स्वतंत्रता संग्राम के दिनों से ही कांग्रेस के समानांतर बिहार की राजनीति में जयप्रकाश नारायण, कर्पूरी ठाकुर जैसे समाजवादी नेताओं का प्रभाव था। आजादी के बाद जनसंघ, हिंदु महासभा, राम राज्य परिषद जैसी राष्ट्रवादी दलों की भी सक्रियता थी। ऐसी गैरकांग्रेसी विचारधारा वाली पार्टियों के कार्यकर्ताओं की भी लंबी सूची है जो चुनावी राजनीति में अजेय रहे। कर्पूरी ठाकुर को अपना आदर्श मानकर सुख-दुख में लोगों के बीच हमेशा रहने वाले कई समाजवादी नेता लगभग तीन दशकों से अपने चुनावी क्षेत्र में अजेय बने हुए हैं।
जयप्रकाश नारायण कभी चुनाव नहीं लड़े। वहीं कर्पूरी ठाकुर भारत के प्रथम आमचुनाव से ही चुनावी राजनीति में सक्रिय हो गए थे। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद 1984 में हुए लोकसभा चुनाव में अटल बिहारी वाजपेयी, चंद्रशेखर जैसे नेताओं की तरह उनकी भी हार हुई थी। समस्तीपुर से उनकी हार को लेकर लोग भौंचक थे। लेकिन, विधानसभा के सभी चुनावों में वे विजयी रहे। प्रथम आमचुनाव 1952 से लेकर 1988 में अपनी मृत्यु तक अधिकांश समय वे बिहार विधानसभा के सदस्य रहे। उन्होंने दो बार बिहार के मुख्यमंत्री (1970-71 और 1977-79) और एक बार उपमुख्यमंत्री का पद संभाला। प्रतिपक्ष के नेता के रूप में उनकी भूमिका संसदीय इतिहास का एक स्वर्णीम अध्याय है।
कर्पूरी ठाकुर जब अपने विधानसभा क्षेत्र में होते थे तब उनके लिए वहां के सभी लोग अपने परिवार के अंग होते थे। इसमें जाति संप्रदाय का कोई भेद नहीं। सभी मतदाता उनके अपने ही थे। इस नीति के कारण उनकों अपना मानने वालों की जमात उत्तरोतर बढ़ती गयी और वे अपने जीवन के अंतिम क्षण तक विधायक बने रहे। कार्पूरी ठाकुर को अपना आदर्श मानकर अपने चुनाव क्षेत्र में काम करने वाले नेताओं की पीढ़ी अब भी बिहार की राजनीति में है। समाजवादी आंदोलन से राजनीति में आने वाले बीजेंद्र प्रसाद यादव, नरेंद्र नारायण यादव, श्रवण कुमार, राष्ट्रवादी विचार को लेकर राजनीति करने वाले जनार्दन सिंह सिग्रवाल, तारकिशोर प्रसाद जैसे नेता उस परंपरा के वाहक बने हुए हैं।
कर्पूरी ठाकुर केवल एक सुरक्षित सीट पर निर्भर नहीं रहे। इसके बजाय वे अलग-अलग क्षेत्रों से चुनाव लड़े और जीत हासिल करते रहे। प्रथम चुनाव ताजपुर से लड़े, इसके बाद समस्तीपुर, सोनबरसा और फूलपरास को भी उन्होंने अपना क्षेत्र बनाया। 1977 के फूलपरास उपचुनाव में उन्होंने कांग्रेस उम्मीदवार को 65,000 से अधिक वोटों के भारी अंतर से हराया था। यह उनकी लोकप्रियता का प्रमाण है।
भारत गणतंत्र के प्रथम आमचुनाव 1952 में युवा कर्पूरी ठाकुर ताजपुर विधानसभा क्षेत्र से सोशलिस्ट पार्टी के प्रत्याशी के रूप में चुनावी मैदान में उतरे थे। अपने प्रथम चुनाव में वे ठीक से विजयी रहे। विधानसभा चुनावों में विजय की उनकी यात्रा जीवन पर्यंत जारी रही। अपने राजनीतिक जीवन में विधानसभा चुनावों में ‘अजेय’ रहे। आपातकाल के बाद 1977 के लोकसभा चुनाव में भी वे विजयी हुए थे।
कर्पूरी ठाकुर का संसदीय जीवन बिहार और भारत की राजनीति में सामाजिक न्याय, समानता और गरीबों के उत्थान के संघर्ष का पर्याय है। उनका संसदीय जीवन टकराव की जगह समरसता, रचनात्मकता व जिम्मेदार प्रतिपक्ष के लिए एक आदर्श उदाहरण है। राजनीतिक लाभ के लिए टकराव नहीं, सहमति से बदलाव के लिए प्रयासरत कर्पूरी ठाकुर के समर्थकों में समाज के सभी वर्गों के लोग शामिल थे।
सुपौल के अजेय योद्धा बिजेन्द्र प्रसाद यादव
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जमीनी जुड़ाव, आम आदमी की समस्या का समाधान करने का ईमानदार प्रयास, सरकार में अपने प्रभाव का भरपूर उपयोग कर क्षेत्र का विकास करना, ऐसी कुछ विशेषताएं हैं जिसने बिजेंद्र यादव को अजेय बना दिया।
आजादी के बाद कई वर्षों तक सुपौल कांग्रेस का गढ़ रहा था। लोकसभा के साथ ही बिहार विधानसभा का प्रथम आम चुनाव 1952 में हुआ था जिसमें कांग्रेस के लहटन चौधरी विजयी हुए थे। बिहार में 1967 से 1972 तक कांग्रेस के विरोध में माहौल था। पहली बार 1967 में कांग्रेस बिहार में सरकार से बाहर हुई थी। लेकिन, उस समय भी सुपौल से कांग्रेस के यूू सिंह जीते थे। वहीं 1969 के चुनाव में कांग्रेस से सुपौल से लहटन चौधरी चुनाव जीते थे। आपातकाल के बाद जब कांग्रेस विरोध की लहर चल रही थी तब 1977 के चुनाव में जनता पार्टी के अमरेंद्र प्रसाद सिंह ने कांग्रेस के अमरेंद्र मिश्र को हरा दिश था। इसके बाद 1980 के चुनाव में फिर कांग्रस के उमाशंकर सिंह विजयी हुए थे। 1985 में कांग्रेस के प्रमोद कुमार सिंह विजयी हुए थे।
कांग्रेस के गढ़ पर बिजेंद्र यादव का कब्जा
वर्ष 1990 में पूरे भारत में जो राजनीतिक परिवर्तन हुए उसमें कांग्रेस काफी कमजोर हो गयी। ऐसे समय में कांग्रेस के गढ़ में समाजवादी नेता बिजेन्द्र प्रसाद यादव ने जीत का ऐसा झंडा गाड़ा कि वह आज भी शान से लहरा रहा है। वर्ष 1990 एवं 1995 में वे जनता दल की टिकट पर सुपौल से चुनाव लड़े और विजयी हुए थे। जनता दल में टूट होने के बाद वर्ष 2000 में वे लालू प्रसाद यादव की गुट से अलग हो गए और जदयू की टिकट पर चुनाव लड़े। इसबार भी वे अच्छे अंतराल से जीत गए। वर्ष 1990 से शुरू उनकी जीत का सिलसिला 2025 में भी जारी रहा। हाल ही में संपन्न 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में लगातार 9वीं बार सुपौल सीट से जीत हासिल कर बिजेंद्र प्रसाद यादव ने एक नया रिकॉर्ड बनाया है। नीतीश कुमार और भाजपा के गठबंधन का इन्हें लाभ मिलता है लेकिन अपनी छवि के कारण भी वहां के लोग इन्हें पसंद करते हैं। यही कारण है कि राजद का माई समीकरण वहां बार-बार विफल होता रहा है।
सादगी और बेदाग छवि उनकी अपनी पूंजी है जो उनके विरोध में असंतोष और आक्रोश को मुखरित नहीं होने देता। इन्होंने पिछड़ों, दलितों और गरीबों के साथ अगड़े मतदाताओं का एक ऐसा व्यापक सामाजिक गठबंधन बनाया जो जातिगत सीमाओं से ऊपर है।
सादगी की प्रतिमूर्ति नरेंद्र नारायण यादव

समाजवादी नेता शरद यादव के साथ राजनीति करने वाले नरेंद्र नारायण यादव भी अब तक कोई भी चुनाव नहीं हारने वाले नेताओं की सूची में शामिल हैं। सबसे लंबे समय तक और सबसे अधिक बार मुख्यमंत्री पद का शपथ लेने वाने नीतीश कुमार के भी अत्यंत करीबी माने जाने वाले नरेंद्र नारायण यादव 1995 में पहली बार आलमनगर विधानसभा क्षेत्र से विधायक बने थे। सादगी, राजनीतिक नैतिकता और मधुर व्यवहार में वे कर्पूरी ठाकुर की प्रतिमूर्ति माने जाते हैं। अत्यंत विनम्र और पद पाने के लिए जोड़तोड़ से दूर रहने वाले नरेंद्र नारायण यादव को बहुत दिनों बाद मंत्री बनाया गया था। मंत्री पद पर नहीं रहने के बावजूद नैतिक मूल्यों के कारण उन्हें एक प्रभावशाली विधायक माना जाता रहा है। वे बिहार सरकार में कानून और लघु जल संसाधन मंत्री भी बने। लेकिन, मंत्री पद पर आसीन होने के बाद भी उनके सहज व्यवहार में कोई बदलाव नही आया। अभिमान और आडंबर से दूर रहने वाले नरेंद्र नारायण यादव अपने मतदाताआंे के चहेते बने हुए हैं। फरवरी 2024 में वे बिहार विधानसभा के उपाध्यक्ष बने। 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव के बाद, 24 नवंबर 2025 को नरेंद्र नारायण यादव को बिहार विधानसभा का प्रोटम स्पीकर नियुक्त किया गया। प्रोटम स्पीकर के रूप में उन्होंने विधायकों को शपथ दिलाई और नए विधानसभा अध्यक्ष का चुनाव भी अपने संरक्षण में कराया। मधेपुरा की आलमनगर सीट पर हुए इस बार के चुनाव में जदयू के टिकट पर मैदान में उतरे नरेंद्र नारायण यादव ने वीआईपी के उम्मीदवार नवीन कुमार को करीब 55 हजार वोटों के बड़े अंतर से हराया। सबसे अधिक वोटों के अंतर से जितने वाले बिहार के दस विधायकांे के क्रम में प्रथम स्थान पर रूपोली से विजयी हुए जदयू के कलाधर मंडल है। वही आलमनगर से विजयी नरेंद्र नारायण यादव छठे स्थान पर थे। उन्होंने आलमनगर से लगातार 8वीं बार जीत दर्ज की है।
श्रवण के नाम लगातार जीत का रिकार्ड

जदयू के कद्दावर नेता और नीतीश कुमार के अत्यंत करीबी श्रवण कुमार पहली बार समता पार्टी के प्रत्याशी के रूप में 1995 के विधानसभा चुनाव में नालंदा से मैदान में उतरे थे। पहले चुनाव में वे विजयी रहे। तब से लेकर अब तक यानी 1995 के 11 वें विधानसभा से लेकर 2025 के 18 वें विधानसभा तक वे लगातार एक ही क्षेत्र से विधायक निर्वाचित होते रहे। काम तौर पर यह माना जाता है कि एक-दो बार किसी क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर लेने के बाद वहां विरोधियों की संख्या ज्यादा हो जाती है। इसीलिए बड़े नेता अपना निर्वाचन क्षेत्र ही बदल लेते हैं। लेकिन, श्रवण कुमार ने ऐसा नही किया। श्रवण कुमार ऐसे विधायक हैं जिन पर कोई आपराधिक मामला दर्ज नहीं है। 1995 में जब वे पहली बार विजयी हुए थे तब लालू यादव का दौर था। राजनीति में बने रहने के लिए बाहुबल के प्रयोग का सिलसिला तेज हो गया था। ऐसे में किसी जनप्रतिनिधि पर कोई मुकदमा नहीं होना बड़ी बात मानी जायेगी। लगातार आठ बार विजयी होने वाले श्रवण कुमार को बिहार के सफल विधायकों की श्रेणी में माना जाता है। नालंदा सीट को आज जेडीयू का सुरक्षित गढ़ माना जाता है। यह श्रवण कुमार के सतत प्रयास से बने मजबूत जनाधार के कारण संभव हुआ है। श्रवण कुमार वर्तमान में ग्रामीण विकास और संसदीय कार्य जैसे महत्वपूर्ण विभागों के मंत्री हैं।