लालू के बाद यादव नेता कौन? 2019 की चुनावी करवट

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पटना : 2019 का चुनाव कई मायनों में बिहार की राजनीति में एक टर्निंग प्वाइंट साबित हो रहा है। सबसे बड़ा परिवर्तन जो मुखर होकर इस बार उभरा है, वह यह है कि 90 के दशक के बाद पहली बार बिहार में यादवों ने राजद से परे जाकर देखने की उत्कटता दिखाई है। राज्य की आबादी में 14 प्रतिशत की हिस्सेदारी रखने वाला यादव समुदाय अब 2019 के चुनाव में अपना नया और ईमानदार नेता चुनने को व्याकुल है। आइए जानते हैं कि ऐसा क्यों है? और बिहार के यादव समुदाय के पास क्या—क्या विकल्प बचते हैं?

लालू युग का उत्कर्ष और पराभव

1990 के दशक के बाद से बिहार की राजनीति पर यादव समुदाय का जबर्दस्त प्रभाव रहा है। इस दशक को लालू यादव का दशक मानें तो गलत नहीं होगा। लेकिन लालू की कारगुजारियों और उसके परिणामस्वरूप जेल में रहकर 2019 के चुनावी सीन से आउट होने की परिस्थितियों ने बिहार के यादवों को एक तरह से बेसहारा होने का अहसास कराया। विकल्प के तौर पर पप्पू यादव में वह दमखम उन्हें नहीं दिखा। नतीजतन वे
अन्य विकल्पों की ओर मुड़ने पर मजबूर हो गए। उधर लालू और उनके कुनबे में मचे महाभारत तथा उनके और उनके परिवार पर लगे भ्रष्टाचार के दाग ने भी बिहार के आम यादवों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि कहीं न कहीं राजद ने उनका बस वोट के लिए इस्तेमाल किया। सत्ता पाने के बाद उन्होंने आम यादवों के लिए कुछ नहीं किया, बस अपना और अपने परिवार के लिए अकूत संपत्ति जुटाई।

नित्यानंद राय की दमदार इंट्री

साफ है कि राजद ने यादवों का विश्वास खो दिया। ऐसे में पप्पू यादव की अकर्मण्यता ने बिहार के यादवों को भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष नित्यानंद राय के रूप में एक सशक्त विकल्प की तरफ मोड़ दिया। यही कारण है कि 2019 के चुनाव में राजद का ‘एमवाई’ समीकरण टूटता नजर आया। यह नित्यानंद राय के प्रयासों का ही परिणाम रहा कि कुछ यादव बहुल इलाकों में ‘मोदी यादव’ का नारा बुलंद होता सुनाई दिया। उधर जब राजद ने अपने सफल समीकरण ‘एमवाई’ का हाल बेहाल देखा, तो उन्होंने नए समीकरण ‘मुनिया’ मुस्लिम—निषाद—यादव पर काम शुरू किया। लेकिन उनके इस कदम ने बिहार के यादवों में राजद के प्रति रही—सही सहानुभूति को भी खत्म कर दिया।

‘मोदी यादव’ ने उड़ाई राजद की नींद

अपने समुदाय के लिए नए राजनीतिक नेतृत्व की तलाश बिहार के यादवों को नित्यानंद राय के रूप में पूरी होती दिखी। बिहार के यादवों का रुख बदलने में सबसे बड़ा योगदान आज के युवा यादव वोटरों का रहा जिसका सरोकार विकास के साथ ही भारत और राष्ट्र की अस्मिता से गहरे जुड़ा है। वह पढ़ा लिखा है और उसे सिर्फ यादव और एक परिवार विशेष के नाम पर बरगलाना संभव नहीं। ऐसे में इस बार के चुनाव में यादव वोटों का जबर्दस्त विखराव देखने को मिला। पटना के एक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक अनिल विभाकर कहते हैं—’वैसे तो बिहार में तीन यादव नेता लालू प्रसाद की यादवों पर पकड़ को चुनौती दे रहे हैं, लेकिन इनमें भी भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष नित्यानंद उनके सबसे बड़े और सशक्त दवेदार बनकर उभरे हैं’।

नित्यानंद को युवा यादवों का मिला साथ

53 वर्षीय नित्यानंद राय जिन्होंने विधानसभा में 4 बार हाजीपुर सीट का प्रतिनिधित्व किया, इस बार उजियारपुर लोकसभा सीट से चुनाव लड़ रहे हैं। इससे पहले वे 2014 में उजियारपुर से जीत दर्ज कर चुके हैं। उनकी संघर्ष करने की क्षमता और परिपक्व राजनीतिक समझ ने उन्हें यादवों के बीच काफी लोकप्रिय कर दिया। यही कारण है कि भाजपा ने उन्हें अपना प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त कर दिया। अध्यक्ष के अपने कार्यकाल के दौरान नित्यानंद राय न सिर्फ यादवों का विश्वास हासिल करने में सफल रहे, बल्कि पिछड़ों और सवर्णों का दिल जीतने में भी वे कामयाब रहे। यही कारण है कि इस बार भी उजियारपुर में उनकी राह बहुत ही आसान दिख रही है। यह श्री नित्यानंद राय के प्रयासों का ही नतीजा है कि जो यादव लालू को छोड़ बिहार में और कुछ सुनने को भी तैयार नहीं था, आज भाजपा और नित्यानंद राय की तरफ आशा भरी निगाह से देख रहा है।

पप्पू की अकर्मण्यता, तेजस्वी तेजहीन

जो अन्य दो यादव नेता बिहार के यादवों का समर्थन हासिल होने का दावा कर रहे हैं उनमें एक हैं तेजस्वी यादव और दूसरे पप्पू यादव। बात करें पप्पू यादव की तो वे मधेपुरा और सुपौल तक ही सीमित होकर रह गए हैं। हालांकि उन्होंने कोशिश बहुत की, लेकिन उनकी आपराधिक छवि ने उन्हें कोसी की सीमा से बाहर नहीं निकलने दिया। पप्पू ने समय—समय पर काफी कोशिश की कि यादवों का लालूमोह उनकी तरफ मुड़ जाए, लेकिन यादवों का युवा वर्ग उनकी छवि तथा काम करने के तरीकों को स्वीकार नहीं कर पा रहा।
अब बात करें तेजस्वी की तो उनके पास अपना कुछ नहीं है। जो है सो उनके पिता लालू यादव का। जहां तक तेजस्वी के खुद के व्यक्तित्व का प्रश्न है, उनपर अपने पारिवारिक झगड़े में अपने ही बड़े भाई के साथ व्यवहार को यादव समुदाय स्वीकार नहीं कर पा रहा। उधर उनके बड़े भाई तेजप्रताप द्वारा अपनी पत्नी ऐश्वर्या को तलाक देने के प्रकरण ने भी लालू कुनबे को भारी नुकसान पहुंचाया और यादव वोटर उनसे दूरी बनाने लगा। कुल मिलाकर देखा जाए तो लालूपुत्रों की हरकतों नें ‘लालू युग’ की समाप्ति की जमीन तैयार कर दी है। ऐसे में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष नित्यानंद राय के रूप में बिहार के यादव एक नया नेता देख रहे हैं तो यह कोई आश्चर्यजनक बात नहीं है।

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Bihar’s powerful Yadavs looking for new top leader


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https://bdc-tv.com/bihars-powerful-yadavs-looking-new-top-leader/amp/?usqp=mq331AQCKAE%3D
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