पटना: संग्रहालय समय और संस्कृति के मध्य सेतु का कार्य करते हैं। यह स्वयं साक्ष्य हैं। इतिहास में व्यक्ति नहीं प्रमाण बड़ा होता है। प्राचीन बातों की प्रामाणिकता संग्रहालय से होती है। पश्चिम के देशों में संग्रहालय बड़े लोकप्रिय हैं। कुछेक संग्रहालय में प्रवेश के लिए एक किलोमीटर तक की लंबी लाइन लगी रहती है। उक्त विचार सोमवार को विश्व संग्रहालय दिवस के अवसर पर संस्था संधान और बीडी कॉलेज के इतिहास विभाग के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित कार्यक्रम को संबोधित करते हुए प्रो. जयदेव मिश्र ने व्यक्त किए।
पटना के बीडी कॉलेज में ‘संग्रहालयों में हमारी विरासत’ विषयक संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए बीडी कॉलेज की प्राचार्य प्रो. रत्ना अमृत ने कहा कि संग्रहालय में वस्तुओं का संग्रह देखने को मिलता है। लेकिन ये मृत्य सामग्री नहीं होते हैं। यहां के पत्थर में प्राण बसते हैं, पांडुलिपि में धड़कन सुनाई देती है और टूटा सिक्का भी पूरी अर्थव्यवस्था की कहानी बताता है। नई शिक्षा नीति 2020 में अनुभव से सीखने पर बल दिया गया है। संग्रहालय में जाने पर अतीत का प्रत्यक्ष दर्शन होता है।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता प्रो जयदेव मिश्र ने विश्व संग्रहालय दिवस के बारे में कहा कि 18 मई, 1977 को पेरिस में चार देशों ने एक मीटिंग की और इस बात पर चिंतन किया कि वैश्वीकरण के दौर में सभी देशों को जानना चाहिए। इसके लिए संग्रहालय से बेहतर कुछ नहीं हो सकता। इन लोगों ने संग्रहालय के बारे में चिंतन प्रारंभ किया। इसलिए 18 मई से संग्रहालय दिवस मनाने की परंपरा प्रारंभ हुई। संग्रहालय दिवस के कारण ही संग्रहालय के संरक्षण और उसको लोकप्रिय बनाने के प्रयास प्रारंभ हुए। आज इस अभियान में 167 देश जुड़े हुए हैं। बिहार में वैश्विक स्तर के संग्रहालय हैं। संग्रहालय सिर्फ शोधार्थियों के लिए ही नहीं बल्कि सभी के लिए आवश्यक है।
कार्यक्रम में पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय के प्राचीन इतिहास, संस्कृति और पुरातत्व विभाग की सहायक प्राध्यापक डॉ तृप्ति राय ने पॉवर प्वाइंट प्रेजेंटेशन से संग्रहालय के इतिहास और उपयोगिता पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम का मंच संचालन संधान के सचिव संजीव कुमार ने किया।