फिल्म रिव्यू: घुमाती है ‘घूमकेतु’

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इस साल की परेशानियों में जुड़ा एक और नाम

प्रेम कुमार पोद्दार

निर्देशक- पुष्पेन्द्र नाथ मिश्रा

कलाकार- नवाजुद्दीन सिद्दीकी, अनुराग कश्यप, रघुबीर यादव, इला अरूण

घूमकेतु (नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी) नाम का एक संघर्षरत लेखक उत्तर प्रदेश के अपने छोटे गांव से अपने सपनों के साथ मुंबई हिंदी फिल्म जगत आता है, वह खुद की सफलता के लिए खुद को 30 दिन देता है, नहीं तो वह अपने गाँव वापस लौट जाएगा। दूसरी तरफ, उसका परिवार अपने एकमात्र बेटे को लेकर परेशान रहता है। एक भ्रष्ट पुलिस (अनुराग कश्यप) को 30 दिनों के भीतर घूमकेतु को खोजने का काम दिया जाता है, अगर नहीं तो उनका तबादला कर दिया जाएगा।

फ़िल्म शुरुआत में आपको थोड़ा बाँधती है, पर समय के साथ ये ढ़ीली पड़ने लग जाती है। रंगीन कपड़ो में लिपटे लेखक हर वक्त बात करते नजर आएँगे। फ़िल्म उस लेखक के इर्द गिर्द घूमती नजर आती है जिसकी लेखनी पूरी तरह से अकल्पनीय है।

निर्देशक पुष्पेंद्र नाथ मिश्रा की निर्देशन में बनी ये फ़िल्म उनकी पहली बड़े पर्दे वाली फ़िल्म थी, पर अफसोस फ़िल्म ऑनलाइन रिलीज की गयी। घूमकेतु इस साल की परेशानियों में जुड़ा एक और नाम है। हालांकि निर्देशक ने पूरी कोशिश की है कि दर्शकों को बाँध कर रखने की, पर फ़िल्म देखने के बाद आपको महसूस होगा बाँधने के लिए सच में रस्सी की जरूरत थी।

धूमकेतु फ़िल्म को बनाया गया है सोनी पिक्चर्स के तहत, जिसका खुद का OTT है, पर फ़िल्म रिलीज की गयी ज़ी 5 पर। शायद उनको भविष्य का ज्ञान पहले से था।

निर्माता लेखक के सपनों की एक काल्पनिक दुनिया बनाने की कोशिश करते हैं जो बॉलीवुड के पैमानों पर खड़ी उतरती हो। यहां, आप न तो कहानी पर या कहानी के साथ हंसते हैं। आप बस कर सकते है तो फ़िल्म खत्म होने का इंतजार। फिल्म में रणवीर सिंह, सोनाक्षी सिन्हा और अमिताभ बच्चन द्वारा कैमियो हैं। अभिनेता अपनी संक्षिप्त भूमिकाओं में भी पूरी तरह ईमानदार हैं। लेकिन, आप संभवतः उन्हें स्थिति को बचाने की उम्मीद नहीं कर सकते हैं, क्योंकि फ़िल्म डूब चुकी है पूरी तरह से, इनकी नाव को पार कोई नहीं लगा सकता।

फ़िल्म देखने के बाद आपको ये महसूस होना तय है कि नवाजुद्दीन सिद्दीकी ऐसी फिल्मों के लिए बिल्कुल नहीं बने, हर किरदार ने हँसाने की पूरी कोशिश की, पर कमबख्त हँसी है कि आयी ही नहीं। पूरी फ़िल्म में एक ईला अरुण ही है जो फ़िल्म में अपनी अदाकारी से थोड़ी जान डालते हैं, वह इस बेवजह की कहानी के लिए कुछ वजह देती है।

फ़िल्म में एक बड़ी अच्छी लाइन कही गयी है ‘ये कॉमेडी बहुत ही कठिन चीज होती है, लोगों को हँसी भी आनी चाहिए’। शायद निर्माता खुद ही ये भूल गए।

Note: फ़िल्म देखने के बाद आप भूल सकते है कि हास्य होता क्या है?

1.5/5*

swatva

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