अटल बिहारी वाजपेयी की जन्मशताब्दी का समापन 25 दिसम्बर 2025 को हो रहा है। वहीं अटल बिहारी वाजपेयी जैसे महान कवि, पत्रकार, संगठक और नेता को गढ़ने वाले संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सौ वर्षों की यात्रा पूर्ण हो रही है। भारतीय जनता पार्टी आज अजेय बनी हुई है। इसके अजेय बनने की घोषणा कवि अटल ने वर्ष 1953 में ही कर दी थी। भारत का अंग होने के बावजूद कश्मीर में प्रवेश करने के लिए भारत के अन्य भाग में रहने वाले लोगों को परमिट लेना पड़ता था। डा.श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने बिना परमिट के ही कश्मीर में प्रवेश कर उस कानून को तोड़ा तथा एक विधान एक निशान को लेकर आंदोलन को आगे बढ़ाया। इसको लेकर जम्मू-कश्मीर की सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर श्रीनगर जेल में रख दिया था। जहां उनकी मौत हो गयी थी। जनसंघ के नेता डा.श्यामा प्रसासद मुखर्जी की जेल में हत्या के आरोप लगे थे। अपने नेता की जेल में मौत से व्यथित कवि अटल के चिदाकाश में जो भाव उमड़-घुमड़ रहे थे वे कविता बनकर मुखरित हो गए। वह कविता भारत के आने वाले कल की भविष्य वाणी बनी।
श्यामा प्रसाद की जेल में मौत के बाद ऐसा लग रहा था कि राजनीति को भारतीय संस्कृति के अनुकूल संस्कारित करने का आरएसएस का जनसंघ के रूप में किया गया प्रयास अब ठहर जायेगा। लेकिन, अपने विचार के प्रति दृढ़ युवा अटल ने पूर्ण आत्मविश्वास के साथ उद्घोष किया-
यह परम्परा का प्रवाह है, कभी न खण्डित होगा।
पुत्रों के बल पर ही मां का मस्तक मण्डित होगा।
अटल जी की कल्पना में कश्मीर भारत माता का मस्तक है। उपर्युक्त पंक्तियां अटल बिहारी वाजपेयी की ‘कोटि चरण बढ़ रहे ध्येय की ओर निरंतर’ शीर्षक वाली लंबी कविता का एक अंश है जो नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा की भविष्यवाणी है। अपनी इस कविता में अटलजी ने भारत की व्यथा और उससे उबरने के संकल्प को कथा के रूप में प्रस्तुत किया है। इस प्रकार उनकी यह कविता लंबी होती चली गयी है। इस अर्थ में यह प्रबंध काव्य ही है।
केशव के आजीवन तप की यह पवित्रतम धारा।
साठ सहस ही नहीं, तरेगा इससे भारत सारा।
यह नवगंगा तोड़ चली है बाधाओं की कारा।
एक जह्नु क्या? यहां पूर्ण पशुबल ने सिर दे मारा।
भू पर नहीं कोटि हृदयों में इसकी धार प्रबल है।
ठसे बांध रखने का पापी यतन हुआ निष्फल है।
तोड़ हिमालय चीर जटाएं चली सिन्धु की ओर।
नर, ग्राम, पुर डगर डुबाती इसका ओर न छोर।
किसने ऐसा दूध पिया जो रोके गति तूफानी।
यह जीवन का ज्वार चली उफनाती प्रखर-जवानी।
युवक हार जाते हैं लेकिन यौवन कभी न हारा।
एक निमिष की बात नहीं है चिर संघर्ष हमारा।
पृथ्वीराज की आंखें जातीं स्वप्न न उनके जाते।
भर जाते हैं घाव, दाग पर सदा अमिट रह जाते।
यह जनगंगा जनजीवन का कल्मष कलुष बहाती।
जे डूबा सो पार हो गया मुक्ति लुटाती जाती।
अटलजी के इस प्रबंध काव्य को यदि ध्यान से पढ़े तो भाजपा की वर्तमान स्थिति को लेकर एक स्पष्टता हो जाती है। भाजपा के नाल आरएसएस से बंधे हुए हैं। हजारों वर्षों की गुलामी के बाद भारत में ही भारत विरोधी जो नैरेटिव गढ़े गए है उसके उपचार के लिए उपकरण तैयार करने में सौ वर्षों की यात्रा पूरी हो गयी है। अटल बिहारी वाजपेयी और संघ के बीच दूरी को लेकर कई प्रकार की बातें होती रही है। लेकिन, कवि अटल ने तो प्रखर शब्दों में स्वयं को उस गंगा में समाहित कर देने की बात की है। वे भारत की समस्या को भारत की दृष्टि से देखते हैं। उसका समाधान भी भारत के उपकरणों से ही करने की तैयारी करते हैं। वे जब परंपरा की बात करते हैं तो उसके मूल में व्यक्ति नहीं बल्कि विचार आ जाता है। विचार तो नित्य सत्ता है जो अजर और अमर है। संभव है कि युग के प्रभाव के कारण वह अपने क्रियात्मक स्वरूप में कुछ परिवर्तन करे लेकिन उसका मूल तत्व तो कभी नहीं बदलता। परंपरा के रूप में वह सतत प्रवाहमान होता है। वर्तमान भारत की राजनीतिक आवश्यकताओं के अनुरूप नेतृत्व के लिए एक विराट व्यक्तित्व की आवश्यकता पड़ी तो उस परंपरा ने अपने ही बीच से एक व्यक्ति को आगे कर दिया। डा.श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बाद दीनदयाल उपाध्याय, अटल बिहारी वाजपेयी, लाल कृष्ण आडवाणी और अब नरेंद्र मोदी। नरेंद्र मोदी की गिनती विश्व के शक्तिशाली नेताओं में हो रही है क्योंकि इनके साथ भारत के विचार और परंपरा की शक्ति खड़ी है।
उस परंपरा और विचार ने अपने लिए कुछ लक्ष्य निर्धारित किए हैं जिसे पूर्ण करने में कई पीढ़ियां लगीं, आगे भी लगेंगी। इस विचार और परंपरा का लक्ष्य और संकल्प क्या है? इसका उत्तर अटल की के इस काव्य प्रबंध में मिलता है।
वह कपूत है जिसके रहते मां की दीन दशा हो।
शत भाई का घर उजाड़ता जिसका महल बसा हो।
घर का दीपक व्यर्थ, मातृ-मंदिर में जब अंधियारा।
कैसा हास-विलास कि जब तक बना हुआ बंटवारा?
किस बेटे ने मां के टुकड़े करके दीप जलाए?
किसने भाई की समाधि पर ऊंचे महल बनाए?
चिता भस्म पर किसने सुख के स्वर्णिम साज सजाये,
किसने लाखों के विनाश पर जय के वाद्य बजाये
किस कपूत ने पूत पंचनद को कर डाला लाल,
किसके पापों का प्रतिफल है भोग रहा बंगाल

इस विचार का लक्ष्य तो अखंड भारत की पुनर्स्थापना है। अपने लक्ष्य की ओर एक कदम बढ़ातें हुए सबसे पहले इसने भारत माता के मस्तक कश्मीर को धारा 370 जैसी बेड़ियों से मुक्त कराने एवं वहां पर एक विधान एक निशान के अपने संकल्प को पूर्ण करने का प्रचंड पुरूषार्थ किया। इसमें डा.श्यामा प्रसाद जैसे अपने सपूत को खोया। राजनीति को औपनिवेशिक मानसिकता के चंगुल से मुक्त कराने के प्रयास में अपने दूसरे सपूत दीनदयाल उपाध्याय को खो दिया। लेकिन, इसके बावजूद बिना थके, बिना रूके इसके पांव बढ़ते रहे। आपात काल जैसे प्रबंल झंझावत को पार करते हुए विचार परंपरा की यह यात्रा जब अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर हुई तब इसकी प्रबल शक्ति और पराक्रम से सम्पूर्ण विश्व अचंभित होने लगा। भारत राष्ट्र जिन रोगों के कारण कमजोर हुआ है, उसका उपचार शुरू हुआ।
आजादी के बाद भी भारत का तंत्र और पूर्व से स्थापित व्यवस्थाएं औपनिवेशिक शक्तियांे के चंगुल में फंसी रही। औनिवेशिक मानसिकता से भारत को मुक्त कराने की जगह उसे और मजबूत बनाने के षड्यंत्र में भारत बुरी तरह से फंसा रहा। ऐसे में भारत में ही भारत विरोेधी पैदा होते रहे। अकादमिक संस्थान भारत विरोधी मानसिकता वालों के मांद बनते चले गए। ऐसे में परिवारवाद, भ्रष्टाचार और तुष्टिकरण के कारण भारत की शक्ति मंद पड़ती चली गयी। यह विचित्र प्रकार की गुलामी का दौर था। अपरोक्ष रूप से भारत की सार्वभौमिकता विदेशी शक्तियों के हाथों की कठपुतली बन गयी थी। खोखले आदर्शवाद के कारण विश्वगुरू भारत की प्रतिष्ठा धुलधुसरित होती चली जा रही थी। वर्ष 1962 में चीन के साथ थोपे गए युद्ध में भारत की दुर्दशा और प्रतिष्ठा की क्षति उस खोखले आदर्शवाद का ही परिणाम था। इस काव्य प्रबंध में अटलजी ने आजाद भारत के समक्ष आने वाले संकटों को अपनी विचार पंरपरा की दृष्टि से देखने का प्रयास किया है। इस ओजपूर्ण कविता में समस्याओं के कारण और निवारण पर भी एक स्पष्टता और दृढ़ता झलकती है।
किसने आग लगाकर अपने घर में किया उजाला,
किसने निज का सुख खरीद माँ का विक्रय कर डाला
शस्य श्यामला स्वर्णभूमि क्यों हुई आज कंगाल,
किसके कारण देवभूमि में आज अभाव अकाल
जगजननी ने भीख मांगने का दुर्दिन क्यों देखा,
पुत्रों के पापों का फल है, यह न नियति का लेखा
सूर्य घिर गया अंधकार में ठोकर खाकर,
भीख मांगता है कुबेर झोली फैलाकर
डा.श्यामा प्रसाद मुखर्जी और दीनदयाल उपाध्याय के बाद कवि और पत्रकार अटल बिहारी राष्ट्रवादी राजनीति के जननेता के रूप में उभरे। इस कविता की कुछ पंक्तियां राजनेता अटल के तेवर, भविष्य की रणनीति व उनके संगठन की दिशा जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर संकेत किए हैं।
ज्ञान-केतु लेकर निकला है विजयी शंकर।
अब न चलेगा ढोंग, दम्भ, मिथ्या आडम्बर।
अब न चलेगा राष्ट्र प्रेम का गर्हित सौदा।
यह अभिनव चाणक्य न फलने देगा विष का पौधा।
भारत को दो टुकड़ों में बांट कर आजादी देने की घटना को अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कभी स्वीकार नहीं किया। अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक बाध्यता को लेकर इस पर कभी मुखर नहीं हुए लेकिन इनकी भविष्य की योजना में तो भारत को पुनःअखंड बनाना है ही। एकबार लोकसभा में अटल बिहारी वाजपेयी पर कटाक्ष करते हुए प्रश्न किया गया कि धारा 370 और राम मंदिर जैसे अपने पुराने मुद्दों को आपने विसर्जित कर दिया क्या? इस प्रश्न के उत्तर में अटलजी ने कहा था कि हम अपने संकल्प और सिद्धांत पर कायम हैं। अभी हमारे पास उतनी शक्ति नहीं कि अपने बल पर अपने इन संकल्पों को पूर्ण कर सके। लेकिन, हमारा यह दृढ़ विश्वास है कि एक दिना हमारा यह संकल्प अवश्य पूर्ण होगा। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व मंे भाजपा को मजबूत बहुमत मिला और अटलजी का वह विश्वास सत्य साबित हुआ।
तन की शक्ति, हृदय की श्रद्धा, आत्म-तेज की धारा।
आज जगेगा जग-जननी का सोया भाग्य सितारा।
कोटि पुष्प चढ़ रहे देव के शुभ चरणों पर।
कोटि चरण बढ़ रहे ध्येय की ओर निरन्तर।

अटलजी की कविता की इन पंक्तियों से जो भाव प्रकट हो रहे हैं वह उस परंपरा की ओर संकेत कर रही है जिसकी प्रखर अभिव्यक्ति नरेंद्र मोदी के रूप में हो रही है। इस परंपरा का प्रवाह आगे जारी रहेगा। अभी जो हासिल हुआ है वह तो एक पड़ाव मात्र है।
समर्थ भारत, विकसित भारत, विश्व गुरु भारत जैसे शब्द केवल साहित्यिक अलंकार के नहीं हैं। बल्कि भविष्य के भारत का संकल्प है जिसका सपना अटलजी ने बहुत पहले देखा था। पड़ोसी देश ने जब फिर से कश्मीर में निर्दोष पर्यटकों को उनका धर्म पूछ कर उनकी हत्या कर दी तब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाले भारत ने उस परंपरा को साकार कर दिखाया जिस परंपरा को अटलजी ने आगे बढ़ाया था। अटलजी की एक कविता उस महान परंपरा से अत्यंत जीवंत परिचय कराया है। बहुत पुरानी वह कविता भारत के इस जागृत परंपरा की प्रस्तावना जैसी है। आपरेशन सिंदूर की पृष्ठभूमि से साक्षात्कार कराती है।
एक नहीं, दो नहीं, करो बीसों समझौते
पर स्वतंत्र भारत का मस्तक नहीं झुकेगा।
अगणित बलिदानों से अर्जित यह स्वतंत्रता
त्याग, तेज, तप, बल से रक्षित यह स्वतंत्रता
प्राणों से भी प्रियतर यह स्वतंत्रता।
इसे मिटाने की साजिश करने वालों सेकह दो चिनगारी का खेल बुरा होता है
औरों के घर आग लगाने का जो सपना
वह अपने ही घर में सदा खरा होता है।
अपने ही हाथों तुम अपनी कब्र न खोदो
अपने पैरों आप कुल्हाड़ी नहीं चलाओ
ओ नादान पड़ोसी अपनी आंखें खोलो
आजादी अनमोल न इसका मोल लगाओ।
पर तुम क्या जानो आजादी क्या होती है
तुम्हें मुफ्त में मिली न कीमत गई चुकाई
अंगरेजों के बल पर दो टुकड़े पाए हैं
मां को खंडित करते तुमको लाज न आई।
अमेरिकी शस्त्रों से अपनी आजादी को
दुनिया में कायम रख लोगे, यह मत समझो
दस-बीस अरब डॉलर लेकर आने वाली
बरबादी से तुम बच लोगे, यह मत समझो।
धमकी, जेहाद के नारों से, हथियारों से
कश्मीर कभी हथिया लोगे, यह मत समझो
हमलों से, अत्याचारों से, संहारों से
भारत का भाल झुका लोगे, यह मत समझो।
जब तक गंगा की धार, सिंधु में ज्वार
अग्नि में जलन, सूर्य में तपन शेष
स्वातंत्र्य समर की वेदी पर अर्पित होंगे
अगणित जीवन, यौवन अशेष।
यह स्पष्ट है कि आतंकवाद व आतंकवाद के पोषक पाकिस्तान के प्रति भारत की यह नयी नीति थी जिसे लोग न्यू नार्मल कहते है। इस न्यू नार्मल से अमेरिका भी बौखला उठा था। लेकिन, भारत की परंपरा व विचार से पोषित इस नये भारत की सरकार ने अमेरिका को भी उसकी औकात दिखा दिया। अटलजी ने बहुत पूर्व अमेरिका को लक्ष्य करते हुए लिखा था कि-
अमेरिका क्या संसार भले ही हो विरुद्ध
काश्मीर पर भारत का ध्वज नहीं झुकेगा,
एक नहीं, दो नहीं, करो बीसों समझौते
पर स्वतंत्र भारत का मस्तक नहीं झुकेगा।
आपरेशन सिंदुर और बाद की कार्रवाई अटलजी की कविता को व्यावहारिक धरातल पर उतारने का एक मजबूत प्रयास है। इसने पूरे विश्व में भारत की छवि एक समर्थ देश की बना दी।