जनसंघ काल में 1967 एवं 69 की जीत के बाद गयाजी में हार हुई थी। इसके बाद भी संगठन की जीवंतता बनी रही। संघ विचार परिवार के विविध संगठनों की गतिविधियां सतत जारी रही। इस लोकसंग्रह का परिणाम यह हुआ कि जनता पार्टी के विखरने के बाद संघ विचार परिवार से जुड़ी भाजपा के स्थायी समर्थकों का विशाल समूह तैयार हो गया। यही भाजपा की मूल शक्ति है। इस लोकसंग्रह को अक्षुण रखने व उसमें वृद्धि करते रहने में डा.प्रेम कुमार सफल रहे। डा. प्रेम कुमार पहली बार 1990 में जय कुमार पालित को पराजित कर गया जी के विधायक बने। तब से लेकर सभी 9 चुनावों में वे भारी मतों से विजयी होते रहे हैं। डा. प्रेम कुमार को निर्विरोध और सर्वसम्मति से बिहार विधानसभा का अध्यक्ष चुना गया।
कांग्रेस के नेतृत्व में भारत की आजादी की लड़ाई लड़ी गयी थी जिसके परिणाम स्वरूप आम मतदाताओं मंे कांग्रेस के प्रति एक भावनात्मक लगाव था। जिसके कारण भारत के प्रथम आम चुनाव में 1952 में गया शहर विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस के केशव प्रसाद विजयी हुए थे। इसके बाद द्वितीय आम चुनाव 1957 में भी गया शहर से कांग्रेस प्रत्याशी सरदार मो. लतीफुर रहमान विजयी हुए थे। आजादी के बाद भारत की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस जब औपनिवेशिक संस्कृति के संरक्षक और तुष्टिकरण के सहारे सत्ता पर काबिज रहने की नीति पर चल पड़ी तब गयाजी जैसे तीर्थ की उपेक्षा होने लगी। ऐसे में 1962 के तृतीय आम चुनाव में गयाजी के मतदाताओं ने कांग्रेस की जगह निर्दलीय श्याम बर्थवार को विजयी बना दिया। तृतीय आम चुनाव के बाद कांग्रेस के विकल्प के रूप में गया में भारतीय जनसंघ सामने आ गया। स्थापना के चौदह वर्ष बाद यानी 1939 में ही गयाजी में आरएसएस का काम शुरू हो गया था। बिहार मंे संघ के प्रथम संघचालक कृष्ण बल्लभ नारायण सिंह उपाख्य बबुआजी का गृह नगर होने के कारण आरएसएस के बड़े अधिकारियों का विशेष ध्यान इस शहर पर था। चौथे आम चुनाव मंे 1967 में गया शहर विधानसभा क्षेत्र से जनसंघ के गोपालजी मिश्र विधायक बने। इस चुनाव में बिहार में कांगेस विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी तो बन गयी लेकिन, बहुमत के अभाव में वह सरकार नहीं बना सकी थी। दो वर्ष बाद ही 1969 में फिर से विधानसभा का चुनाव हुआ था जिसमें गोपालजी मिश्र पुनः निर्वाचित हुए थे। 1972 के चुनाव में कांग्रेस ने इस सीट पर 15 साल बाद वापसी की। इस चुनाव में कांग्रेस के युगल किशोर प्रसाद को 12,054 वोट से जीत मिली। युगल किशोर प्रसाद को कुल 25,842 वोट मिले। वहीं, गोपाल मिश्र को 13,788 वोट से संतोष करना पड़ा था। इसके बाद 1977 में जब चुनाव हुआ तो फिर कांग्रेस की हार हुई और जनता पार्टी की सुशीला सहाय विधायक बनीं। मात्र तीन वर्षों में ही जब जनता पार्टी बिखर गयी तब 1980 के चुनाव में कांग्रेस के जय कुमार पालित विजयी हुए। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद भावना की लहर पर सवार 1985 के चुनाव में भी वे लगातार दूसरी बार विजयी हुए।
डा. प्रेम कुमार चुनावी राजनीति के अजेय योद्धा बने तो यह महज संयोग नहीं हो सकता है। इसके पीछे कुछ ठोस कारण भी हैं। प्रेम कुमार के सामने मजबूत सांगठनिक नेटवर्क वाली भाकपा खड़ी थी। 1985 के चुनाव में कांग्रेस के जय कुमार पालित दोबारा गया टाउन से विधायक चुने गए। इस चुनाव में जयकुमार पालित को 34,450 वोट मिले। वहीं, भाकपा के शकील अहमद खान को 26,180 वोट मिले थे। इसके बाद 1990 के चुनाव में भाजपा के प्रेम कुमार ने भकापा के शकील अहमद को 4,960 वोट से हराया। प्रेम कुमार को 27,816 वोट मिले। वहीं, शकील अहमद को 22,856 वोट मिले। इसके बाद 1995 के चुनाव में भी भाजपा के प्रेम कुमार ने भाकपा के मसूद मंजर को 7,111 वोट से हराया। फिर 2000 के चुनाव में भाजपा के प्रेम कुमार ने भाकपा के मसूद मंजर को 4,059 वोट से हराया। 2005 में बिहार में दो बार चुनाव हुए। दोनों चुनाव में भाजपा के प्रेम कुमार को जीत मिली। फरवरी 2005 के चुनाव में प्रेम कुमार का सामना भाकपा के मसूद मंजर से हुआ था। इसके बाद अक्तूबर 2005 के चुनाव में प्रेम कुमार का सामना कांग्रेस के संजय सहाय से हुआ था। प्रेम कुमार को 48,299 वोट मिले थे। वहीं, संजय सहाय को 23,208 वोट मिले। इसके बाद 2010 के चुनाव में प्रेम कुमार के निकटतम प्रतिद्वंदी भाकपा के जलालुद्दीन अंसारी थे। 2015 के चुनाव में प्रेम कुमार का सामना कांग्रेस के प्रिया रंजन से हुआ था। 2020 के चुनाव में उन्होंने कांग्रेस के अखौरी ओंकार नाथ 11,898 वोट से हराया।
डॉ. प्रेम कुमार का बचपन गरीबी में बीता था। आरएसएस के संपर्क में आने के बाद उनका आंतरिक व बाह्य व्यक्तित्व ऐसा निखरा कि उनके विरोधी भी उनकी प्रशंसा करते हैं। विनम्रता, दृढ़ता और दृढ़ संकल्प के बल पर वे संगठन को आगे बढ़ाते रहे। पुराने कार्यकर्ता जनसंघ के गयाजी से प्रथम विधायक गोपालजी मिश्र के साथ उनके संबंधों की चर्चा करते हैं। प्रेम कुमार 1977 में दिवंगत गृह मंत्री सुशीला सहाय द्वारा गैर-सरकारी निजी सहायक के रूप में नियुक्त किए गए थे। वरिष्ठों से उनके गुणों को ग्रहण करने की कला में दक्ष प्रेम कुमार ने गयाजी में एक लंबी लाइन खींच दी है। उनके पिता एक बैंक चपरासी थे। प्रेम कुमार आज भी अपने उस पुराने मकान में रात में ठहरते हैं। ऊंचाई पर पहुंचने के बाद भी अपनों के बीच उसी पुराने भाव से उठना-बैठना उनकी सहज विशेषता है जो उनकी असली ताकत है। छोटी-मोटी शिकायत के बावजूद लोग उनके साथ खड़े हो जाते हैं।
प्रेम कुमार जब पहली बार चुनावी मैदान में उतरे थे तब उनके सामने सुशीला सहाय थीं जिनसे उन्होंने राजनीति के कुछ पाठ सीखे थे। सुशीला सहाय के पुत्र व साहित्यकार संजय सहाय बताते हैं कि प्रेम कुमार नामांकन दाखिल करने से पहले सुशीला सहाय के पास गए और आशीर्वाद लिया था। प्रेम कुमार विजयी हुए थे और सुशीला सहाय चौथे स्थान पर रहीं थीं। भाकपा के दिग्गज नेता व अधिवक्ता शकील अहमद खान दूसरे स्थान पर रहे। संजय सहाय कहते हैं कि राजनीतिक संघर्षों के बावजूद, प्रेम ने खुद को गरिमापूर्ण, विनम्र और सम्मानजनक तरीके से पेश किया। 1990 से 2025 के बीच, दो छोटे अंतरालों को छोड़ दें तो प्रेम कुमार महत्वपूर्ण विभागों को संभालते दिखते हैं। कैबिनेट मंत्री, विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष और बिहार विधासभा के अध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन करने वाले प्रेम कुमार अपने आप में एक प्रतिमान हैं।