पटना : “यूँ तो मुँह देखे की होती है मोहब्बत सबको,
मैं तो तब जानूं मेरे बाद मेरा ध्यान रहे…”
इन मार्मिक पंक्तियों के साथ उर्दू-हिन्दी साहित्य के लोकप्रिय शायर कासिम खुर्शीद की स्मृति में बिहार संग्रहालय द्वारा एक भावपूर्ण मुशायरा ‘शम्अ-ए-सुखन’ का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम साहित्यिक संस्था ‘हमनवा’ के संयुक्त तत्वावधान में बुद्ध मार्ग स्थित पटना संग्रहालय सभागार में आयोजित हुआ। कार्यक्रम में देश के जाने-माने कवि एवं शायरों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से कासिम खुर्शीद को शायराना श्रद्धांजलि अर्पित की। मुशायरे में खुर्शीद अकबर, संजय कुमार कुंदन, सुनील कुमार तंग, अस्तित्व अंकुर, प्रेरणा प्रताप, जीनत शेख, काजिम रजा, अंकित मौर्य और सान्या राय प्रमुख रूप से शामिल रहे।
कासिम खुर्शीद की रचनाएं जीवन, समाज और समय की सच्चाइयों से जुड़ी रहीं। उनकी शायरी में सामाजिक-राजनीतिक सरोकारों के साथ-साथ प्रेम, सौंदर्य और मानवीय संवेदनाओं की गहरी अभिव्यक्ति मिलती है। हिन्दी-उर्दू के साथ-साथ अंग्रेजी भाषा पर भी उनकी सशक्त पकड़ थी। उर्दू-हिन्दी साहित्य में उनकी 20 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। इसी वर्ष सितंबर माह में हृदयगति रुकने से उनका निधन हो गया, जिसे साहित्य जगत के लिए अपूरणीय क्षति माना जा रहा है। कार्यक्रम का संचालन श्वेता सुरभि ने किया। उन्होंने सभी अतिथियों एवं शायरों का स्वागत करते हुए पुष्पगुच्छ, स्मृति-चिह्न एवं अंगवस्त्र प्रदान कर सम्मानित किया। इसके पश्चात सभी ने स्वर्गीय कासिम खुर्शीद के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित की।
कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र में बिहार संग्रहालय के महानिदेशक श्री अंजनी कुमार सिंह ने कासिम खुर्शीद को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि “कासिम साहब केवल एक शायर या लेखक नहीं, बल्कि पूरे अदबी इदारे थे। शिक्षा विभाग में अपने कार्यकाल के दौरान बिहार दिवस के अवसर पर आयोजित मुशायरों की जिम्मेदारी उन्होंने वर्षों तक पूरी निष्ठा से निभाई। उनका जाना शायरी की दुनिया के लिए बहुत बड़ी क्षति है।”
वहीं अपर निदेशक श्री अशोक कुमार सिन्हा ने कहा कि “कासिम खुर्शीद सरलता, विनय और स्नेह की प्रतिमूर्ति थे। उनकी ग़ज़लों में जीवन और समाज की सच्ची झलक मिलती है। उनके साथ बिताया गया समय और उनकी आत्मीयता हमेशा स्मृतियों में सरमाया बनकर रहेगी।”
कार्यक्रम के संयोजक एवं ‘हमनवा’ संस्था के प्रतिनिधि समीर परिमल ने इस आयोजन के माध्यम से अपनी सच्ची मित्रता निभाते हुए कासिम खुर्शीद को भावभीनी श्रद्धांजलि दी। साहित्य जगत ने इस आयोजन को एक यादगार और सार्थक पहल बताते हुए सराहा। कुल मिलाकर, ‘शम्अ-ए-सुखन’ न केवल एक मुशायरा रहा, बल्कि कासिम खुर्शीद की अदबी विरासत को स्मरण करने का एक भावुक और गरिमामय अवसर भी बना।
प्रभात रंजन शाही की रिपोर्ट