती चली गयी। जिसके परिणामस्वरूप लोकचेतना के आदि देव भगवान वामन की जन्मभूमि जैसे मान केंद्र भी जेल की चहारदीवारी में कैद कर दी गयी।
सरकार के अधिकारी व बक्सर के स्थानीय लोग भी कभी-कभी यह कहते हुए गर्व महसूस करते हैं कि भारत में बक्सर वह जेल है जहां मृत्युदंड प्राप्त कैदियों को फांसी देने वाली रस्सी तैयार की जाती है। वामन भगवान की जगह बक्सर जेल की पहचान फांसी का फंदा तैयार करने में विशेषज्ञता प्राप्त केंद्रीय कारा के रूप में हो तो यह हमारे नैतिक पतन की पराकाष्ठा है।
अंग्रेजों ने भारतीयों के लिए फांसी का फंदा बनाने के लिए पूरे भारत में इस स्थान को क्यों चूना था? यह प्रश्न सुनने में तो बहुत सरल और आसान लगता है लेकिन, इसके पीछे कई संदेश भी छीपे हुए हैं। इसके पीछे का एक उद्येश्य भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में बढ़-चढ़कर भाग लेने वाले बिहार और उत्तर प्रदेश के लोगों में भय बनाए रखना हो सकता है। वहीं अंग्रेजी राज के दस्तावेजों के आधार पर कुछ बुद्धिजीवी इसका कारण कुछ दूसरा बताते हैं।
इंडिया काउंसिल एक्ट 1861 के प्रावधानों के लागू होने के बाद 1880 में बक्सर सेंट्रल जेल की स्थापना हुई थी। उसी कालखंड में अंग्रेजों ने भारत के कुटीर उद्योगों को नष्ट करने व अपने पूर्ण नियंत्रण में लेने के लिए इंडियन फैक्ट्री लॉ बनाया। उसके अनुसार बक्सर सेंट्रल जेल को छोड़ दूसरी जगहों पर फांसी के फंदे बनाने पर प्रतिबंध लगा दिया गया। उसी कानून के तहत भारत में इसके लिए केवल एक ही जगह पर मशीन लगाई गई। वह स्थान है बक्सर स्थित केंद्रीय कारा। आजादी के बाद भी उस कानून में बदलाव नहीं किया गया जिसके कारण वर्तमान में भी फांसी के फंदे बनाने की जिम्मेदारी बक्सर केंद्रीय कार की ही है।
फांसी की सजा पाए कैदी विशेष कैदी होते हैं। उनसे कोई काम नहीं कराया जाता। जिन लोगों को फांसी की सजा आजीवन कारावास में बदल चुकी होती है या जो आजीवन कारावास की सजा भुगत रहे होते हैं, वे ही फांसी के फंदे बनाने के काम में लगाये जाते हैं। अंग्रेजी शासन में ही यहां फांसी का फंदा बनाने की मशीन लगायी गयी थी। ऐसी मान्यता है कि यह कारा गंगा के किनारे स्थित है। अतः यहां के वातावरण में फांसी के फंदे के लिए उपयुक्त रस्सी का निर्माण संभव है। लेकिन, इस प्रकार के तर्क व कथन का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। इस कारा में फांसी का फंदा बनाने वाले मशीन कब लगी। इस प्रश्न का सही-सही उत्तर देने वाले दस्तावेज अब तक सामने नही लाये गए हैं। कुछ लोगों का दावा है कि शायद स्थापना के समय यानी 1880 के आसपास ही अंग्रेजों ने यहा फांसी का फंदा बनाने वाली मशीन लगायी थी।
बक्सर केंद्रीय कारा से संबंधित एक खबर कुछ माह पूर्व बहुत वायरल हुई थी। वह खबर थी कि बक्सर केंद्रीय जेल प्रबंधन को एक बार फिर से 10 फांसी के फंदे बनाने के ऑर्डर मिले हैं। इसके साथ ही यह चर्चा होने लगी कि मृत्यु दंड प्राप्त वे कौन कैदी हैं जिनके लिए बक्सर जेल को यह काम सौंपा गया है। ऐसे में कुछ लोगों को यह जिज्ञासा हुई कि आखिर इतने विशाल भारत देश में फांसी के फंदे सिर्फ बक्सर सेंट्रल जेल में ही क्यों बनते हैं? क्या कहीं और ऐसे फंदे नहीं बनाए जा सकते? सोशल मीडिया पर तरह-तरह की चर्चा हो रही थी। जैसे- जिस तरह फांसी की सजा विरले ही किसी को मिलती है, उसी तरह फांसी के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला फंदा भी पूरे देश में केवल एक ही जगह बनता है, वो है बिहार का बक्सर केंद्रीय कारागार…
ऐसी चर्चाओं की जगह वामन भगवान की जन्मस्थली होने की तथ्य परक जानकारी यदि वायरल होती तो इस ऐतिहासिक व पुरातात्विक महत्व के स्थल का गौरव निखर कर सामने आता।
कुछ कथित विद्वान कहते हैं कि बक्सर कारा स्थल को वामन भगवान की जन्मभूमि कैसे मान लिया जाए। वैसे तो रामायण काल के पूर्व से ही सिद्धाश्रम बक्सर धर्म और अधर्म के बीच द्वंद्व का स्थल रहा है। वाल्मीकि कृत रामायण, पुराण में जो कथाएं मिलती हैं उससे पता चलता है कि गंगा व ठोरा का संगम स्थल ही वामन भगवान का प्राकट्य स्थल है। लेकिन, मैकाले की शिक्षा से उपजे इतिहासकार रामायण व पुराणों को इतिहास मानने से परहेज करते हैं। उनका कहना है कि ऐसी पौराणिक कथाओं को इतिहास मानने के लिए उसका पुरातात्विक आधार आवश्यक होता है। तो उस स्थान का संबंध वामन भगवान से था इसका प्रमाण वहां से वामन भगवान की मिली पाषण मूर्ति है। जेल के पास ही गंगा के कटाव में करीब पांच फूट की वह पाषाण मूर्ति मिली है। एक अनुमान के अनुसार वह मूर्ति गुप्तकालीन हो सकती है।
बक्सर में वामन भगवान की जन्मभूमि को लेकर अबतक अपेक्षित शोध नहीं हुए हैं। हुमायूं कालीन कई साहित्यिक स्रोतों में बक्सर के पास चौसा युद्ध के पूर्व की घटनाओं का जिक्र है।
बंगाल जीत के बाद अहंकार में बौरायी हुंमायू की सेना में शामिल अरबी सिपाहियों ने गंगा के विशाल तट पर बरगद व आम के उपवन में स्थित वामन भगवान की जन्मभूमि पर बने मंदिर को नष्ट कर दिया। इसके कारण वहां के नागरिक व साधू-संत कुपित हो गए। इसी बीच शेरशाह सूरी ने उसपर आक्रमण कर दिया। स्थानीय लोगों के सहयोग से उसने हुमायूं की सेना को बुरी तरह से पराजित कर दिया। हुमायू दिल्ली की सत्ता से बेदखल हो गया लेकिन, वामन जन्मभूमि की मर्यादा खंडित करने के बाद।
पुरातत्वविदों का मानना है कि बक्सर जेल और उसके आसपास की भूमि में पुरातात्विक महत्व की वस्तुओं के मिलने की संभावना है। यहां से पुरातात्विक महत्व की कई मूर्तियां प्राप्त हुई है जो इस स्थल पर कभी विद्यमान सांस्कृतिक, आध्यात्मिक व साभ्यतिक इतिहास पर प्रकाश डालते हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि वामन भगवान की पाषाण मूर्ति पर कुछ अभिलेख भी उत्कीर्ण हैं। बक्सर और उसके पास स्थित चौसा क्षेत्र से प्राप्त मूर्तियां, मृद्भांड, अस्त्रशस्त्र आदि इस क्षेत्र की ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक समृद्धि को दर्शाते हैं। बक्सर शहर स्थित सीताराम उपाध्याय संग्रहालय में गंगा के कटाव में प्राप्त वामन भगवान की पाषाण मूर्ति के अलावा भगवान विष्णु, शेषशायी विष्णु, सूर्य, नंदी (दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व की सबसे प्राचीन प्रतिमा) और शिव-पार्वती के विवाह (कल्याण सुंदर) से जुड़ी दुर्लभ कलाकृतियां भी रखी गयी हैं।

जब वामन भगवान का मंदिर नही रहा तब भी वामन भगवान भारत के लोक के हृदय में बसते रहे। मुंगलों के बाद अंग्रेजों का राज हुआ। गंगा और ठोरा नदी के संगम पर विस्तृत मैदान में करीब ढाई-तीन सौ वर्षों से खड़े बूढ़े बरगद के पेड को लोग ने वामन भगवान का प्रतीक मान लिया। स्थानीय लोग उसे ब्रह्मस्थान की तर्ज पर वामन स्थान भी कहने लगे थे। जेल परिसर में वह बूढा बरगद वामन भगवान का प्रतीक बनकर आज भी खड़ा है और पूजा जा रहा है।
निःसंदेह सिद्धाश्रम बक्सर प्रसिद्धि से दूर भारत का एक ऐसा दुर्लभ तीर्थ है जहां से पृथ्वी को निशाचर राज से मुक्त कराने का अभियान शुरू हुआ था। लेकिन, यह तीर्थ औपनिवेशिक मानसिकता वाले तंत्र और तुष्टिकरण पर आधारित वोट बैंक की राजनीति के कारण अपने अस्तित्व संकट के दौर से जूझ रहा है।
उस 52 बीघे यानी 32 एकड़ की भूखंड पर जेल खड़ा है, वह वास्तव में वामन तीर्थक्षेत्र का हृदय स्थल है। जेल का निर्माण तो कही और हो सकता है क्योंकि जेल से भारत की प्राचीन सांस्कृतिक यात्रा का संबंध नहीं है। सरकार की जो विकास दृष्टि रही है उसमंे भव्य वामन जन्मस्थान की जगह जी प्लस टू टाइप कैदी भवन बनाए जाने की बात हो रही हैं। ऐसे भवनों में कैदियों के लिए सारे मानवीय सुविधाओं की व्यवस्था की जा सकती है। लेकिन, वह जेल ही तो रहेगा। जेल परिसर में प्राचीन पोखर भी जिसके बारे में लोगों को बहुत कम जानकारी है। इसका संबंध भी वामन भगवान से लोग जोड़ते रहे हैं।
अंग्रेजों ने भारत के सांस्कृतिक इतिहास को समाप्त करने या तोड़मरोड़ कर प्रस्तुत करने का जो प्रयास किया था वह आजाद भारत की हमारी सरकार के दौर में न केवल जारी रहा बल्कि और जोरदार हो गया। जेल प्रशासन का कहना रहा है कि वह पोखर के किनारों पर पौधारोपण कर उसे बेहतर स्वरूप प्रदान करना जा रहा है। संभव है कि वहां कैदियों के लिए जिम, योग केंद्र व व्यायामशाला का भी निर्माण करा दिया जाए। लेकिन, उससे हमारा ओझल इतिहास तो सामने नहीं आयेगा। इसे तो विकास की अभारतीय या भारत विरोधी दृष्टि कहना अनुचित नहीं होगा।
इस प्रकार केंद्रीय कारा बक्सर का इतिहास केवल अंग्रेजों और कैदियों तक सीमित नहीं है। इससे जुड़े सांस्कृतिक, आध्यात्मिक व मानवीय पहलू भी है। सनातन मान्यताओं के अनुसार, भगवान विष्णु ने अपना पांचवां अवतार एक छोटे से बटुक के रूप में लिया। बटुक यानी पूजा, यज्ञ कराने वाले ब्रह्मचारी ब्राह्मण बालक। इसे वामन अवतार कहा गया। भारतीय वांग्मय में प्रचुर प्रमाण है कि बटुक वामन का अवतार सिद्धाश्रम यानी आधुनिक बक्सर की धरती पर हुआ था।
अपनी जन्मभूमि को ही वामन ने अपनी तपोभूमि भी बनाया। इसीलिए इसका नाम वामनाश्रम भी मिलता है। मुगलों ने इनकी जन्मभूमि को उजाड़ दिया तो अंग्रेजों ने चहारदीवारी बनाकर उसे जेल में तब्दील कर दिया। चहारदीवार में कैद होने के बाद वह स्थल लोगों की आंखों से तो ओझल हो गया लेकिन वह उनके हृदय और मन में बसता रहा।
