नवादा : सनातन धर्म में पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता प्रकट करने का पावन पर्व पितृपक्ष इस वर्ष 27 सितंबर से शुरू होने जा रहा है। इसका समापन 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ होगा। पितृपक्ष को लेकर जिले के श्रद्धालुओं और इच्छुक लोगों के बीच अभी से ही काफी गहमागहमी देखी जा रही है। लोग श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान की तैयारियों में पूरी निष्ठा से जुट गए हैं। बाजार में पूजन सामग्री जैसे तांबे के पात्र, काला तिल, कुश, गंगाजल और चावल का आटा आदि का इंतजाम तेजी से किया जा रहा है।
पितृपक्ष के विधि विधान
पितृपक्ष में पूर्वजों के निमित्त किए जाने वाले श्राद्ध और तर्पण का विशेष विधान है। श्राद्ध कर्म सामान्यतः दोपहर के समय कुतुप काल अर्थात अपराह्न काल में दक्षिण दिशा की ओर मुख करके संपन्न किया जाता है। तर्पण के दौरान तांबे के पात्र में जल, काले तिल, दूध और गंगाजल मिलाकर पितरों का नाम तथा गोत्र लेते हुए जल अर्पित किया जाता है। इसके पश्चात जौ अथवा चावल के आटे से पिंड तैयार कर विधि-विधान से पिंडदान किया जाता है। पिंडदान के बाद सात्विक भोजन तैयार कर सबसे पहले पंचबलि निकालने की परंपरा है। इसके तहत गाय, कौआ, कुत्ता, देवता और चींटियों के लिए भोजन का अंश निकाला जाता है। इसके बाद, ब्राह्मणों को भोजन कराकर, वस्त्र, अन्न तथा दक्षिणा देकर उनका आशीर्वाद लिया जाता है।
धार्मिक मान्यताएं
ब्रह्मपुराण के अनुसार आश्विन मास के कृष्ण पक्ष में यमराज पितरों को यमपुरी से मुक्त कर देते हैं। इस दौरान पितर अपने वंशजों के द्वार पर आकर पिंडदान और जल ग्रहण करते हैं। मान्यता है कि विधि-विधान से किए गए श्राद्ध और तर्पण से पितरों को तृप्ति मिलती है, जिससे प्रसन्न होकर वे परिवार को सुख, शांति, समृद्धि और आरोग्य का आशीर्वाद देते हैं। यदि किसी परिजन की मृत्यु की तिथि ज्ञात न हो, तो उनका श्राद्ध सर्वपितृ अमावस्या के दिन किया जा सकता है। इस दिन ज्ञात-अज्ञात सभी पूर्वजों का स्मरण कर तर्पण करने का विधान है।
संयम और आचरण
पितृपक्ष के दौरान श्रद्धालुओं को दैनिक आचरण और खान-पान में विशेष संयम का पालन करना अनिवार्य है। इस 15 दिन की अवधि में पूर्णतः शाकाहारी भोजन का सेवन करना होता है। साथ ही बाल कटवाने, दाढ़ी बनवाने और किसी भी प्रकार के मांगलिक कार्यों जैसे विवाह या गृहप्रवेश से पूरी तरह परहेज किया जाता है। लोग अपना अधिकांश समय धार्मिक कार्यों, दान-पुण्य और पितरों के स्मरण में व्यतीत करें। सर्वपितृ अमावस्या के बाद ही पुनः शुभ व मांगलिक कार्यों की शुरुआत होगी।
पितृपक्ष की तिथियां
27 सितंबर- प्रतिपदा श्राद्ध
28 सितंबर- द्वितीया श्राद्ध
29 सितंबर- तृतीया श्राद्ध
30 सितंबर- चतुर्थी और पंचमी श्राद्ध
01 अक्टूबर- षष्ठी श्राद्ध
02 अक्टूबर- सप्तमी श्राद्ध
03 अक्टूबर- अष्टमी श्राद्ध
04 अक्टूबर- नवमी श्राद्ध
05 अक्टूबर- दशमी श्राद्ध
06 अक्टूबर- एकादशी श्राद्ध
07 अक्टूबर- द्वादशी श्राद्ध
08 अक्टूबर- त्रयोदशी श्राद्ध
09 अक्टूबर- चतुर्दशी श्राद्ध
10 अक्टूबर- सर्वपितृ अमावस्या।
भईया जी की रिपोर्ट