यूपी में ब्राहमणवाद की राजनीति से अब बसपा को नहीं होगा लाभ?

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प्रदेश में विधानसभा चुनाव 2022 की रणभेरी बज चुकी है और सभी दलों की ओर से अपना मिशन शुरू कर दिया गया है। चुनावी बयार बहने के साथ ही प्रदेश में जातिवाद की राजनीति ने भी जोर पकड़ना शुरू कर दिया है। अब विशेषकर राजनैतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण 13 प्रतिशत ब्राहमण समाज को अपने पाले में करने के लिए सभी दलों ने अदभुत प्रयास शुरू कर दिये हैं। जिसके कारण राजनैतिक गलियारे में कई सवाल भी खड़े हो रहे हैं हैं तथा नया चिंतन भी हो रहा है।

प्रदेश की राजनीति में सत्ता से 14 साल दूर रहने के बाद बसपा को ब्राहमण याद आ गये हैं। बसपा ने ब्राह्मण समाज को अपने पाले में करने के लिये अयोध्या से प्रबुद्ध सम्मेलनों की शुरूआत कर दी है। बसपा नेता सतीशचंद्र मिश्रा ने जिस प्रकार अयोध्या जाकर हनुमानगढ़ी और रामलला के दर्शन किये वह जरूर चौकानें वाला है तथा बसपा की विचारधारा पर कई सवालिया निशान भी खड़े हो रहे हैं। प्रदेश में जातिवाद की राजनीति का नया जहर घोला जा रहा है और बसपा को लग रहा है कि वह 2007 की तरह ब्राहमणवाद का नारा लगाकर सरकार में फिर वापसी कर सकती है, लेकिन उसकी इस सोच में इस बार कई तरह के कांटे हैं। ब्राहमण समाज का वोट पाने के लिए इस बार अब समाजवादी पार्टी और कांग्रेस भी जोर लगाने जा रही है।

यह बात तो बिलकुल सही है कि 1984 तक ब्राहमण वोटबैंक कांग्रेस के ही साथ था और सबसे अधिक ब्राहमण मुख्यमंत्री कांग्रेस ने ही दिये थे लेकिन वर्तमान समय में कांग्रेस के पास कोई भी ब्राहमण नेता नहीं है। कांग्रेस के एक बड़े ब्राहमण नेता जितिन प्रसाद बीजेपी में शामिल हो चुके हैं। कांग्रेस का संगठन भी बुरे दौर से गुजर रहा है।

63 प्रतिशत मतदाता अभी भी बीजेपी के साथ

यही कारण है कि प्रदेश की राजनीति में इस बार बीजेपी, सपा गठबंधन और बसपा के बीच त्रिकोणीय मुकाबला होने जा रहा है। बसपा की ओर से ब्राहमण सम्मेलनों की शुरूआत के बाद एक निजी कंपनी की ओर से किये गये सर्वे के अनुसार प्रदेश के 63 प्रतिशत मतदाता अभी भी बीजेपी के साथ जुड़े हुये हैं तथा वह योगी के काम से बहुत संतुष्ट हैं। बसपा और सपा ने ब्राहमण समाज के साथ हो रहे उत्पीड़न व उससे उत्पन्न हो रहे आक्रोश को आधार मानकर अपनी राजनीति को फिर से चमकाने का प्रयास किया है। बसपा को भी ब्राहमण समाज का वोट पाने के लिए अभी बहुत अधिक कार्य करना होगा और उनका भरोसा जीतने के लिए कुछ कदम उठाने ही होंगे तभी बसपा की ओर ब्राहमण समाज उन्मुख होगा नहीं तो अब यदि राजनैतिक दृष्टिकोण से देखा जाये तो बसपा के जीवन के लिये 2022 के विधानसभा चुनाव आखिरी पड़ाव भी साबित हो सकते हैं।

बसपा के राजनैतिक इतिहास में पहली बार भगवान राम व ब्राहमणों का यशोगान किया गया है। बसपा नेता सतीश चंद्र मिश्रा ने बिकरू कांड की आरोपी की पत्नी खुशी दुबे का मुकदमा लड़ने का भी ऐलान किया है। आज अपराधियों का महिमामंडन करके, उनका सम्मान करके जहां समाज के अपराधीकरण को बढ़ावा दिया जा रहा है वहीं यह साफ पता चल रहा है कि यह सभी दल वोटबैंक के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं।

हरिजन ऐक्ट ब्राहमणों पर लगे थे तब ये ब्राहमण प्रेम कहां था

ब्राहमण समाज को अभी भी याद है कि पूर्व में सपा और बसपा की सरकारों में ब्राहमण समाज पर कितने अत्याचार किये गये व उनका कितना घोर अपामन किया जाता था। सोशल मीडिया पर बसपा नेतृत्व से सवाल किया जा रहा है कि बसपा सरकार में 17842 हरिजन ऐक्ट ब्राहमणों पर लगे थे तब ये ब्राहमण प्रेम कहां था ? उप्र में ब्राहमण समाज की 126 एकड़ की भूमि पर जबरन डा. अम्बेडकर की मूर्ति लगवा दी, तिलक, तराजू और तलवार का नारा देते समय आपका ये ब्राहमण प्रेम कहां चला गया था। मनुवादी कहकर ब्राहमण समाज को गालियां दी जाती थी। यह वहीं बहिन मायावती जी हैं जिन्होंने एक साजिश करके पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी बाजपेयी जी की सरकार को मात्र एक वोट से गिरा दिया था तब उनका ब्राहमण प्रेम कहां चला गया था ? बसपा नेत्री मायावती जी के ब्राहमण प्रेम पर कई सवालिया निशान हैं जो लगातार उठ रहे हैं। यह वही बसपा नेता हैं जिन्होंने अयोध्या में बन रहे भव्य राम मंदिर पर एक भी पैसे का चंदा नहीं दिया है लेकिन बीजेपी व ट्रस्ट पर चंदाचोरी करने का आरोप लगा रहे हैं।

सोशल मीडिया पर आवाज बुलंद की जा रही है कि पहले बसपा को हरिजन ऐक्ट और आरक्षण समाप्त करने की विधिवत घोषणा करनी चाहिए। बसपा के जागे ब्राहमण प्रेम पर यह सवाल भी खड़ा हो रहा है कि क्या बसपा ने मुस्लिम तुष्टिकरण को छोड़ दिया है या फिर उन्होंने मनुस्मृति को पूरी तरह से अपना लिया है क्योकि बसपा नेत्री मायावती की राजनीति का मूल आधार ही मनुवाद की विचारधारा का विरोध रहा है। ब्राहमण समाज को यह बात ध्यान में रखनी ही होगी कि 2012 में बसपा ने मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति के अंतर्गत एक बुकलेट प्रकाशित करवायी थी जिसमें उन्होंने मुस्लिम समाज से बहुत बड़े-बड़े वादे किये थे क्या जिन्हें मायावती जी ने छोड़ दिया है।

यह वही मायावती हैं, जिन्होंने जब यूपी पुलिस ने धर्मातरण पर बहुत बड़ा खुलासा किया था और फिर जब लखनऊ के काकोरी से आतंकवादी पकड़े गये थे तब इन लोगों के पेट में दर्द हो रहा था और आंसू बह रहे थे। मायावती का मुस्लिम प्रेम भी जाग जाता है। बहिन मायावती जी की राजनीति में दोहरापन व दिखावटीपन है। बसपा नेतृत्व को यह बात असली तरह पता है कि इस बार संभवतः उन्हें मुस्लिम समाज का वोट न मिले और यही कारण है कि वह इस बार ब्राहमण और दलित समाज के गठजोड़ की राजनीति कर रही है। प्रयाग की जनसभा में बसपा नेता सतीश चंद्र मिश्रा ने किसी भी दल के साथ गठजोड़ करने से साफ मनाकर दिया है। उन्होंने कहा कि एआईएएम नेता असददुन ओवैसी के साथ तो किसी भी प्रकार का गठजोड़ नहीं किया जायेगा यह भी केवल दिखावटी घोषणा ही प्रतीत हो रही है क्योंकि उन्हें पता है कि अगर अभी ओवैसी के साथ गठजोड़ का ऐलान कर दिया जायेगा ब्राहमण समाज के बीच पैठ बनाने में उन्हें काफी समस्या हो सकती है।

बसपा नेता सतीशचंद्र मिश्रा ब्राहमण वोट बैंक के लालच में इस कदर बहक गये हैं कि वह आरोप लगा रहे हैं कि अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण करने की भाजपा की नीयत ही नहीं है क्योंकि मंदिर बन गया तो फिर उसके पास वोट मांगने को कोई मुददा रह ही नहीं जायेगा। बसपा नेता सरासर बकवास पर उतर आये हैं क्योंकि उन्हें पता चल गया है कि अभी भी ब्राहमण समाज पूरी तरह से बीजेपी के साथ है।

अयोध्या में सर्वाधिक राम मंदिर का विरोध सपा, बसपा और कांग्रेस ने ही किया

देश के समस्त संत समाज व हिंदू समाज को यह अच्छी तरह से पता है कि राम मंदिर निर्माण के लिए सबसे अधिक वास्तविक संघर्ष किसने किये किन लोगों ने लाठी गोली खायी। बसपा नेता सतीशचंद्र मिश्रा को यह बताना होगा कि जब अयोध्या कारसेवकों पर गोलियां बरसायी जा रही थीं तब तुम सब लोग कहां थे और आपका ब्राहमण प्रेम कहां था? यह एक कटु सत्य है कि आज बीजेपी की ही सरकार में भव्य राम मंदिर का निर्माण कार्य प्रारंभ हो गया है।

प्रदेश में अभी तक जितने भी सर्वे आये हैं उनमें अभी भी 63 प्रतिशत ब्राहमण समाज बीजेपी के ही साथ है यही कारण है कि यह जातिवाद की जहरीली राजनीति करने वाले सभी दल बौखला गये हैं। अयोध्या में सर्वाधिक राम मंदिर का विरोध सपा, बसपा और कांग्रेस ने ही किया है और यह दल धुर हिंदू विरोधी रहे हैं। अब इन दलों के पास कोई मुददा नहीं रह गया है। कांशीराम तो अयोध्या में शौचालय और अस्पताल आदि बनवाने की बात कहते थे, हिंदू जनमानस को यह बात याद रखनी होगी।

जतिवाद की जहरीली राजनीति के बीच एक खबर यह भी आयी है कि अखिल भारतीय ब्राहमण महासभा का कहना है कि जब फूलन देवी की प्रतिमा लगायी जा सकती है तो फिर कानपुर के गैंगस्टर बिकरू कांड के आरोपी विकास दुबे और श्रीप्रकाश शुक्लाजैसे माफिया की प्रतिमा क्यों नहीं लगवायी जा सकती जिसके बाद सभी दलों के हाथ पांव फूल गये है। अगर आज देश व प्रदेश के राजनैतिक दल अपनी विचारधाराओें के अनुरूप फूलन देवी , विकास दुबे और श्रीप्रकाश शुक्ला के ही अपना आदर्श मानने लग गये तो फिर विकासवाद की राजनीति और देश के भविष्य का बंटाधार होना तय है। अतः अब समय आ गया है कि प्रदेश का प्रबुद्ध आगे आकर जातिवाद की जहरीली राजनीति पर लगाम लगाये तभी देश व प्रदेश विकासवाद की राजनीति पर चलेगा।

मृत्युंजय दीक्षित

swatva

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