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मनोरंजन

दर्शकों से सौ प्रतिशत समर्पण मांगती है ‘अस्सी’

सिने सांकेतिकी की दृष्टि से इसमें कई बातें हैं जिन्हें फिल्म संस्थान के विद्यार्थियों को पाठ्यपुस्तक के रूप में पड़ाया जाना चाहिए। जैसे सिविल कोर्ट या शहर के लैंडमार्क को चुतराई के साथ प्रच्छन्न रूप में दिखाना, यह विवादों से फिल्म को बचाए रखने के लिए. . . .

Swatva Desk
Last updated: February 19, 2026 6:55 pm
By Swatva Desk 113 Views
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7 Min Read
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प्रशांत रंजन

सिने माध्यम की सार्थकता इस बात में सर्वाधिक है कि यह हमारे जीवन के पहलुओं को निष्ठा के साथ स्पर्श करे। यथार्थवादी फिल्में अपना कर्तव्य निभाती आ रही है और अनुभव सिन्हा की आने वाली फिल्म ‘अस्सी’ इस कड़ी को और विस्तार देने वाली है। ‘अस्सी’ ऊपरी तौर पर देखने में एक दुष्कर्म पीड़िता की कहानी, क्षमा करें व्यथा प्रतीत होती है। लेकिन, फिल्म ने अपनी बुनावट में मानव जीवन के कई कड़वे यथार्थ को अपने अंदर समेट रखा है। इंटरकट के दृश्यों से लेकर उपकथाओं को मुख्यकथा में शामिल कर लेना, इसकी पटकथा की यूएसपी है।

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फिल्म का शीर्षक एक संख्या का नाम है। यह संख्या विशेष है क्योंकि भारत में प्रतिदिन इतनी संख्या में महिलाएं दुष्कर्म की शिकार हो रही हैं। इस समस्या को लेकर पूर्व में भी फिल्में बनी हैं। तथापि, अस्सी इस दृष्टि से विशेष कि यह अपने आसपास हमारे सामाजिक जीवन के कई आयामों की पड़ताल करती है। यह फिल्म एक साथ पीड़िता की मानसिक अवस्था, परिवार की व्यथा, न्यायापालिका व पुलिस की कार्यप्रणाली, जस्टिस के अभाव में ‘मेटा जस्टिस’ या ‘सुपर जस्टिस’ की ओर समाज का झुकाव इत्यादि को संतुलन के साथ प्रस्तुत करती है।

अस्सी में अपने अनुभव का पूर्ण प्रयोग सिन्हा जी ने किया है। जैसे दिल्ली की पृष्ठभूमि पर बनी यह फिल्म छायावाद में दिल्ली को परदे में दिखाती है। दिल्ली है भी और नहीं भी है। ‘दिल्ली नहीं होने’ के अभिकल्प के पीछे फिल्मकार की मंशा इस कथा को एक सार्वभौमिक रूप देने की है, क्योंकि शहर या देश कोई भी हो, महिलाओं के प्रति अत्याचार एक सी होती है।

सिन्हा ने महिला से हुए दुष्कर्म और उसके बाद पुलिस-कोर्ट की कार्रवाई के झरोखे से कई पक्षों को स्पर्श किया है। जैसे पुलिस का ग्रे चेहरा, सत्य जानते हुए भी साक्ष्य सापेक्ष न्याय व्यवस्था, कार्तिक दा के रूप में ‘मेटा जस्टिस’ का पनपना व नष्ट होना, पीड़िता के बच्चे की मन: स्थिति, होते जेन-ज़ी को लेकर स्कूल प्राचार्य (सीमा पाहवा) की चिंता, छोले-भटुरे खाने के बहाने पिता द्वारा पुत्र को सांसारिक व्यवहार का संकेत, गुप्तचर संस्था के बॉस बासु सर (नसीरुद्दीन शाह) द्वारा एक अलग दृष्टिकोण इत्यादि कई परतें है, जिसे यह फिल्म संतुलन के साथ खोलती है।

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सिने सांकेतिकी की दृष्टि से इसमें कई बातें हैं जिन्हें फिल्म संस्थान के विद्यार्थियों को पाठ्यपुस्तक के रूप में पड़ाया जाना चाहिए। जैसे सिविल कोर्ट या शहर के लैंडमार्क को चुतराई के साथ प्रच्छन्न रूप में दिखाना, यह विवादों से फिल्म को बचाए रखने के लिए जरूरी है। कार्तिक दा (कुमुद मिश्र) की एंट्री के समय केवल उनकी आवाज व छाया का दिखना, एक निराकार शक्ति की ओर संकेत है, जो बाद में अम्ब्रेला मैन के रूप में स्थापित होता है। कोर्टरूम के दृश्य टाइट फ्रेम में हैं। हिंदी फिल्मों में सामान्यत: ऐसा नहीं होता। कैमरा किरदारों के मन को महसूसने का संकेत करता है। एक ही ​फ्रेम में दोनों पक्षों के वकील दिखते हैं, जबकि जज पृथक फ्रेम में। यहां बेंच व बार के बीच की खाई को कैमरा बताता है। रेपिस्टों को उनके परिवारों द्वारा बचाव करने के दृश्य समाज का चेहरा बेनकाब करते हैं। रावी हक्सर बार—बार कार्तिक दा के मेटा जस्टिस का विरोध करती है और उसका वह विरोध उसके अंत के साथ पूर्ण होता है।

पात्रों के संवादों के अलावा भावों से भी बातें निकलतीं है। रावी हक्सर (तापसी पन्नू) के व्यवहार में स्थिरप्रज्ञता है, जबकि बचाव के वकील का तमतमाया हुआ चेहरा दोनों पक्षों का कंट्रास्ट दिखाता है। कार्तिक दा के चेहरे के भाव से लेकर उनकी चाल—ढाल तक किरदार के अंदर के खालीपन को परिलक्षित करता है। जैसे कुछ खो गया हो उसका, जैसे शून्य में संभावना तलाश रहा हो। पीड़िता के पति का परिस्थितिजन्य परिपक्व व्यवहार और उसके बेटे का न्यायालय का चक्कर लगाते दिखाना। अस्सी के माध्यम से अनुभव ने समाज के इस पक्ष पर संभवत: पहली बार कैमरा लगाया है। तमाम विसंगतियों, विरोधाभासों, वितंडाओं व ​नैराश्य के बीच यह फिल्म एक आशा देती है, जब पीड़िता पूर्व की भांति अपनी दिनचर्या पर लौट आती है। इस प्रकार एक वृत्त पूर्ण होता है।

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निर्देशक अनुभव सिन्हा ने ‘तुम बिन’ से अपनी यात्रा शुरू कर दस, कैश व ‘रा.वन’ जैसी चालू फिल्में बनायीं। फिर कुछ ठहराव के बाद आर्टिकल15, मुल्क, अनेक व भीड़ जैसी मुद्दा आधारित यथार्थपरक फिल्में बनाने लगे। लेकिन, उसमें पूर्वाग्रह से सिक्त राजनीतिक सोच की छौंक रहती थी। जैसे ‘आर्टिकल-15’ में अपराधी की जाति बदलकर दिखाना, ‘मुल्क’ में मुसलमान समाज के विक्टिम सिंड्रॉम का महिमामंडन करना, ‘अनेक’ में उपराष्ट्रवाद की जमीन टटोलने का संकेत तथा ‘भीड़’ में कोरोना जैसी विश्वआपदा के दौरान अपनी ही व्यवस्था को कोसना आदि। ये यथार्थपरक फिल्में बन रही थीं और अनुभव राजनीतिक वैचारिकी में धंसते जा रहे थे। एक वर्ग खड़ा हो रहा था, जो फिल्मकार का नाम पोस्टर पर देखकर उनसे दूरी बनाने लगा था। देर-सबेर इसका अनुभव उन्हें हुआ। सिनेमा व समाज के हित वे इससे मुक्त हुए और हालिया फिल्म अस्सी के माध्यम से अपनी फिल्मी यात्रा को सुसंस्कृत विस्तार दिया है।

अस्सी एक सख्त फिल्म है, जो देखने के लिए साहस व सौ प्रतिशत समर्पण की मांग करती है। अनुभव सिन्हा यह बात अच्छे से जानते हैं और इसलिए रिलीज से पूर्व देश के 25 शहरों में इसके विशेष शो रखे गए, जहां स्वयं फिल्मकार मुख्य अदाकारा को लेकर लोगों के बीच जा रहे हैं और ‘अस्सी’ को एक अभियान के रूप में लेने की अपील कर रहे हैं। फिल्मों के जानेमाने माइक्रोएनालिस्ट प्रो. जय देव इसे समाज व सिनेमा के पक्ष में सुंदर पहल मानते हैं, साथ ही साथ यह एक प्रकार से फिल्मकार के लिए प्रायश्चित भी है। ‘अस्सी’ 20 फरवरी को देशभर के सिनेमाघरों में रिलीज हो रही है।

TAGGED: Anubhav Sinha, Assi, film review, new film, Tapassi Pannu
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