आज भी जीवित है अखंड भारत का संकल्प
स्वतंत्रता दिवस के पूर्व संध्या पर पूरे भारत में विविध प्रकार के आयोजन हो रहे हैं। कही भारत की स्वतंत्रता का उत्सव मनाया जा रहा है तो कही भारत के विभाजन की विभिषिका का स्मरण हो रहा है। अंग्रेजों ने भारत को स्वतंत्र करने के पूर्व संप्रदाय के आधार पर भारत का विभाजन कर दिया था। भारत का विभाजन कर एक अलग देश का निर्माण किया गया जिसका नाम पाकिस्तान पड़ा। इस्लाम को मानने वाले यानी मुसलमानों के लिए पाकिस्तान का निर्माण किया गया था। वहीं हिंदू और अन्य मत को मानने वाले भारत में रह गए थे।
अप्राकृतिक विभाजन का विरोध
भारत को अपनी मातृभूमि मानने वालों को यह विभाजन स्वीकार नही था। उनका कहना था कि इस संपूर्ण भारत भूमि के बिना भारत की संस्कृति, प्रकृति व इसका स्वाभाविक विकास थम जायेगा। ऐसा मानने वाले लोग धर्म सम्राट स्वामी करपात्री जी महाराज की छात्रछाया में एकत्रित हो गए और अंग्रेजी सरकार और कांग्रेस के बीच हुए समझौते के माध्यम से भारत के इस अप्राकृतिक विभाजन का विरोध करने लगे।
14 अगस्त 1947 की रात में विभाजन के भारत को स्वतंत्र करने की घोषणा की गयी। अंग्रेजों के बनाए कानून के तहत भारत के प्रथम प्रधानमंत्री बने जवाहर लाल नेहरू जश्न मना रहे थे और पुराने संसद भवन में अंग्रेज में अपना भाषण दे रहे थे। उस समय भारत के कोने—कोने में संतजन और सनातनी भारतीय शोक मना रहे थे।
14 अगस्त की रात में ही गिरफ्तार हुए थे करपात्री जी
धर्मसम्राट स्वामी करपात्री जी महाराज के आह्वान पर संपूर्ण भारत में लोग “भारत अखंड हो” के नारे लगाते हुए लोग घर से बाहर निकल गए थे। किसी भी तरह सता की बागडोर थामने की जल्दीबाजी में लगी जवाहर लाल नेहरू की सरकार की पुलिस ने 14 अगस्त की रात में ही धर्मसम्राट स्वामी करपात्री जी महाराज व उनके अनुयायियों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था। इस प्रकार वे स्वतंत्र भारत के प्रथम कैदी बने, जिनकी मांग अखंड भारत थी।
करपात्री जी महाराज ने युवावस्था में ही ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती जी से संन्यास दीक्षा ली। आजादी के पूर्व ही उन्हें ऐसा अनुमान हो गया था कि अंग्रेजों से सता लेने के लिए कांग्रेस पार्टी भारत की संस्कृति व प्रकृति के विरूद्ध कोई भी अनैतिक समझौता कर सकती है। जब मुस्लिम लीग ने 1940 में लाहौर में पाकिस्तान का प्रस्ताव पारित किया, तब स्वामी करपात्री जी ने स्पष्ट चेतावनी दी थी कि कांग्रेस अंततः इस मांग को स्वीकार कर लेगी। इसीलिए बिना देर किए करपात्रीजी ने 1940 में ही विजयादशमी के दिन अखिल भारतीय धर्मसंघ की स्थापना की। उन्होंने पूरे देश में अखंड भारत के पक्ष में सैकड़ों सभाएँ आयोजित कीं। “भारत अखंड हो” का नारा धर्मसंघ का प्रमुख घोषवाक्य बन गया।
धर्मसंघ का मूल मंत्र था—
“धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो,
प्राणियों में सद्भावना हो, विश्व का कल्याण हो।”
यह मंत्र भारत की सर्वसमावेशी संस्कृति का उद्घोष है। इसके बावजूद अखंड भारत की मांग वाले इस आंदोलन को बल पूर्वक दबाने के प्रयास हुए। कारपात्रीजी महाराज भारत के विभाजन को राष्ट्र के साथ विश्वासघात मानते थे। उन्हें लाहौर जेल भेज दिया गया था। 15 अगस्त 1947 को जब पूरा खंडित भारत प्रयोजित आजादी का उत्सव मना रहा था, तब धर्मसम्राट लाहौर जेल की काल कोठरी में बंद थे। जेल में उन्हें कठोर यातनाएँ दी गईं।
स्वतंत्र भारत के प्रथम कैदी
इस प्रकार स्वामी करपात्री जी स्वतंत्र भारत के प्रथम कैदी बने। उनके साथ सैकड़ों धर्मसंघी कार्यकर्ता भी जेल गए। उनका यह आंदोलन लगभग नौ महीने तक चला। इस दौरान पाँच हजार से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया गया था। स्वामी करपात्री जी का यह विरोध उनके आध्यात्मिक अनुष्ठान व दैनिक उपासन का अंग बन गया। जहां भी उनका प्रवचन होता था वहां अंत में एक उद्घोष अवश्य होता था। वह उद्घोष है धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो, प्राणियों में सद्भावना हो, विश्व का कल्याण हो, भारत अखंड हो।
उनके अनुसार भारत कोई राजनीतिक इकाई मात्र नहीं, बल्कि धर्मभूमि और पुण्यभूमि है। देश का विभाजन केवल भौगोलिक नहीं, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक भी था। वे मानते थे कि सत्ता हस्तांतरण के नाम पर राष्ट्र के टुकड़े कर दिए गए। आजादी के बाद भी उन्होंने संघर्ष जारी रखा। 1948 में उन्होंने अखिल भारतीय रामराज्य परिषद की स्थापना की।
यह रात अखंड भारत के संघर्ष का प्रतीक बना
14 अगस्त 1947 की वह रात इतिहास की मुख्यधारा में लगभग अनकही रह गई। लेकिन धर्मसंघ और सनातन परंपरा के अनुयायियों के लिए यह रात अखंड भारत के संघर्ष का प्रतीक है। जब देश आजादी का जश्न मना रहा था, तब एक संत जेल में बैठा यह संदेश दे रहा था कि आजादी का अर्थ केवल विदेशी शासन से मुक्ति नहीं, बल्कि राष्ट्र की अखंडता और धर्म की रक्षा भी है। धर्मसम्राट स्वामी करपात्री जी महाराज का यह संघर्ष स्वतंत्रता दिवस के इस पावन अवसर पर सभी के लिए प्रेरणा का स्रोत है।