जब सावरकर ने गांधी को कर दिया अवाक, ऐसे आप अंग्रेजों से कैसे लड़ेंगे?

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आजादी के Unsung हीरो वीर सावरकर की आज शनिवार 28 मई को 139वीं जयंती है। इस मौके पर उनके जीवन पर बन रही फिल्म स्वतंत्र वीर सावरकर का पहला लुक रिलीज कर दिया गया जिसमें एक्टर रणदीप हुड्डा का एक अलग ही अवतार दिखा। भारतीय इतिहास कभी वीर सावरकर के प्रति ईमानदार नहीं रहा। आजादी के बाद उन्हें सरकारों द्वारा लगातार तिरस्कार और अवमानना ​​​​का पात्र बनाया गया। गांधी की हत्या में भी झूठा फंसाया गया। लेकिन सबूतों की कमी के चलते बरी कर दिया गया।

मशहूर लेखक आशुतोष देशमुख की पुस्तक से

मशहूर लेखक आशुतोष देशमुख ने वीर सावरकर से जुड़ी कई भ्रांतियों से अपनी पुस्तक Braveheart Sawarkar में पर्दा उठाया है। इसमें उन्होंने आजादी के महानायकों में सावरकर को सबसे उत्कृष्ट बताते हुए उनके खिलाफ हुई नाइंसाफी को भी सामने रखा। बीबीसी समेत देश—दुनिया के कई मीडिया संस्थानों ने उनकी शोध के आधार पर अपनी कई रिपोर्ट लिखीं। उन्हीं आशुतोष देशमुख की किताब में सावरकर और महात्मा गांधी से जुड़ा एक मशहूर किस्सा भी है जिसमें वे बापू को अपने यहां खाने पर आमंत्रित करते हैं। एक और लेखक विक्रम सम्पत ने भी इस वाकये का जिक्र अपनी किताब ‘सावरकर’ में किया है।

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बापू और सावरकर से जुड़ा रोचक किस्सा

बात उन दिनों की है जब बीडी सावरकर लंदन में अध्ययन के सिलसिले में प्रवास कर रहे थे। साल था 1906। आजादी मिलने के वर्षों में जिस महात्मा गांधी की हत्या में वीर सावरकर का नाम जानबूझकर घसीटा गया, उन्हीं मोहनदास करमचंद गांधी से सावरकर की गहरी मित्रता भी रही थी। वर्ष 1906 में गांधी तब महात्मा नहीं हुए थे।

लंदन के इंडिया हाउस में हुई थी मुलाकात

तब लंदन में इंडिया हाउस में सावरकर ने गुजराती वैश्य मोहनदास करमचंद गांधी को खाने पर बुलाया था। गांधी जब पहुंचे थे, तब सावरकर शाम का खाना बना रहे थे और इस दौरान वह झींगे तल रहे थे। प्रॉन डिश तैयार होने पर उन्होंने गांधी से खाने के लिए पूछा तो उन्होंने शुद्ध शाकाहारी होने की बात कह इनकार कर दिया। इस पर सावरकर ने गांधी को तपाक से जवाब दिया— इस तरह आप अंग्रेजी साम्राज्यवाद से कैसे लड़ेंगे? वह भी बगैर किसी पशु के प्रोटीन के?

आशुतोष देशमुख की सावरकर पर लिखी पु​स्तक में और भी कई रोचक बातों का खुलासा किया गया है। जाहिर है एक सोची समझी मानसिकता के तहत और आजादी के दौर में हावी हुए एक खास वर्ग के द्वारा ऐसा किया गया। लेकिन आशुतोष देशमुख के शोध ने उनसे जुड़ी कई भ्रांतियों को झूठ के नकाब से बाहर निकालकर धो दिया। इनमें कालापानी की सजा और सावरकर के बलिदानों की जो तथ्यपरक रिपोर्ट हुई है, वह उनको एक सच्ची श्रद्धांजलि से कम नहीं।

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