नई दिल्ली: दिल्ली विश्वविद्यालय के लेडी इर्विन महाविद्यालय में दिनांक मंगलवार को राजभाषा कार्यान्वयन समिति के तत्वावधान में हिंदी पखवाड़ा के अवसर पर एक गरिमामय कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य हिंदी भाषा के प्रति जागरूकता, सम्मान एवं आत्मीयता की भावना को विकसित करना तथा विद्यार्थियों में हिंदी के प्रति रचनात्मक अभिरुचि और सृजनात्मक कौशल को प्रोत्साहित करना था। कार्यक्रम में विशेष रूप से जेन इन्स्पायर फाउंडेशन के सहयोग से कवि सम्मेलन का भी आयोजन किया गया, जिसमें हिंदी साहित्य जगत के अनेक प्रतिष्ठित कवि एवं रचनाकार उपस्थित रहे।
कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। इस अवसर पर महाविद्यालय की निदेशक प्रो. नीलिमा अस्थाना, मुख्य अतिथि एवं विशिष्ट वक्ता प्रो. जितेन्द्र कुमार श्रीवास्तव, राजभाषा कार्यान्वयन समिति की संयोजिका प्रो. नीना भाटिया कॉल तथा सह-संयोजक डॉ. दिवाकर दुबे उपस्थित रहे। इसके पश्चात विद्यार्थियों द्वारा दिल्ली विश्वविद्यालय का कुलगीत प्रस्तुत किया गया।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए राजभाषा कार्यान्वयन समिति की संयोजिका प्रो. नीना भाटिया कॉल ने हिंदी पखवाड़े के आयोजन की प्रासंगिकता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि हिंदी पखवाड़े का आयोजन करना हमारा संवैधानिक अधिकार है। उन्होंने कहा कि हिंदी पखवाड़े के माध्यम से विभिन्न प्रकार की प्रतियोगिताओं का आयोजन कर विद्यार्थियों में सृजनात्मक कौशल एवं रचनात्मक अभिव्यक्ति को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। उन्होंने हिंदी के अधिकाधिक प्रयोग और विद्यार्थियों की सक्रिय सहभागिता को इस प्रकार के आयोजनों की महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया।
महाविद्यालय की निदेशक प्रो. नीलिमा अस्थाना ने अपने संबोधन में हिंदी की वर्तमान प्रासंगिकता और डिजिटल युग में उसके बढ़ते विस्तार पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि “हिंदी प्रगति की नई उड़ान” भर रही है और डिजिटल युग में हिंदी भाषा का व्यापक स्तर पर प्रचार-प्रसार हो रहा है। उन्होंने कहा कि भाषा कोई भी हो, उसके विकास और प्रयोग के लिए लगन एवं समर्पण आवश्यक है। हिंदी आज ज्ञान-विज्ञान की भाषा के रूप में भी उभर रही है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि हिंदी के प्रचार-प्रसार एवं उसके रचनात्मक प्रयोग के क्षेत्र में लेडी इर्विन महाविद्यालय अग्रणी भूमिका निभा रहा है।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि एवं विशिष्ट वक्ता प्रो. जितेन्द्र कुमार श्रीवास्तव ने अपने संबोधन में भाषा, ज्ञान और हिंदी की भूमिका पर विस्तार से विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि हमारे समाज में यह भ्रम व्याप्त है कि अंग्रेजी ज्ञान की भाषा है, जबकि वस्तुतः कोई भी भाषा अपने आप में ज्ञान-विज्ञान की भाषा नहीं होती, बल्कि वह सम्प्रेषण का माध्यम होती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि हिंदी किसी अन्य भाषा की विरोधी नहीं है, बल्कि वह सभी भाषाओं को साथ लेकर चलने वाली भाषा है।
उन्होंने भाषा के संदर्भ में आत्महीनता के स्थान पर स्वाभिमान की भावना विकसित करने पर बल दिया। अन्य भाषाओं को अपनी भाषा से अधिक प्राथमिकता देने की प्रवृत्ति पर उन्होंने सारगर्भित उदाहरण देते हुए कहा—
“किराए का घर कितना भी अच्छा हो, अपना घर नहीं होता।”
इस कथन के माध्यम से उन्होंने अपनी भाषा के प्रति आत्मीयता और सम्मान की भावना को रेखांकित किया।
प्रो. जितेन्द्र कुमार श्रीवास्तव ने हिंदी और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के संबंध पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि हिंदी का व्यापक विकास स्वाधीनता आंदोलन के साथ हुआ और इसी कारण हिंदी में स्वाधीनता की चेतना स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। उन्होंने हिंदी दिवस को केवल भाषा के उत्सव के रूप में नहीं, बल्कि स्वाधीनता की चेतना से जुड़े दिवस के रूप में देखने की आवश्यकता पर बल दिया।
मुख्य अतिथि के संबोधन के पश्चात कार्यक्रम की विशेष कड़ी कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। कवि सम्मेलन का शुभारंभ अभिषेक तिवारी जी द्वारा किया गया तथा मंच का संचालन भी उन्होंने किया। इस अवसर पर प्रो. रहमान मुसव्विर, शारिका मलिक, अभिषेक तिवारी, मनोज सिन्हा, सरिता जैन, अलका सिन्हा, डॉ. इंदु गुप्ता, शाहिद अंजुम, लक्ष्मी शंकर बाजपेयी एवं ममता किरण सहित अनेक प्रतिष्ठित कवियों एवं रचनाकारों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से श्रोताओं को भाव-विभोर किया। कवियों की विविध एवं प्रभावशाली प्रस्तुतियों ने कार्यक्रम को साहित्यिक गरिमा प्रदान की।
कार्यक्रम के अंत में राजभाषा कार्यान्वयन समिति के सह-संयोजक डॉ. दिवाकर दुबे ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। उन्होंने कार्यक्रम को सफल बनाने में सहयोग देने वाले सभी अतिथियों, वक्ताओं, कवियों, शिक्षकगण, गैर-शिक्षकगण, विद्यार्थियों तथा आयोजन से जुड़े सभी सदस्यों के प्रति आभार व्यक्त किया।