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बाबा नागार्जुन की 110वीं जयंती पर विद्यापति सेवा संस्थान ने अर्पित की श्रद्धांजलि

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दरभंगा : लोक शक्ति के उपासक बाबा नागार्जुन मूलतः विपक्ष के कवि थे। जो वर्चस्ववादी सत्ता के विरुद्ध प्रतिरोध की संस्कृति को आजीवन समृद्ध करते रहे। उनकी खासियत रही कि जनहित के विरुद्ध काम करने वालों को उन्होंने कभी नहीं बख्सा। चाहे वे सत्ता पक्ष के हों, विपक्ष के हों अथवा उनके अपने तथाकथित वाम पक्ष के ही क्यों न हों। उक्त बातें ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो सुरेंद्र प्रताप सिंह ने शुक्रवार को जनकवि बाबा नागार्जुन की 110वीं जयंती पर विद्यापति सेवा संस्थान के तत्वावधान में आयोजित कार्यक्रम में अपने ऑनलाइन संबोधन में कही।

अपने संबोधन में उन्होंने आधुनिकता के वर्तमान दौर में पुराने दिग्गज साहित्यकारों को विस्मृत किए जाने पर चिंता जाहिर की। वहीं जेएनयू के प्रो अमर पाशा ने अपने ई-संवाद में कहा कि बाबा नागार्जुन समतामूलक समाज निर्माण के प्रबल समर्थक थे। विडंबना है कि उनके बाद किसी ने इस दिशा में आवाज बुलंद करने की जहमत नहीं उठाई। इससे पहले कोरोना के गाइडलाइन का पालन करते हुए संस्थान के महासचिव डाॅ बैद्यनाथ चौधरी बैजू के साथ कुलसचिव डाॅ मुश्ताक अहमद, परीक्षा नियंत्रक डाॅ एस एन राय, डीआर-वन डाॅ कामेश्वर पासवान, केन्द्रीय पुस्तकालय के निदेशक डॉ दमन कुमार झा, इतिहास विभागाध्यक्ष डाॅ अयोध्या नाथ झा आदि ने विश्वविद्यालय के केंद्रीय पुस्तकालय परिसर में स्थापित बाबा नागार्जुन की प्रतिमा पर फूल-माला अर्पित कर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी।

मौके पर विचार रखते हुए कुलसचिव डाॅ मुश्ताक अहमद ने कहा कि यात्री-नागार्जुन वास्तव में जनता की व्यापक राजनीतिक आकांक्षा से जुड़े विलक्षण कवि थे। जिनका विभिन्न भाषाओं पर गजब का एकाधिकार था। उनकी रचनाओं में देसी बोली के ठेठ शब्दों से लेकर संस्कृतनिष्ठ शास्त्रीय पदावली तक उनकी भाषा के अनेक स्तर थे। यही कारण रहा कि मैथिली के अलावा हिन्दी, बंगला और संस्कृत में आम जन की आकांक्षाओं के पात्रों को केन्द्र में रखकर उन्होंने बहुत कुछ अलग से लिखा।

विद्यापति सेवा संस्थान के महासचिव डॉ बैद्यनाथ चौधरी बैजू ने कहा कि यात्री-नागार्जुन ने आमजन के मुक्ति संघर्षों में न सिर्फ रचनात्मक हिस्सेदारी दी, बल्कि स्वयं भी जन संघर्षों में आजीवन सक्रिय रहते हुए प्रगतिशील धारा के कवि एवं कथाकार के रूप में ख्यात हुए। उन्होंने अपने संबोधन में जन कवि के रूप में विश्व विख्यात बाबा नागार्जुन को पद्म पुरस्कारों से अद्यतन वंचित रखे जाने पर निराशा जताते हुए उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किए जाने का डिमांड रखा।

परीक्षा नियंत्रक डाॅ एस एन राय ने कहा कि वे सही अर्थों में भारतीयता की मिट्टी से बने एक ऐसे आधुनिकतम कवि थे, जिन्होंने मातृभाषा मैथिली की माटी से निकलकर हिंदी साहित्य की अभूतपूर्व श्रीवृद्धि की। डाॅ दमन कुमार झा ने अपने संबोधन में उन्हें सामाजिक सरोकार को प्राथमिकता देते हुए हमेशा सत्ता की आंख में आंख मिलाकर शब्द-वाण से घायल करने वाले जनकवि के रूप में उल्लिखित की। वहीं डाॅ अयोध्या नाथ झा ने कहा कि यात्री-नागार्जुन सही मायने मे जनकवि थे। जिन्होंने न सिर्फ तीखे तेवर वाली कविताएं लिखी बल्कि स्वयं आन्दोलन में सक्रिय रूप से भाग लेकर अभूतपूर्व जन जागरण की मिसाल कायम की। डाॅ कामेश्वर पासवान ने कहा कि उनकी आलोचना का अपना अलग निराला अंदाज था।

संस्थान के मीडिया संयोजक प्रवीण कुमार झा ने कहा कि बाबा नागार्जुन न सिर्फ कबीर की तरह अक्खड़, फक्कड़ व बेबाक थे, बल्कि वे जीवन के अंतिम पड़ाव तक व्यवस्था के विरुद्ध लड़ते रहे। मौके पर डाॅ उदय कांत मिश्र, हरिकिशोर चौधरी, प्रो चंद्रशेखर झा बूढ़ा भाई, आशीष चौधरी, रामाशीष पासवान, टीपू सिंह आदि की उल्लेखनीय उपस्थिति रही।

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