मानव सभ्यता की उन्नति और अवनति के साक्षी पुरातात्विक स्थल चिरांद तो घुप अंधेरे में इस तरह समा गया था कि इसके बारे में चिरांद की नई पीढ़ी भी अनभिज्ञ थी। सारण जिले के कालेजों और विश्वविद्यालयों में भी इसके संबंध में जानकारी रखने वाले नहीं मिलते थे। वहीं बुद्धिजीवियों का एक वर्ग ऐसा था जो चिरांद को एक मिथक और काल्पनिक कथाओं वाला स्थान सिद्ध करने पर तुला था। बुद्धिजीवियों और अकादमिक जगत के इस रवैये के कारण चिरांद का इतिहास लगभग लुप्त ही हो रहा था।

ऐसी स्थिति में सन् 2006 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के निदेशक पद से अवकाश ग्रहण करने वाले प्रसिद्ध पुरातत्वविद् डा. बी.एस. वर्मा इंग्लैंड-यात्रा से लौटने के उपरांत अपने पुत्र के साथ चिरांद आए थे। इंग्लैंड में किसी ने उनसे चिरांद की चर्चा कर दी थी।
डा. बी.एस. वर्मा वही व्यक्ति थे, जिन्होंने पुरातात्विक स्थल चिरांद की खुदाई कराई थी जिसमें नवपाषाण काल से लेकर विभिन्न कालखंडों की सभ्यताओं के अस्तित्व के रूप में अवशेषों की प्राप्ति हुई थीं।
जब खुदाई हो रही थी, तब मेरी अवस्था बहुत छोटी थी। उतनी छोटी सी उम्र में मेरी बुद्धि पुरातत्व और इतिहास की गूढ़ बातों को समझने और ग्रहण करने की स्थिति में नहीं थी। खोदे गए गढ़ों में घुसकर खेलने की इच्छा जरूर होती थी। गांव के बच्चों की धामा-चौकड़ी के कारण उत्खनन कार्य में परेशानी होती थी। इस परेशानी को दूर करने के लिए डा.वर्मा ने अनूठा तरीका निकाला। वह छपरा शहर जाते थे और वहां से लेमन चूस और बिस्कुट आदि लेकर आते थे और बच्चों में प्यार से उसे बांटते थे। रात के समय वे गांव के कुछ बड़े बच्चों को निःशुल्क शिक्षा भी दते थे। इस प्रकार उनके साथ बच्चों की बानरी सेना खड़ी हो गयी थी।

मस्जिद की सुरक्षा के बहाने विध्न डालने वालों को उनसे उलझने की हिम्मत नहीं होती थी क्योंकि गांव के लोग उनके प्रबल समर्थक हो गए थे। लेकिन, खुदाई को अब वर्षों बीत गए थे और बातें कुछ-कुछ समझ में आने लगी थीं। गांव के लोगों से पता चला कि जिस व्यक्ति ने चिरांद की खुदाई कराई थी वे पुनः यहां की स्थिति देखने आए हैं। पुरातात्विक स्थल, जहां बी.एस. वर्मा के आने की बात पता चली, वह मेरे घर से थोड़ी ही दूर पर हैै। मैं अनायास ही वहां पहुंच गया। श्री वर्मा खुदाई स्थल को देख रहे थे और स्थानीय लोगों की भीड़ उन्हें घेरे खड़ी थी। बहुत दिनों बाद गांव के लोग उनको अपने बीच पाकर खुश थे।
मैंने भी उन्हें सुना, वे द्रवित थे और कह रहे थे- देश के बाहर के लोग जिस स्थल के बारे में जानना चाहते हैं, यहां के लोगों में कोई जिज्ञासा ही नहीं? उन्होंने लोगों को बताया कि जब वे इंग्लैंड में थे तो कैसे लोगों ने उनसे चिरांद के विषय में पूछा था। कितनी बड़ी बात हो गई थी कि जिस स्थान के बारे में सुदूर परदेस में बैठा कोई व्यक्ति जानकारी चाह रहा है, उसी स्थान पर, उस स्थान के प्रति लोगों में कोई भाव नहीं है। वे इस स्थिति से बेहद दुःखी थे और उन्होंने कुछ लोगों को आगे आकर चिरांद के लिए कुछ करने का सुझाव दिया।

मैंने पहली बार उनकी बातों में, उनकी भावनाओं में और उनकी आंखों में चिरांद का दर्शन इतनी प्रतिष्ठा के साथ किया था। तब मुझे लगा कि चिरांद के लिए सचमुच कुछ किया जाना चाहिए। अलग बात है कि जब करने चला, तो वह कुछ, बहुत कुछ बन गया। मेरे दिलोदिमाग में चिरांद के उत्थान, उसे वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाने और उसे आध्यात्मिक, सांस्कृतिक व ज्ञान-विज्ञान शिक्षा पर्यटन क्षेत्र के रूप में विकसित करने के लिए योजनाएं उमड़ने-घुमड़ने लगी थीं। लेकिन, यह एक अकेले की बात नहीं थी, और इस कार्य के लिए कोई साथी दूर-दूर तक नजर नहीं आ रहा था। फिर भी मैंने प्रयास आरंभ किया।

मैंने कुछ ही दिनों पूर्व दैनिक जागरण के स्थानीय संवाददाता के रूप में कार्यारंभ किया था। मुझे यह बात खटकी कि स्थानीय अखबारों में भी चिरांद के बारे में खबरें प्रकाशित नहीं हो रही थीं। अनजान लोग अनजान ही थे और जानने वाले अपनी स्मृति खो रहे थे। मैंने चिरांद के बारे में खबर लेखन आरंभ किया।
कुछ ही दिनों में सिर्फ दैनिक जागरण में प्रकाशित होने वाली खबर, पटना से प्रकाशित होने वाले सभी अखबारों में नजर आने लगी थी। मेरे प्रयास का पहला चरण पूरा हो चुका था और इसने रंग भी लाया। लेकिन वह रंग अभी इतना चटक नहीं हो सका था कि कुछ प्रभाव डाल सके। सीमित स्तर पर ही छपरा में अब चिरांद के बारे में अखबारों के स्थानीय संस्करणों में खबरें प्रकाशित होने लगी। लेकिन, खबर तो तब बनती हो जब कोई कार्यक्रम हो। चिरांद को लेकर संगोष्ठी या दूसरे प्रकार का कार्यक्रम आयोजित नहीं होता था। कुछ खबरें बनने लगी तो सारण का प्रायः हर व्यक्ति तक चिरांद नाम से अवगत होने लगा।।
चिरांद के बारे में मीडिया तो सजग हो चुकी थी लेकिन आगे के प्रयास अब भी सामर्थ्य व सहयोगी के अभाव में रूके थे। इसी बीच, वर्ष 2007 में दैनिक जागरण के छपरा ब्यूरोचीफ के रूप में श्री कृष्णकांत ओझा जी आए। उनके सामने से भी चिरांद की खबरें गुजरीं। जब गुजरीं तो वे चौंक गए। इतना बड़ा स्थल और इतना चर्चाहीन ? वे चकित थे कि बिहार में होते हुए इस स्थल से पूरी तरह परिचित नहीं थे।
उन्होंने जब इस स्थल के विकास के लिए मुझे प्रेरित किया तो मेरी सोच वाले प्रयास, मूर्त रूप में सामने आने लगे। यह चर्चा चली कि जब तक सांगठनिक प्रयास नहीं होगा, चिरांद को उसका हक दिलाने में परेशानी होगी।
इसी बीच 2008 में मकरसंक्रांति के अवसर पर चिंतक व विचारक आरएसएस के क्षेत्र प्रचारक स्वांत रंजन जी का चिरांद आगमन हुआ। गंगा, सरयू और सोन नद के संगम का दर्शन करते ही उन्होंने कहा था कि यह बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। इसके गौरव को पुनर्स्थापित करने के लिए सुनियोजित कार्य करना पड़ेगा। इसके बाद चिरांद विकास परिषद की स्थापना हुई।
इस स्थल के महत्व की जानकारी आरएसएस के तत्कालीन सहकार्यवाह माननीय दत्तात्रेय होसबाले जी तक पहुंची। उस समय वे पटना में निवास करते थे। उनका संरक्षण व मार्गदर्शन हमेशा मिलता रहा। उनके संरक्षण का ही परिणाम था कि 35-40 वर्षों बाद चिराद का उत्खनन रिपोर्ट हमारे हाथों में है। यह नहीं होता तो यहां का गौरवशाली अतीत प्रामाणिकता के अभाव में इतिहास का अंग नहीं माना जाता। इस रिपोर्ट के आधार पर अकादमिक जगत के सामने हम यह कहने की स्थिति में हैं कि चिरांद केवल मिथक नहीं है। बल्कि लोककथाओं में बसने वाली यह स्थल भारत के प्राचीन समृद्ध इतिहास और ज्ञान परंपरा की भूमि रही है। रामायण में वर्णित कथाओं को यह स्थान पुरातात्विक आधार प्रदान करता है। बुद्धिजीवियों के संगठन प्रज्ञा प्रवाह के रामाशीष सिंह का कई बार यहां प्रवास हुआ। उनके मार्गदर्शन में कई संगोष्ठियां आयोजित हुई। इससे चिरांद को प्रकाश में लाने के प्रयासों को बल मिला था।
चिरांद विकास परिषद् के मूर्त रूप लेने के बाद तो जैसे मेरे प्रयासों को पर ही लग गए। कुछ सामर्थ्य भी विकसित हुआ और कुछ साथी भी मिल गए। परिषद् से जुड़े साथियों व चिरांद का हित चाहने वाले प्रबुद्धजनों के सहयोग से चिरांद में धार्मिक आयोजन कराने की योजना बनी, ताकि इस स्थल का महत्व लोक के सामने लाया जा सके। योजना के अनुसार, वर्ष 2008 में 2 जून को गंगा, सरयू व सोन के संगम पर स्थित चिरांद में गंगा महाआरती का आयोजन किया गया। चिरांद के बंगाली बाबा घाट पर पहली बार हुए इस आयोजन का उद्घाटन बिहार राज्य के तत्कालीन लोक स्वास्थ्य एवं अभियंत्रण मंत्री श्री अश्विनी चौबे ने किया और करीब 30 हजार की भीड़ एकत्र हुई।
इस मौके पर परिषद् के माध्यम से पहली बार सारण के लोगों ने गंगा को प्रदूषण मुक्त किए जाने की बात सोची-समझीं और फिर इसके लिए संकल्प भी लिया। परिषद् के आग्रह पर काशी से आए आचार्य श्री राजेश कौशिक ने पहली बार यहां विधि-विधानपूर्वक गंगा महाआरती करायी, जो अब हर वर्ष यहां आते हैं।

परिषद् के प्रयास से हुए आयोजन में पधारे मंत्री श्री चौबे ने चिरांद में मुक्ति धाम योजना, जलापूर्ति योजना के साथ ही अन्य विकासात्मक कार्यों की घोषणा की और तब पहली बार चिरांद के लोगों को भी लगा कि चिरांद विकास परिषद्, अपने नाम के अनुरूप चिरांद का विकास करने वाली संस्था है। वरना, इसके पहले इस संस्था के बारे में भी लोगों के मन में तमाम तरह के भ्रम बने हुए थे, जिसका निराकरण उस आयोजन ने कर दिया।
चिरांद के विकास के संकल्प को पूर्ण करने के लक्ष्य के साथ स्थापित परिषद् ने अपनी आंखें सदैव खुली रखी हैं। इन्हीं सजग और खुली आंखों ने जब यह देखा कि पुरातात्विक स्थल चिरांद के संरक्षित क्षेत्र में अवैध रूप से भवन का निर्माण हो रहा है तो इस बात की जानकारी विभागीय पदाधिकारियों को दी गयी। बाद में पता चला कि वह विभाग के द्वारा ही निर्मित हो रहा था, तब लोग इस विभागीय लापरवाही पर विस्मय में पड़ गए थे। मीडिया ने भी इस मुद्दे पर परिषद् का साथ दिया और विधानसभा की प्रत्यायुक्त समिति के अध्यक्ष व तरैया के राजद विधायक रामदास राय ने स्थल निरीक्षण किया। उन्होंने जांच की अनुशंसा की और तत्काल ही भवन तोड़ने का निर्देश हो गया। तब, छपरा के विधायक जनार्दन सिंह सिग्रीवाल कला संस्कृति एवं युवा विभाग मंत्री थे।
इसी बीच दैनिक जागरण ने चिरांद को केंद्र में रखकर लगातार स्टोरी प्रकाशित करना का सिलसिला शुरू कर दिया। विशेष खोज और शास्त्रीय संदर्भ के साथ दैनिक जागरण में प्रकाशित होने वाले आलेख जागरण के सभी संस्करणों में छपते थे। उस समय दर्जनों महत्वपूर्ण आलेख प्रकाशित हुए थे जिन्हें संकलित कर दिया जाए तो एक अच्छी पुस्तक हो सकती है। कुछ लोग इसे जागरण की अभियानी पत्रकारिता कहने लगे थे। इससे चिरांद की चर्चा बिहार और बिहार के बाहर के बुद्धिजीवियों में होने लगी। इसके बाद टाइम्स आफ इंडिया जैसे समाचारपत्रों ने इस पर अपना पूरा पेज दिया था।
चिरांद की खबरों व उससे जुड़ी आलेखों पर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की नजरें पड़ने लगी। इसी बीच चिरांद विकास परिषद के अध्यक्ष और पत्रकार कृष्ण कांत ओझा से चिरांद को लेकर उनकी बात हुई। अनौपचारिक बातचीत में ही उन्होंने कह दिया था कि हम चिरांद जरूर जायेंगे। सन् 2010 की फरवरी माह में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का सारण प्रवास के दो दिनों का कार्यक्रम बना तो उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे पुरातात्विक स्थल चिरांद देखने जायेंगे। परिषद् के प्रयास व न्योता पर वे कुछ समय निकालकर चिरांद आए। जब आए तो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की भी आंखें चिरांद को तकते हुए कुछ देर के लिए ठहर-सी गयीं।
मात्र दस मिनट का उनका कार्यक्रम था लेकिन वे वहां दो घंटे तक रहे। चिरांद स्थित प्राचीन अध्योध्या मंदिर गए। उसका सैकड़ों साल का इतिहास जाने। गंगा के तट पर पैदल ही भ्रमण किया। कटाव से बचे हुए टिलों का निरीक्षण किया। स्थानीय लोगों के साथ बातचीत के क्रम में जब उन्हें गगा के कटाव की जानकारी मिली तब मौके से ही उन्होंने जल संसाधन विभाग के अधिकारियों से बात की और तत्काल कटाव निरोधी कार्य का निर्देश दिया।
दरअसल, तीन नदियों के तट पर अवस्थित चिरांद में हर वर्ष कटाव होता रहता है और यह तब भी जारी था जब मुख्यमंत्री का आगमन यहां हुआ था। संवेदनशील मुख्यमंत्री ने इस स्थिति की गंभीरता को समझा और तत्काल निरोधात्मक कार्रवाई का आदेश दिया ताकि कटाव से पुरातात्विक स्थल चिरांद को क्षति न पहुंचे।
इस मौके पर उन्होंने चिरांद विकास परिषद् द्वारा लगायी गयी चित्र-प्रदर्शनी का भी अवलोकन किया और चिरांद के विकास के लिए अन्य योजनाएं व कार्य का भी आश्वासन चिरांदवासियों को दिया था। नीतीश कुमार चिरांद पुरातात्विक स्थल का निरीक्षण करने वाले प्रथम मुख्यमंत्री थे। दरोगा राय, अब्दुल गफूर, लालू प्रसाद यादव, राबड़ी देवी जैसी मुख्यमंत्रियों का संबंध इस क्षेत्र से रहा है लेकिन, उनका कार्यक्रम नही बना।
कुछ ही दिनों बाद, मुख्यमंत्री के निर्देश के आलोक में बिहार की कला संस्कृति मंत्री सुखदा पांडेय यहां आयीं। उनके साथ विभागीय सचिव के.पी. रामय्या भी थे। 25 सदस्यीय टीम ने चिरांद का निरीक्षण किया और रिपोर्ट के साथ राजधानी लौट गयी। निराश करने वाली बात है कि इस संबंध में आगे की कार्रवाई अधूरी ही है।

परिषद के आग्रह पर पूर्व उपमुख्यंत्री सुशील कुमार मोदी ने भी चिरांद का दौरा किया था। परिषद के कार्यालय में कार्यकर्ताआंे के साथ आत्मीयता से बात करते हुए उन्होंने कहा था कि इसमें सेवा और संस्कार से संबंधित परियोजना को भी शामिल करिए।
यह तो हुई चिरांद के लिए सरकार व विभाग द्वारा किए गए प्रयास की कहानी, जो परिषद् के प्रयास से ही बनी। लेकिन, परिषद् ने चिरांद के विकास का जिम्मा सिर्फ सरकार व विभाग पर नहीं छोड़ा, वह अनवरत इसके लिए संघर्षरत है। चिरांद के उत्थान के लिए किया जा सकने वाला हर प्रयास परिषद् कर रही है। परिषद की वेबसाइट पर चिरांद के बारे में विस्तृत जानकारी संग्रहित की गयी है, ताकि सुदूर बैठे लोगों को भी चिरांद के बारे में सूचनाएं निरंतर मिल सके। इसके साथ ही, चिरांद से संबंधित एक पुस्तक के प्रकाशन की भी योजना परिषद् की है, ताकि चिरांद से संबंधित वृहद जानकारी उपलब्ध हो सकेे।
चिरांद विकास परिषद् के प्रयासों का कोई अंत नहीं है, तब तक जब तक कि पुनः चिरांद की पहचान कायम न हो जाए। यह वैश्विक स्तर पर स्थापित न हो जाए, पाठ्यपुस्तकों में इसे स्थान न मिल जाए, और जब तक कि इसे पर्यटनस्थल न घोषित कर दिया जाए।
सनातनियों के लिए पूजनीय ग्रंथ श्रीमद्भागवत गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है- यतो धर्मः ततो जय, अर्थात जहां धर्म है, वहां जीत अवश्य होती है। और, चिरांद तो धर्म नगरी रही ही है, स्वयं भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण की लीला भूमि! फिर, इस धर्मनगरी के उत्थान के लिए किया गया प्रयास भला निरर्थक कैसे जा सकता है? समय लग रहा है। काम मंे लगे लोगों के धैर्य की परीक्षा हो रही है। सुपरिणाम सामने आ रहे हैं। अपेक्षित परिणाम के लिए और प्रयास करने होंगे। भगवान श्रीकृष्ण गीता में ही कहते हैं- कर्मण्ये वाधिकारस्ते मां फलेषु कदाचन!
जब पीछे मुड़कर देखता हूं तो लगता है कि काम कुछ आगे बढ़ा है। एक समय था जब इस स्थान की पहचान सिर्फ बालू के वैध और अवैध करोबार के केंद्र के रूप में था। आज मां गंगे की महाआरती में लाखों की संख्या में लोग एकत्र होते हैं। श्रद्धा से शीश नवाते हैं और परम पुण्य के भागी बनते हैं। इस समारोह का नाम चिरांद चेतना महोत्सव रखा गया है। इसका उद्येश्य चिरांद के महत्व और अतीत को सामने रखते हुए वर्तमान की समस्याओं के निदान के लिए लोक चेतना का उन्मुखीकरण है। चिरांद के महत्व से हम अवगत हो गए हैं लेकिन चिरांद को सजाने-संवारने का काम अभी नहीं हुआ है।
