भारतीय क्रांति के जनक लोकमान्य तिलक के अस्ताचल के सौ साल

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भारतीय स्वाधीनता संग्राम का एक प्रबल तेजस्वी सूर्य जब अस्ताचल को जा रहा था तो वह अपनी प्रखर ऊष्मा के संरक्षण में अपने पीछे एक पावन सूर्योदय को प्रकट कर चुका था और वह पावन सूर्योदय कोई और नहीं बल्कि राष्ट्रपिता गाँधी थे।

बाल गंगाधर तिलक का देहावसान 1अगस्त 1920 को हुआ लेकिन उन्होंने इसकी पूर्ण तैयारी दिसंबर 1919 में ही कर ली थी।

गांधी जी ने लोकमान्य तिलक को आधुनिक भारत का निर्माता कहा

दरअसल, यह महत्वपूर्ण घटना दिसम्बर 1919 के अमृतसर में हुए कांग्रेस अधिवेशन की है। भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन के इतिहास में यह अधिवेशन नेतृत्व की दृष्टि से सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। भारतीय स्वाधीनता संग्राम को नेतृत्व के आधार पर हम दो भागों में देख सकते हैं। पहला लोकमान्य तिलक जी का भाग है और दूसरा महात्मा गाँधी जी का। यही कारण था कि मरणोपरान्त श्रद्धांजलि देते हुए गांधी जी ने उन्हें (लोकमान्य तिलक) आधुनिक भारत का निर्माता कहा था और जवाहरलाल नेहरू ने भारतीय क्रान्ति का जनक बतलाया था। इस अमृतसर के अधिवेशन में स्वयं तिलक ने अपनी शारीरिक अवस्था को ख्याल करते हुए आगे के स्वाधीनता संघर्ष के नेतृत्वकर्ता के रूप में गाँधी को स्वीकार किया था।

जब तिलक ने देश का राजनैतिक भविष्य गाँधी के हाँथों में सौंप दिया

कांग्रेस के इस अमृतसर अधिवेशन की व्यवस्था का उत्तरदायित्व स्वामी श्रद्धानंद जी के ऊपर था। स्वामी श्रद्धानंद जी के निकट सहयोगी रहे उनके छोटे बेटे इन्द्र पत्रकारिता के पेशे में थे, उन्होंने इस अधिवेशन की आँखो देखी रिपोर्टिंग बड़े ही सीधे सीधे शब्दों में की है, “तीनों में से कौन सा पक्ष जीतेगा, प्रारम्भ में यह बात सदिंग्ध सी मालूम होती थी, परंतु कांग्रेस अधिवेशन से दो दिन पूर्व जब अमृतसर के बाजारों में लोकमान्य तिलक का जुलूस निकला तो कम से कम मेरे मन में उनके प्रस्ताव की विजय के प्रति कोई सन्देह बांकी न रहा। मैने जुलूस तो सैकड़ों देखे परन्तु उतना असली जोश और जीवित उत्साह मुझे शायद ही किसी में मिला हो।

लगभग चालीस वर्ष के बलिदानमय जीवन ने तिलक महाराज का, भारतवासियों के हृदय में वह स्थान बना दिया था जो पुराने देवी देवताओं का बन जाया करता है। बहुत से पंजाबियों ने इससे पूर्व लोकमान्य तिलक के दर्शन भी न किए थे। वे तो यह जानते थे कि तिलक नाम का एक स्वाधीनता का देवता है जिसकी पूजा करनी चाहिए. .. बाजार में नरमुंड ही नरमुंड दिखाई देते थे। हरेक व्यक्ति तिलक महाराज की जय के नारों से आकाश फोड़ रहा था….उस जुलूस ने कांग्रेस के अन्य सब कार्यक्रम को मात दे दी थी। उस समय यह निश्चित हो गया था कि कांग्रेस के अधिवेशन में तिलक महाराज के सामने कोई नेता न ठहर सकेगा।”

कांग्रेस के अमृतसर अधिवेशन में देश की आगामी राजनीतिक रणनीति के बारे में तीन भिन्न-भिन्न प्रस्ताव थे। पहला प्रस्ताव महात्मा गाँधी का था, जिसमें वे बिना शर्त अंग्रेजी सत्ता की घोषणाओं का स्वागत करने और शासन का सहयोग करने को राजी थे। दूसरा प्रस्ताव लोकमान्य तिलक का था, जिसमें वे अंग्रेजी सत्ता से सावधान रहते हुए ‘प्रतियोगी सहयोग'(रिसपेंसिव कोऑपरेशन) की बात रखी थी। वहीं तीसरा प्रस्ताव अंग्रेजी शासन को धोखेबाज मानते हुए उसके सम्पूर्ण विरोध का था, जिसके नेता देशबंधु चितरंजनदास थे। इस अधिवेशन में तिलक ने खुद को पीछे करके देश का राजनैतिक भविष्य गाँधी के हाँथों में सौंप दिया था।

इन्द्र विद्यावाचस्पति ने इसकी रिपोर्टिंग करते हुए लिखा है, “यह सर्वसम्मत बात थी कि लोकमान्य तिलक अड़ने वाले आदमी थे। जीवन भर उन्होंने विरोधी शक्तियों का सीधे खड़े होकर मुकाबला किया, कभी अणु मात्र भी झुकने का नाम नहीं लिया। अमृतसर में पहली बार वे समझौते के लिए तैयार हो गए। यह देखकर लोकमान्य के अनेक शिष्यों को दुख और आश्चर्य हुआ। वे लोग तिलक महाराज की सेवा में पहुंचे और जिज्ञासा की कि महाराज आप समझौता क्यों करते हैं ? खुले अधिवेशन में आपकी जीत निश्चित है। इस जिज्ञासा का लोकमान्य तिलक ने जो उत्तर दिया उसके पूरे शब्द तो मुझे याद नहीं परंतु अभिप्राय मेरे हृदय में बड़ी स्पष्टता से अंकित है।

उनका अभिप्राय था, ‘मैं अब शारीरिक दृष्टि से वृद्ध हो गया हूँ। मुझे जो कुछ कहना था कह चुका हूँ। अब आवश्यक है कि देश का नेतृत्व दूसरे हाथों में जाए। वह व्यक्ति जिसके हाथों में मुझे नेतृत्व सम्हालने की शक्ति दिखाई देती है, वह गाँधी है। इसी कारण मैने गाँधी का संशोधन स्वीकार कर लिया है। देश की बागडोर अब उसी के हाँथ में जाएगी।’ उस समय लोकमान्य तिलक के उस कथन से उनके समर्थकों को पूरा सन्तोष नहीं हुआ था। परंतु समय ने बतलाया कि लोकमान्य तिलक को उनके भक्त जितना बड़ा समझते थे, वे उससे बहुत बड़े थे। वे महान भी थे और भविष्यदर्शी भी।”

इस अधिवेशन के कुछ माह बाद ही तिलक जी का देहत्याग हो गया। लेकिन उनके जीवन के इस महत्वपूर्ण घटनाक्रम (अमृतसर अधिवेशन) ने उनके स्थान पर उन्हीं की राह को आगे बढ़ाने वाला देश को एक सर्वमान्य नेता दे दिया।

एक शासक स्वयं से श्रेष्ठ शासक का निर्माण करे

यहां सर्वाधिक महत्वपूर्ण यही है कि यदि हम ना केवल राष्ट्रीय बल्कि सार्वभौमिक मानव समाज के रूप में उत्तरोत्तर प्रगति की ओर बढ़ना चाहते हैं तो इसके लिए आवश्यक है कि सभी अपने दायित्वों का पूर्णतः पालन करते हुए आगामी पीढ़ी को उत्कृष्ट दायित्ववान के रूप् में निर्मित करे। जैसे – एक शिक्षक स्वयं से श्रेष्ठ शिक्षक का निर्माण करे, एक शासक स्वयं से श्रेष्ठ शासक का निर्माण करे, एक नेता स्वयं से श्रेष्ठ नेता का निर्माण करे। तिलक जी के जीवन से हम यह महत्वपूर्ण संदेश प्राप्त करते हैं कि उन्होंने एक नेता के रूप् में स्वयं के स्थान पर एक उत्कृष्ट नेता को प्रस्तुत करने के बाद ही अन्तिम प्रयाण किया।

यथार्थ में यदि तिलक के स्वाधीनता संघर्ष से सम्बंधित विचारों और कार्यप्रणालियों को समझने का प्रयास किया जाए तो यह कहना सहज होगा कि गाँधी ने स्वाधीनता आन्दोलन में तिलक के जैसा महत्वपूर्ण स्थान पाकर तिलक के विचारों को विस्तारित करने का ही प्रयास किया है। इसे दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि गाँधी जी की आधारशिला लोकमान्य तिलक ही हैं।

स्वदेशी आन्दोलन के प्रमुख नेताओं में तिलक,अरविंद घोष और लाला लाजपत राय

भारतीय स्वाधीनता आन्दोलनों में गाँधी जी के आगमन से पूर्व हुए सफलतम आन्दोलनों में “स्वदेशी आन्दोलन” को गिना जा सकता है। 1905 के बंग भंग के बाद भारतीय आन्दोलनकारियों का सम्पूर्ण प्रयास विदेशी के बहिष्करण और स्वदेशी पर जोर देने का था। स्वदेशी आन्दोलन के प्रमुख नेताओं में तिलक के साथ-साथ अरविंद घोष और लाला लाजपत राय थे। हम स्पष्ट देख सकते हैं कि गाँधी द्वारा स्वतंत्रता की लड़ाई में स्वदेशी एक बड़े हथियार के रूप में प्रयोग हुआ। गाँधी जी ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ स्वदेशी पर जोर देते हुए चरखा को सुदर्शन चक्र की भाँति प्रयोग किया।

स्वराज्य हा माझा जन्मसिद्ध हक्क आहे आणि तो मी मिळवणारच

लोकमान्य तिलक को हम भारतीय “स्वराज” का सैद्धांतिक जनक कह सकते हैं। यहां हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि आजादी और स्वराज में बहुत भिन्नता है। उस समय हमें अंग्रेजी हुकूमत से आजादी तो चाहिए ही थी किन्तु बिना स्वराज के प्राप्त आजादी अराजकता में आसानी से परिणत हो जाती। तिलक ही वे पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने भारतीय जनमानस को “स्वराज” से परिचय कराया। उनके द्वारा दिया गया प्रसिद्ध नारा जो मूल में मराठी भाषा में था, “स्वराज्य हा माझा जन्मसिद्ध हक्क आहे आणि तो मी मिळवणारच” (स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर ही रहूँगा) बहुत प्रसिद्ध हुआ। आगे चलकर महात्मा गाँधी स्वयं “स्वराज” के प्रमुख पुरोधा बने।

संकीर्णताओं से बहुत ऊंचे और उदार विचारों वाले नेता

अनेक लोग लोकमान्य तिलक को रूढ़िवादी और कट्टर हिन्दू भावों वाला नेता ही मानते हैं। तिलक को ऐसा मानने वाले लोग निश्चय ही तिलक को उनकी संपूर्णता में समझने का प्रयास नहीं किया है। तिलक को ठीक-ठीक समझने वाले जानते हैं कि तिलक अनेक(भाषाई, क्षेत्रीयता, जातीयता, मजहबी आदि) संकीर्णताओं से बहुत ऊंचे और उदार विचारों वाले नेता थे। 1907 के सूरत विच्छेद की घटना के बाद से उनको गरम दल के प्रमुख नेता के तौर पर पहचाना गया। निश्चय ही उनका वैचारिक और क्रियात्मक स्वरूप उस समय तक प्रखर क्रांतिकारी और गरम था किन्तु “केसरी” मे छापे अपने तीखे लेखों के कारण उन्हें प्राप्त हुए 6 वर्ष के कठोर कारगार की सजा को पूरा करके लौटने के बाद राष्ट्रीय राजनीति में उनकी वैचारिकी ही बदल गई।

जब करनी पड़ी होमरूल लीग की स्थापना

16 जून 1914 को मांडले जेल से वापस आने पर उन्होंने देखा कि देश में स्वतंत्रता आन्दोलन धीमे पड़े हैं। कांग्रेस जड़वत हो गई है। लाला लाजपत राय अमेरिका में हैं और अरविंद घोष सन्यास लेकर पांडिचेरी चले गए हैं। ऐसी दशा में तिलक ने गरम और नरम दल के बीच के रास्ते को सफलता प्राप्ति का रास्ता मानते हुए आयरलैंड की तर्ज पर “होमरूल लीग” की स्थापना की और होमरूल आन्दोलन प्रारम्भ कर दिया। उन्होंने आवाहन किया कि, “इस बात को कहने में मुझे कोई हिचक नहीं कि भारत के विभिन्न भागों में जो हिंसात्मक घटनाएँ हुई हैं, न केवल मेरी विचारधारा के विपरीत है, बल्कि उनके कारण हमारे राजनीतिक विकास की प्रक्रिया भी धीमी हुई है।” होमरूल आन्दोलन में तिलक के सबसे बड़े सहयोगी मोहम्मद अली जिन्ना थे।

कांग्रेस-लीग समझौता

इसी आन्दोलन के दौरान तिलक पर ब्रिटिश शासन ने फिर से मुकदमा चलाया जिसमें तिलक जी की ओर से जिन्ना ने ही मुकदमा लड़ा और जीत प्राप्त की। आगे हम देखते हैं कि गाँधी जी स्वराज प्राप्ति हेतु तिलक द्वारा निर्मित इसी मध्यम मार्ग को अपना प्रमुख मार्ग बनाया। 1916 में हुए लखनऊ में कांग्रेस अधिवेशन में समावेशी राष्ट्रीय परिकल्पनाओं के आधार पर एक बड़ा कार्य “कांग्रेस – लीग समझौता” जिसे लखनऊ पैक्ट भी कहा जाता है, तिलक के ही प्रयासों से सम्पन्न हो सका था। इस दौरान लोकमान्य तिलक पर लीग के प्रति पक्षपात करने के आरोप लगाए गए।

तिलक ने इस आरोप पर कहा था, “कुछ महानुभावों का यह आरोप है कि हिन्दू अपने मुसलमान भाईयों को ज्यादा तवज्जो दे रहे हैं। मैं कहता हूँ कि यदि स्वशासन का अधिकार केवल मुस्लिम समुदाय को दिया जाए तो मुझे कोई एतराज नहीं होगा, राजदूतों को यह अधिकार मिले तो परवाह नहीं, हिन्दुस्तान ने किसी भी समुदाय को यह अधिकार दे दिया जाए हमें कोई ऐतराज नही। मेरा यह बयान समूची भारतीय राष्ट्रीय भावना का प्रतिनिधित्व करता है। जब भी आप किसी तीसरी पार्टी से लड़ रहे होते हैं, तो सबसे जरूरी होती है, आपसी एकता, जातीय एकता, धार्मिक एकता और विभिन्न राजनीतिक विचारधाराओं की एकता।” लोकमान्य के इस कथन में हम उनके मानस को भली भांति समझ सकतें हैं। आगे के भविष्य में महात्मा गाँधी इन्ही उदार भावनाओं के प्रतीक बने।

लोकमान्य तिलक जातीय भावनाओं को राष्ट्रीय जीवन के लिए बाधक समझते थे। वे भारतीय समाज की बुराईयों के प्रति सदैव मुखर थे। छुआछूत उन्मूलन के लिए आयोजित एक सम्मेलन में तिलक ने कहा था, “यदि भगवान भी छुआछूत को बरदाश्त करें, तो मैं भगवान को भी नहीं मानूँगा।” गाँधी जी का हरिजन सेवक संघ तिलक द्वारा राष्ट्रीय भावनाओं के विशाल परिदृश्य में बोए गए सुधार सम्बंधी बीजों का ही विराट रूप था।

उपाधि स्वरूप मिला नाम “लोकमान्य”

बाल गंगाधर तिलक भारत राष्ट्र के सशक्त उत्थान के अरुणोदय थे। उन्हें उपाधि स्वरूप मिला नाम “लोकमान्य” ही भारत के राष्ट्रीय जीवन मे उनकी उपस्थिति के स्वरूप को स्पष्ट करने के लिए बहुत है। उन्होंने जिस प्रकार देश की सामाजिक – सांस्कृतिक शक्ति को संगठित करने में तत्परता दिखाई, उसके प्रमाण उनके द्वारा व्यापक स्तर पर प्रारम्भ किए गए गणेशोत्सव और शिवाजी उत्सव हैं, सदैव ही प्रेरणा के केंद्र हैं। आज एक राष्ट्र के रूप में सम्पूर्ण भारत उनके प्रति चिर-कृतज्ञ है।

महेंद्र पांडेय

(लेखक काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के छात्र हैं, ये लेखक के निजी विचार हैं)

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