भाजपा-जदयू में तलवार खिंची, सुशील मोदी चुप

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भाजपा-जदयू में तलवार खिंची, असर पड़ेगा विस चुनाव पर
पटना के हाहाकार में मचा राजनीतिक गदर, सुमो चुप
पीके का बोलना मायने रखता है
 जद-यू और भाजपा में पहले से ही ख्ंिाची म्यान से तलवार अब आमने-सामने होने लगी है। ऐसा लग रहा है कि आगामी विधानसभा चुनाव होते-होते तलवार चल ही जाएगी। हालांकि इसका तात्कालिक कारण पटना में भारी जलजमाव को लेकर उत्पन्न जलालत को बताया जा रहा है, पर इसकी पृष्ठभूमि पहले से ही बनती रही है।
जलजमाव को लेकर सरकार यह फिक्स करना चाहती है कि पटना में बाढ़ के कारण जनता में जलालत है। दूसरी ओर भाजपा यह कहती रही है कि यह विशुद्व जलजमाव और नाली का वर्षों से जाम होने के कारण स्थिति उत्पन्न हुई है। मंत्री श्याम रजक, रणवीर नन्दन तथा अन्य मंत्रियों के बयान इस ओर संकेत दे रहे हैं। यही नहीं, जद-यू ने तो यहां तक कह डाला कि नगर विकास विभाग भाजपा के मंत्री के जिम्मे है। सो, जिम्मेवार भाजपा है, जद-यू नहीं। हद है। दूसरी ओर मंत्रियों का रोना यह है कि अफसर उनकी बात अथवा निर्देश मानते ही नहीं।
जद-यू के सूत्रों ने बताया कि आरसीपी के हाथों कार्यकर्ता बनाने की जिम्मेवारी ने रंग लाया है। आरसीपी ने बाजाप्ता आत्ममुग्धता में यहां तक कहा कि जद-यू के स्थापना काल से इतनी संख्या में कार्यकर्ता हुए ही नहीं। प्रेक्षक बताते हैं कि बराबर दूसरे के कंधे पर सवार होकर चुनावी वैतरणी पार करने वाला जद-यू का युद्वस्तर पर कार्यकर्ताओं की फौज खड़ी कीने के पीछे आगामी विधानसभा चुनाव अकेले लड़ने की है। भाजपा का टाॅप लेवल से सरकार पर प्रेशर है। और, नीतीश कुमार हैं कि कभी प्रेशर बर्दाश्त करते नहीं। वैसे भी, जबसे प्रशान्त किशोर इनके साथ हुए हैं तब से कार्यकर्ता बनाने की जोर बढ़ गयी है। यही कारण है कि पीके के कई रणनीतिक और धन सृजन के सूत्र भाजपा के खिलाफ होने के बावजूद भी माफ किये जाते रहे। मसलन, बंगाल में ममता दीदी के साथ जाने पर जद-यू ने उन्हें विशुद्व व्यावसायिक कारण बताया, कोई राजनीतिक कारण नहीं।
इधर, पीके का दुस्साहस यह कि गृह मंत्री अमित शाह की घोषणा के खिलाफ बिगुल फूंकते हैं कि बिहार में एनआरसी लागू नहीं होगा। सवाल यह भी उठाया जा रहा है कि पीके बोल रहे हैं अथवा बोलवाया जा रहा है। यही नहीं, कभी धारा 370 के खिलाफ बोलने वाले पीके वही बयान देते हैं जो भापजा के कोर सिद्वान्त में हैं। या यूं कहें कि उसके एजेंडे में शामिल बिन्दुओं के खिलाफ बोल कर चुप हो जाते हैं। कुल मिला कर, स्थितियां बदतर होती जा रहीं हैं। अभी यह कहना जल्दी होगी कि चुनाव में गठबंधन टूट जाएगा। पर, एलांएस में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा।
रामजेठमलानी की मृत्यु के बाद रिक्त पद भाजपा के लिए छोड़ना नैतिक-व्यावहारिक राजनीतिक हिस्सा माना जा रहा है। कारण कि- लोकसभा चुनाव में भाजपा ने जद-यू को महत्व देते हुए 17 सीटों की कुर्बानी दी थी। खसकर, उन सीटों पर भी जहां इसकी जीत सुनिश्चित थी। उदाहरण के तौर पर सीतामढ़ी जहां चुनाव के अंत में भाजपा क्या आरएसएस के खानदानी नेता सुनील कुमार पिन्टू को टिकट देना पड़ा। पह भी, पार्टी बदल कर जद-यू से। मतलब, आत्मा भाजपा-आरएसएस की और चोला जद-यू की।
इधर, श्याम रजक की बाॅलिंग से उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी एक सहमे हुए बाढ़ पीड़ित की तरह चुप हैं। बोलने के लिए फिलहाल उनके पास कुछ है भी नहीं। न पूछने के लिए कुछ।

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