बिहार में थर्ड फ्रंट बनने की इनसाइड स्टोरी

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राजनीति को संभावनाओं का खेल कहा जाता है, इस खेल में कब कौन सी बाजी सही हो जाए यह तय नहीं होता है। इसी खेल में रोचकता पैदा करने के लिए दिल्ली विधानसभा चुनाव के बाद बिहार की राजनीति में थर्ड फ्रंट बनाने की कवायद तेज हो गई है। दरअसल दिल्ली चुनाव में आम आदमी पार्टी के प्रचंड जीत के सूत्रधार रहे राजनीतिक रणनीतिकार, पॉलिटिकल मर्चेंट प्रशांत किशोर ने राष्ट्रवाद और हिंदुत्व की राजनीति करने वाली विश्व की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी भाजपा को करारी शिकस्त देने में अहम भूमिका निभाई।

दिल्ली चुनाव में प्रशांत किशोर की भूमिका के बारे में बात करते हुए आप नेता संजय सिंह ने कहा प्रशांत किशोर ही कहे थे कि इस चुनाव को स्थानीय चुनाव के तौर पर लड़ना है। आप के कोई नेता भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर बयानबाजी नहीं करेंगे। जहाँ भी जाएंगे वहां एक सवाल ज़रूर करेंगे कि भाजपा का दिल्ली में सीएम फेस कौन है ? और हुआ भी यही , परिणाम आने के बाद ख़बरों में एक खबर कॉमन थी कि ‘ केजरीवाल ने चुनाव प्रचार के दौरान नरेंद्र मोदी को मुद्दा नहीं बनाये।

स्थानीय मुद्दे के साथ जाएंगे चुनावी मैदान में

केजरीवाल के द्वारा स्थानीय मुद्दे पर चुनाव लड़कर प्रचंड जीत हासिल करने के बाद आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर बिहार में स्थानीय मुद्दे के साथं चुनाव में जाने की तैयार शुरू हो गई है। इसको लेकर गठबंधन की तिकड़ी बनने लगी है। नई तिकड़ी कन्हैया कुमार और जाप के अध्यक्ष व पूर्व सांसद राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव को लेकर है। अभी हाल ही में दोनों ने भागलपुर और बांका में संयुक्त सभाएं भी कर चुके हैं। जहाँ उन्होंने सरकार पर हमला तो बोला ही विकल्प में तलाश में खुद को मजबूत स्तम्भ होने का दावा भी किया।

55 सीटों पर तैयारी शुरू

जानकारी के अनुसार बेगूसराय से लेकर किशनगंज तक पप्पू यादव ने जाप के प्रत्याशियों की करीब 55 सीटों पर काम करना शुरू कर दिया है। इसको लेकर उन्होंने कन्हैया कुमार से बात की है। कन्हैया ने उन्हें आश्वस्त किया है कि वे बराबर उनके साथ रहेंगे। मुमकिन है कि मुस्लिम वोट के तुष्टिकरण करने में लगे असदुद्दीन ओवैसी का भी साथ मिल सकता है। नाम का खुलासा नहीं करने की शर्त पर जाप नेता ने कहा कि नागरिकता कानून, एनआरसी और एनपीआर को लेकर इन तीनों नेताओं के प्रति सीमांचल में ज्यादा विश्वास देखने को मिल रहा है। तथा इस विश्वास का फायदा उठाने का यह सुनहरा अवसर है।

निजी महत्वाकांक्षा

इस गठबंधन को जमीन पर उतारने का सबसे महत्वपूर्ण कारण यह भी है कि राजद को अपने तरीके से चलाने वाले नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव नहीं चाहते हैं कि बिहार में युवा नेता के तौर पर कन्हैया कुमार और पप्पू यादव अपने आप को स्थापित कर सकें। तेजस्वी के इस इरादे इरादे को साकार करने में राजद की नई टीम सलीके से काम कर रही है।

राजद के प्रदेश अध्यक्ष जगदानंद सिंह प्रशांत किशोर की भूमिका को स्पष्ट कर चुके हैं कि पीके गंदी नाली का कीड़ा है। राजद को पीके की ज़रूरत नहीं है। जगदानंद का यह बयान दो दृष्टिकोण से बहुत मायने रखता है। पहला कारण यह है कि प्रशांत किशोर रणनीति बनाने के साथ सक्रीय राजनीति में कदम रख चुके हैं। इस लिहाज से तेजस्वी के लिए जमीन तैयार कर रहे जगदानंद सिंह नहीं चाहते हैं कि कोई वैसा व्यक्ति  तेजस्वी का प्रतिद्वंदी बने जो दूसरों के काम का क्रेडिट लेता हो। दूसरा कारण जगदानंद सिंह और प्रशांत किशोर दोनों एक ही जिले से ताल्लुक रखते हैं। अगर पीके राजद से जुड़ते हैं तो बक्सर में उनकी जमीन खिसक सकती है। इसलिए निजी महत्वाकांक्षा के कारण जगदानंद सिंह हमेशा पीके का विरोध ही करेंगे।

उत्कृष्ट स्तर का राजनीतिक संघर्ष

राजद के नए प्रदेश अध्यक्ष जगदानंद सिंह नहीं चाहते हैं कि तेजस्वी युग के राजद में महागठबंधन के नाम पर रालोसपा, हम और वीआईपी की जरुरत है। जगदानन्द के खेल को समझे तो उनका प्लान यह है कि भाजपा, जदयू और लोजपा एक साथ, राजद कांग्रेस एकसाथ बाद बाकी बिहार की राजनीति में जितनी भी पार्टियां हैं, सभी एकसाथ मिलकर चुनाव लड़े। अगर चुनाव तक इस तरह का सीन बन जाता है तो बिहार विधानसभा चुनाव में राजनीतिक संघर्ष का उत्कृष्ट स्तर देखने को मिल सकता है।

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